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राजनीति

हिंदुत्व के शेर बन कर उभरे मोदी

गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों के दौरान सिर्फ नरेंद्र मोदी, भाजपा की राजनीति और गुजरात की चर्चा ही छायी रही, तो यह अकारण नहीं था। गुजरात चुनाव कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी के तीसरी बार जीतने से बढ़ कर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार और एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उनके दावे पर मोहर लगाने का मामला भी था। और कहना न होगा कि मोदी इन सभी इम्तिहानों में सफल हुए हैं।

गुजरात में मोदी को इस बार कांग्रेस ने कई तरह से परेशान किया और एक नयी परेशानी केशुभाई या उनको देशद्रोही कह कर नवजोत सिंह सिद्धू ने पैदा कर दी थी। पर किसी कुशल मैनेजर की तरह मोदी ने सभी कमजोरियों को भांपा, विरोधियों की चालों का पूर्वानुमान लगाया और उसकी काट निकाल ली। यह तब भी हुआ, जब मोदी के अपने चलाये मुद्दे ज्यादा जोर नहीं पकड़ पाये। वे सीधे पीएम पद की दावेदारी करने की जगह सोनिया, राहुल और मनमोहन को ललकारते रहे और ये लोग और कांग्रेस उनसे उलझने से बचते रहे।
गुजरात की जीत नरेंद्र मोदी की जीत है। कांग्रेस और भाजपा के बीच सिर्फ इतने अंतर से ही नतीजों में इतना बड़ा अंतर आ गया, कि वहां कांग्रेस के पास नरेंद्र मोदी जैसा कोई नहीं था। मोदी सिर्फ तीसरी बार जीतने और भाजपा को पांचवीं बार जितवाने का कारनामा करने में ही सफल नहीं रहे हैं, वे भाजपा और संघ के आंतरिक विरोध को भी दरकिनार करने में सफल रहे हैं। भाजपा और संघ के कई नेता केशुभाई के पक्ष में चले गये थे। मोदी ने अनंत कुमार जैसे लोगों की सेवा लेकर प्रवीण तोगडिय़ा जैसे लोगों के विरोध को संभालने की कोशिश की और जब उन्हें लग गया कि पटेल टूट रहे हैं तो उन्होने क्षत्रियों और कोलियों पर काम किया। जब सौराष्ट्र कमजोर होता दिखा, तो वहां सक्रियता बढ़ाने के साथ दक्षिण गुजरात पर ज्यादा मेहनत करके सौराष्ट्र की भरपाई कर ली। जब कांग्रेस ने ‘घर आपनु घर’ के जरिये मोदी के विकास की पोल खोलने का होशियारी भरा कदम उठाया, तो मोदी ने 50 लाख घर का वादा करके बाजी पलट दी। बीच चुनाव में कई बार यह लगा कि मोदी परेशान हैं- खास कर पटेलों के छिटकने को लेकर। जो मोदी अपनी तारीफ करवाने और प्रचार में उस्ताद थे, उन्हें सुषमा स्वराज और लाल कृष्ण आडवाणी जैसों की तारीफ भी नहीं सुहा रही है। और एकदम छुपे रह कर सामने आयीं सोनिया और राहुल गांधी की सभाओं की भीड़ देख कर उन्होंने अपनी सभाओं की संख्या रोज चार-पांच से बढ़ा कर आठ-नौ तक कर ली। अति उत्साही नवजोत सिंह सिद्धू जैसों के आने पर रोक लग गयी, क्योंकि उनके आने से जितना लाभ हुआ, उससे ज्यादा नुकसान हो गया।
कांग्रेस अभियान के पोस्टर से सोनिया, मनमोहन और राहुल के भी गायब रहने से साफ था कि पार्टी सीधे मोदी को निशाना बनाने के साथ एक मोदी बनाम करोड़ों गुजरातियों के सवाल को ऊपर कर रही है। मोदी भी कॉरपोरेट विकास की बात छोड़ कर पानी, मकान, मानव विकास सूचकांक के पिछड़ेपन और महंगी उच्च शिक्षा के सवालों पर सफाई देते-देते कांग्रेस के ‘जवाब दो, हिसाब दो’ के नारे पर उलझ गये लगे। आखिर उन्हें पांच नहीं, 17 साल के भाजपा शासन का हिसाब जो देना था। पर वे इनसे भागे नहीं और नतीजे बताते हैं कि गुजरातियों को उनकी सफाई पसंद आयी और वे उन्हें बड़ी राजनीति में भेजना चाहते हैं।
पर मोदी को सर्वाधिक नुकसान का खतरा केशुभाई पटेल की पार्टी से था, जो कुछ हद तक सौराष्ट्र की गिरावट से साफ दिखा भी। केशुभाई पटेल दो चुनाव से भाजपा के अंदर रह कर भी मोदी का विरोध कर रहे थे। केशुभाई के प्रति एक सहानुभूति थी, जो निश्चित रूप से लेउआ पटेलों, फिर पूरे पाटीदारों और सौराष्ट्रवालों में थी। सिद्धू जैसे बड़बोलों ने उन्हें देशद्रोही कह कर उनके प्रति सहानुभूति को बढ़ा ही दिया। नरेंद्र मोदी और भाजपा की मुश्किल यह है कि ये सारी गिनती उसके खाते से ही हो रही है, क्योंकि पिछले चुनाव में यह पूरा हिसाब भाजपा की उम्मीद से बेहतर ढंग से उसकी झोली में आया था।
सीएसडीएस के पोस्ट-पोल आंकड़ों के अनुसार तो पटेलों के वोट में भाजपा के खाते में उससे पहले के चुनाव की तुलना में 12-13 फीसदी वोट ज्यादा पड़े थे। पिछली बार मोदी ने पटेल नेता पुरु षोत्तम रु पला को आगे करके केशुभाई की काट कर दी थी। इस बार वैसी गुंजाइश नहीं थी। मुश्किल यह थी कि इस बार गुजरात में सबसे खुल कर जातिवाद चल रहा था। जाति पहले भी मरी या छुपी नहीं थी, लेकिन हिंदुत्व, विकास और गुजरात गौरव के नाम पर उसका प्रभाव कुछ दबा-छुपा था। मोदी की दिक्कत यह भी थी कि वे जातिवादी खेल खुलकर नहीं खेल सकते थे, पर नतीजों से इशारा मिलता है कि पटेलों की एकजुटता और विरोध के जवाब में राज्य में ओबीसी का काउंटर-पोलराइजेशन भी हुआ है। इस चक्कर में मोदी अपनी तैयारियों की दिशा से भी थोड़े फंसे। उन्हें केशुभाई और झडाफिया जैसे अपने पुराने साथियों की तरफ से खतरा लग रहा था, पर आखिरी वक्त में कोली नेता पुरुषात्तम सोलंकी का मसला ऐसा फंस गया कि उनके लिए आबादी में दसेक फीसदी हिस्सा रखनेवाले कोलियों का वोट पिछली बार की तरह एकमुश्त पा जाना मुश्किल हो गया था। पर क्षत्रीय और कोली वोटरों पर सबसे ज्यादा मेहनत करके और उन्हें ज्यादा टिकट देकर मोदी ने अपना पक्ष मजबूत किया। दक्षिण के आदिवासी जिलों में अच्छे अधिकारी भेज कर मोदी ने आदिवासियों का समर्थन पाने का काम कराया और सौराष्ट्र की भरपाई करा ली। मोदी ने कांग्रेस के क्षत्रीय वोट-बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में ज्यादा टिकट दिये, पर इससे क्या लाभ हुआ, अभी कहना जल्दबाजी होगी। मोदी ने अपनी अकड़ नहीं छोड़ी। वे अहमद मियां पटेल को मुख्यमंत्री बनाने का खतरा दिखाने के साथ सर क्रीक के सवाल के जरिये अपने को ज्यादा राष्ट्रवादी बताने में भी नहीं चूके। आठ फीसदी मुसलिम वोट को पाने के लिए तो उन्होंने सद्भावना उपवास जैसा नाटक करने की जरूरत भी महसूस नहीं की। भाजपा के भील वोटरों पर अपने से ज्यादा प्रभाव रखनेवाले प्रवीण तोगडिय़ा को मनाने के लिए उन्होंने जिस तरह अनंत कुमार की सेवा ली, वह मोदी का स्वाभाविक आचरण नहीं था। लेकिन यह करना उन्हें अकड़ से ज्यादा जरूरी लगा। यह भी इमरजेंसी उपायों की जरूरत को बताता है। दलितों में अगर कांग्रेस आगे रही तो ओबीसी में मोदी का पलड़ा भारी रहा। इस बार अर्जुन मोढवाडिया को आगे करके कांग्रेस ने इसकी भी काट करने की कोशिश की, पर अर्जुन की हार से साफ है कि उसका यह दावं नहीं चला।

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