कांग्रेस को बलि का बकरा बना कर क्या विपक्ष में हो पाएगी एकता?

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योगेंद्र योगी

हिमाचल और कर्नाटक का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के मंसूबे सातवे आसमान पर हैं। कांग्रेस को भी अंदाजा है कि है कि भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों के प्रभाव वाले राज्यों में चुनाव लड़े बगैर केंद्र में सरकार बनाने और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता।

विपक्षी दल आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस की कुर्बानी चाहते हैं। कांग्रेस इस एकता के पीछे छिपे विपक्षी दलों के अपने राज्यों में अकेला रहने की नीयत को अच्छी तरह पहचानती है। इस एकता की कवायद को लेकर विपक्षी दलों की हालत इधर कुआ और उधर खाई जैसी हो गई है। विपक्षी दलों को भाजपा के साथ ही कांग्रेस से भी खतरा है। भाजपा से मुकाबले में वोटों के बिखराव को रोकने के लिए विपक्षी दल कांग्रेस को भी अपने जनाधार वाले राज्यों से चुनावी मैदान से हटाने चाहते हैं। ऐसे में विपक्षी एकता के लिए 23 जून को नीतिश कुमार के आह्वान पर पटना में होने वाली बैठक में एकराय कायम करने का मामला खटाई में पड़ता नजर आ रहा है।

गौरतलब है कि हिमाचल और कर्नाटक का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के मंसूबे सातवे आसमान पर हैं। कांग्रेस को भी अंदाजा है कि है कि भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों के प्रभाव वाले राज्यों में चुनाव लड़े बगैर केंद्र में सरकार बनाने और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता। कांग्रेस ने बेशक अपनी महत्वाकांक्षा का खुलकर इजहार नहीं किया है, किन्तु उसके इरादो से साफ जाहिर है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है। विपक्षी दल चाहते हैं कि कांग्रेस सिर्फ उन्हीं 200 संसदीय सीटों पर फोकस करना चाहिए, जहां बीजेपी से उसका सीधा मुकाबला है। विपक्ष की शर्तों पर कांग्रेस राजी नहीं है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए हो रही विपक्षी एकता के मसले पर जो बात ममता कह रही हैं वही अखिलेश और केसीआर भी कह रहे हैं कि जहां पर जो दल मजबूत है, वो चुनाव लड़े और विपक्ष के बाकी दल उसे समर्थन करें। लेकिन कांग्रेस इस पर रजामंद नहीं है। कांग्रेस को पता है कि इन जहां भाजपा से सीधा मुकाबला है, वहां तीसरा मजबूत दल नहीं है। इसलिए विपक्ष की यह खैरात कांग्रेस को पसंद नहीं है। इन सीटों पर अन्य दल चाह कर भी कांग्रेस और भाजपा के बीच आकर मुकाबले त्रिकोणीय या बहुल नहीं बना सकते, ऐसे में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के आधार वाले राज्यों में चुनाव नहीं लडऩे की शर्त को कभी स्वीकार नहीं करेगी।

कांग्रेस उन 200 लोकसभा सीटों पर तो चुनाव लडऩा चाहती है, जिस पर उसे सीधे बीजेपी से लडऩा है। इसके साथ-साथ कांग्रेस की नजर उन राज्यों की सीटों पर भी है, जहां भाजपा के मुकाबले क्षेत्रीय दल मजबूत हैं। लेकिन क्षत्रप अपने राज्यों में कांग्रेस को स्थान नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि उनका सियासी आधार कांग्रेस की जमीन पर खड़ा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव समेत तमाम विपक्षी दल के नेता चाहते हैं कि कांग्रेस उनके प्रभाव वाले राज्यों से चुनाव नहीं लड़े, ताकि भाजपा से सीधे मुकाबले में वोटों का बंटवारा नहीं हो। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि हमने अनुमान लगाया है कि कांग्रेस 200 सीटों पर मजबूत है। अगर कांग्रेस कुछ अच्छा चाहती हैं तो कुछ जगहों पर त्याग भी करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश (सपा) को प्राथमिकता देनी होगी। ममता ने दूसरे राज्यों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बंगाल, दिल्ली, तमिलनाडु, झारखंड, पंजाब, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में जनता के बीच मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बिहार में नीतीश, तेजस्वी और कांग्रेस साथ हैं तो वे फैसला ले सकते हैं।

विपक्षी दलों को लगता है कि कांग्रेस उनके प्रदेश में अगर मजबूत होती है, तो भविष्य में उनके लिए ही चिंता बढ़ा सकती है। इसीलिए विपक्षी दल कांग्रेस को उन्हीं सीटों के इर्द-गिर्द रखना चाहतें हैं, जहां उसका मुकाबला सीधा भाजपा से है। कांग्रेस इस बात को समझती है कि केंद्र की सत्ता को दोबारा से हासिल करनी है तो उसे पहले राज्यों में मजबूत होना होगा, इसीलिए कांग्रेस विपक्षी एकता से ज्यादा फोकस राज्यों के चुनाव पर कर रही है ताकि पहले खुद मजबूत हो ले। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष द्वारा कांग्रेस को सुझााई जा रही 200 सीटों के नतीजों को देखें तो बीजेपी 178 सीटें जीतने में सफल रही थी। कांग्रेस को महज 16 सीटें मिली थीं। 6 सीटें अन्य के खाते में गई थीं। इससे पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 200 सीटों में से बीजेपी 168 सीटें जीतने में कामयाब रही थी और कांग्रेस को सिर्फ 25 सीटें मिली थीं। इसके अलावा 7 सीटें दूसरे दलों ने जीती थीं।

कांग्रेस-विपक्षी दल के अपने-अपने मकसद हैं। यूपी में सपा और बसपा का सियासी आधार आज वही है जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था। इसी तरह बंगाल में ममता बनर्जी भी कांग्रेस की जमीन पर ही खड़ी हैं। लोकसभा चुनाव के नजरिये से उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान है। दिल्ली की कुर्सी का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर गुजरता है। इसका कारण है कि यहां सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें हैं। जो पार्टी जितनी ज्यादा सीटों पर कब्जा जमा लेगी वही केंद्र में सरकार बनाने में मजबूत रहेगी। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी चाहती है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश से दूर रहे। कांग्रेस किसी भी सूरत में उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़े बगैर नहीं रह सकती है। कांग्रेस का राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने और केंद्र में गठबंधन सरकार में मुख्य भागीदारी का सपना उत्तर प्रदेश के बगैर पूरा नहीं हो सकता।

कांग्रेस और बीजेपी के बीच ज्यादातर सीधा मुकाबला उत्तर भारत के राज्यों में है। मध्य प्रदेश (29), कर्नाटक (28), राजस्थान (25), छत्तीसगढ़ (11), असम (14), हरियाणा (11) हिमाचल (4), गुजरात (26), उत्तराखंड (5), गोवा (2), अरुणाचंल प्रदेश (2), मणिपुर (2), चंडीगढ़ (1), अंडमान और निकोबार (1) और लद्दाख (1) में लोकसभा सीट है। इस तरह ये 162 लोकसभा सीटें होती है, जहां पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही मुकाबला होना है। वहीं, 38 लोकसभा सीटें उन राज्यों की हैं, जहां क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं, लेकिन इन सीटों पर मुकाबला कांग्रेस से होता है। इस फेहरिस्त में पंजाब की कुल 13 सीटों में से 4, महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 14, यूपी की 80 में 5, बिहार की 40 में से 4, तेलंगाना की 17 में से 6 और 5 सीटें आंध्र प्रदेश और केरल की हैं।

कर्नाटक के बाद अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों के वोटिंग ट्रेंड का आंकलन करते हैं तो राज्य की 29 लोकसभा सीटों में से सिर्फ बीजेपी को 4 सीटों पर बढ़त मिली है जबकि 21 सीटों पर कांग्रेस आगे रही है। इन राज्यों के चुनाव नतीजों को 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जाएगा। इस तरह से 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे से जो तस्वीर उभरेगी, उसके बाद 2024 के चुनाव का परिदृश्य साफ होगा और उससे पहले तक विपक्षी दलों के बीच शह-मात का खेल जारी रह सकता है। कांग्रेस से अंदरूनी खतरे के कारण पूर्व में भी विपक्षी एकता के प्रयास सिरे नहीं चढ़ सके हैं। सीटों के लिए हो रही इस खींचतान के कारण पटना में होने वाली बैठक से विपक्षी एकता के बहुत उत्साहवद्र्धक परिणाम आने की संभावना क्षीण है।

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