न्यायालयों की सुरक्षा और अपराध

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प्रभुनाथ शुक्ल

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में स्वयं माफियाराज खत्म करने का दावा करते हैं। सरकार यह ढिंढोरा पीटती है कि राज्य से अपराध का समूल सफाया हो गया है। लेकिन तस्वीर इसके उलट है। अदालतें और जेल भी सुरक्षित नहीं है। लखनऊ के कौसरबाग़ की अदालत में हुईं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया संजीव महेश्वरी उर्फ़ जीवा की हत्या कम से कम यही साबित करती है। हालांकि यह कोई नई घटना नहीं है। अदालतों में गोलीकांड की एक नहीं अनगिनत घटनाएं हैं। यही हालात जेलों की है यहाँ भी कभी-कभी ऐसी घटनाएं होती हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस घटना के बाद ला-एण्ड-ऑर्डर का सवाल उठाया है। उन्होंने प्रदेश में बढ़ते अपराध और महिलाओं की सुरक्षा पर भी सरकार को घेरा है। पत्रकारों से अपराध का डाटा भी गिनाते दिखे। कन्नौज की घटना पर भी उन्होंने सवाल उठाया है।

लखनऊ राज्य की राजधानी है। यह सत्ता का केंद्र बिंदु है। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मंत्रालय , पुलिस महानिदेशक सब यहीं रहते हैं। लेकिन राज्य की राजधानी लखनऊ भी सुरक्षित नहीं है। अपराधी बेखौफ होकर अदालत में घुसकर गोलियां बरसाते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री के बुलडोजर और एनकाउंटर नीति से जरा भी भय नहीं दिखता। गैंगवार की इस अघोषित लड़ाई में माफिया तो मरते हैं। निर्दोष पुलिस और आम आदमी भी शिकार होता है। जिसका इस लड़ाई से कोई ताल्लुक नहीं होता। पुलिस सुरक्षा और उसकी मौजूदगी में बढ़ती इस तरह की घटनाएं आम से लेकर ख़ास लोगों में भय पैदा करती हैं। जब अदालते नहीं सुरक्षित हैं तो आम आदमी न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है। न्यायधीश को लोग न्याय का देवता मानते हैं। जब उसका मंदिर भी असुरक्षित है तो आम आदमी किससे उम्मीद करे। यह सवाल जायज और चिंता है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबित लखनऊ की कैसरबाग की अदालत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा की ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर हत्या कर दी जाती है। इस घटना में जहां दो पुलिसकर्मी घायल हुए वहीं एक डेढ़ साल की मासूम और उसकी मां को भी गोली लगती है। जीवा पूर्वांचल के माफिया से राजनेता बने मुख्तार अंसारी का करीबी बताया गया है। उसने भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या की थी। जिसके बाद उसे आजीवन कारावास की सजा मिली थी। वह मुजफ्फरनगर का रहने वाला था।

जीवा हत्या और दलित उत्पीड़न के मामले में अदालत में पेशी पर आया था। अधिवक्ताओं ने बहादुरी दिखाते हुए गोलीकांड के आरोपी को पकड़ लिया और उसकी अच्छी कुटाई भी किया। वह जौनपुर के केराकत का रहने वाला है। उसका नाम विजय यादव है। पुलिस उसका आपराधिक रिकॉर्ड खंगाल रही है कि आखिर इसने जीवा की हत्या क्यों और किसके कहने पर किया। इस घटना के बाद राज्य मुख्यालय में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस महानिदेशक ने अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था को और दुरुस्त करने का आदेश दिया है।

अदालत परिसर में इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद जीवा की हत्या करने का आरोपी अधिवक्ता के भेष में सीधे कोर्ट रूम में कैसे घुस गया। अदालत परिसर और कोर्ट रूम के बाहर पुलिस की अच्छी-खासी सुरक्षा व्यवस्था रहती है। बिना जांच-पड़ताल के न्यायाधीश की अदालत में ऐसे लोगों को क्यों जाने दिया गया। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवा के अदालत में पेश होने के पहले ही हत्या का आरोपी अधिवक्ता के भेष में वहां बैठा था। यह सब कैसे संभव है। निश्चित रूप से कहीं न कहीं से सुरक्षा व्यवस्था में चूक का मामला है।

माफिया से राजनीति में प्रवेश करने वाले अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की भी अप्रैल में कुछ इसी तरह गोली मारकर हत्या कर दी गयीं थी। जब उसे प्रयागराज के काल्विन अस्पताल से मेडिकल जांच के बाद जब पुलिस अभिक्षा में लाया जा रहा था उसी दौरान ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर दोनों भाइयों की हत्या कर दी गयीं। इस घटना के बाद सनसनी फैल गई और सरकार के कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे। लेकिन इसके बाद भी कोई सबक नहीं लिया गया। पूर्वांचल का माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की भी जेल में गोली मारकर कर इसी तरह हत्या कर दी गई थी। जबकि अपराधियों के लिए जेल सबसे सुरक्षित मानी जाती है। लेकिन इसके बावजूद भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई खास सुधार नहीं हो पाया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ की छवि अपराध के खिलाफ बेहद सख्त मानी जाती है। अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर और एनकाउंटर नीति देश की मीडिया में छायी रहीं, लेकिन इसके बावजूद भी अपराधियों के हौसले पस्त नहीं हुए। सबसे सुरक्षित माने जाने वाली अदालत में अब इनकी धमक पहुंच गयीं है। यह वाजिब सवाल है कि हम किसी अपराधी के महिमामंडन की बात नहीं करते हैं। अतीक, असरफ, मुन्ना बजरंगी और जीवा के मरने की वकालत हम नहीं कर रहे हैं। क्योंकि सभी लोग एक अपराधी थे और अपराधी की तरह मारे गए। कहा भी गया है जो जैसा बोएगा वैसा काटेगा। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तो सवाल उठेंगे। क्योंकि यह सरकार और कानून-व्यवस्था से जुड़ा सवाल है।

सम्बंधित घटनाओं से यह साबित होता है कि अपराधियों में मुख्यमंत्री के एनकाउंटर नीति का कोई खौफ नहीं है। अगर ऐसा होता तो निश्चित रूप से मेडिकल जांच से आते समय अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या न होती। अदालत परिसर में जीवा खुले आम गोलियां का शिकार न बनता। उदाहरण के लिए यह दो घटनाएं साबित करती हैं कि उत्तर प्रदेश में माफियाराज की जडें अभी काफी मजबूत हैं। उन्हें कहीं न कहीं से खाद-पानी मिल रहा है। अतीक की हत्या करने वाले पत्रकार के वेश में आए थे जबकि जीवा को ठिकाने लगाने वाला अधिवक्ता के रूप में आया। यह साबित होता है कि अपराध अपना ट्रेंड और तरीका भी बदल रहा है। इस तरह की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए पुलिस को भी अपना नजरिया बदलना होगा। अदालतों और जिलों की सुरक्षा व्यवस्था को सख्त करन होगी। क्योंकि मामला कानून-व्यवस्था से जुड़ा है।

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