भगवान् की मूर्ति के आगे धूपबत्ती /अगरबत्ती ,दीपक जलाकर स्तुति करना

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डॉ डी के गर्ग

अक्सर आपने देखा होगा की मूर्ति पूजा करते समय तस्वीर या मूर्ति के आगे धूपबत्ती /अगरबत्ती जलाते है। कही कही तो ये भी देखा है की धूपबत्ती से वहा की दीवारे ,फोटो काली पड़ जाती है।
इस विषय में दो प्रश्न उठते है –
१ क्या धूपबत्ती /अगरबत्ती जलाने से ईश्वर स्तुति होती है ?
२ क्या धूपबत्ती /अगरबत्ती जलाने से स्वस्थ्य को हानि होती है?
३ क्या घर में दीपक — अगरबत्ती जलाने से भगवान प्रशन्न होते है ?
उत्तर : प्रसन्ता तब होती है जब मन चाही वस्तु प्राप्त होती है, और जब कोई वस्तु चली जाये तो अप्रसन्नता होती है । ईश्वर तो परिपूर्ण है उसके पास किसी वस्तु की कमी नहीं है , ईश्वर सर्वज्ञ है, पूर्ण ज्ञानी है, अतः उसके सुखी अथवा दुखी होने का प्रश्न ही नही उठता। ईश्वर सदा एकरस रहता है, उसमें किसी बात की बढ़ोतरी या घटोतरी नही होती ।
जो परम पिता परमात्मा सूर्य- चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों को प्रकाशित करता है, उसे हम कुछ दीपक जलाकर क्या प्रशन्न कर सकते हैं, घर में रोशनी नहीं है तो दिया — दीपक जलाने से प्रकाश मिल सकता है, परन्तु ईश्वर को खुश करने के लिए दीया जलाना बिलकुल अज्ञानता की बात है ।
धूप -अगरबत्ती से थोड़ा धुआं उठता है तथा खुशबू फैल जाती हैं जिससे मच्छर इत्यादि जीव भाग जाते हैं ।ईश्वर को सुगंध की क्या आवश्यकता है? दीया,अगरबत्ती व धूपबत्ती इत्यादि जो हम पूजा में जलाते हैं, वे सब यज्ञकर्म /अग्निहोत्र ना करने के बहाने है। हवन सामग्री में तो सुगन्धित और पोषक वस्तुओं का मिश्रण इस लिए होता है जिससे अग्नि में आहुति देने पर वायुमंडल में सुगंध फैले और जड़ी-बूटियों- से कीट – कीटाणुओं का सफाया हो ।इससे घर में पवित्रता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है । गाय के घी के परमाणु रोगों को घर में आने से रोकते हैं ।
वर्तमान में आलसी लोगो द्वारा एक भृम पाल लिया गया है की दीपक – धूप -अगरबत्ती यज्ञ का ही बिगड़ा हुआ रूप है।प्रायः स्त्रियाँ घरों में संध्या होते ही दीपक जलाती है,धूप – अगरबत्तिया जलाती है।लेकिन ये भी सत्य है की केवल गाय के घी से दीपक जलाना ही लाभकारी है। घर में दीपक जलाने से छोटा हवन हो गया क्योकि कर्मकाण्ड करने के लिए उनके पास समय नही है।

क्या आप जानते है की धूप-अगरबत्ती भी शुद्ध होनी चाहिए ,इनमें भी बहुत मिलावट हो रही है जो भयंकर जान लेवा बिमारियों को जन्म देती है। एक शोद्ध से यह बात निकलकर सामने आई कि अगरबत्तिया भी घटिया स्तर और मिलावट से बनी होने के कारण यह अस्थमा और कैन्सर जैसी बिमारियों को जन्म दे रही है।
दरअसल, शोध में बताया गया है कि —
१ अगरबत्ती-धूपबत्ती से निकलने वाला धुआं शरीर की कोशिकाओं पर बुरा असर डालता है और यह सिगरेट के धुएं से भी ज्यादा जहरीला साबित होता है. शोधकर्ताओं ने पाया कि इसके धुएं से कोशिकाओं के DNA में बदलाव होता है, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.
इस बारे में सचेत होने की जरूरत तो है ही. धुआं हर हाल में फेफड़े के लिए खतरनाक ही होता है, यह चाहे सिगरेट से निकले या अगरबत्ती से.
वैसे तो भारत में प्राचीन काल से ही प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध सुगंधित लकड़‍ियों का इस्तेमाल होता रहा है. ऐसी लकड़‍ियों में चंदन, अगर, तगर आदि प्रमुख हैं. ये महंगी बहुत है और आसानी से उपलब्ध नहीं है।
वैसे सत्य चाहे जो भी हो, पर नुकसान से पहले ही सचेत हो जाने में ही ज्यादा समझदारी है।

२ अगर बती स्टिक बांस से बनाई जाती है ओर वो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।डाक्टर भी एलर्जी ओर अस्थमा मरीजों को अगरबत्ती ओर धूप बती से दुर रहने की सलाह देते हैं।अगरबत्ती ज्यादातर बांस की सिंक से बनती है, हमारे शास्त्रों में बांस को जलाना वर्जित माना गया है। किसी भी हवन अथवा पूजन विधि में बांस को नहीं जलाते हैं।वैज्ञानिक कारण यह है कि बांस में लेड व हेवी मेटल अधिक मात्रा में होते हैं। लेड जलने पर लेड आक्साइड बनाता है और हेवी मेटल भी जलने पर ऑक्साइड्स बनाते हैं जो कि ब्रेन और दिल के लिए खतरनाक जहर हैं । सिर दर्द और मयेग्राइन का कारण बनती है।
३ नार्थ केरोलिना यूनिवर्सिटी में दो तरह की अगरबत्तियों पर शोध किया गया ये दोनों तरह की अगरबत्तियां ही हमारे घरों में ज्यादातर इस्तेमाल होती हैं इन्हें कमरे में बंद कर जलने दिया गया। इससे अच्छी खासी मात्रा में कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाईट्रोजेन ऑक्साइड कमरे में जमा हो गया जो स्वास्थ्य फेफड़ों को खराब करने के लिए काफी था।
४ अगरबत्ती के जलने से सुगंध फैले इसके लिए फेथलेट नाम के केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह सांस के लेने में दिक्क्त कर देता है और अस्थमा की बीमारी पैदा करता है।
५ अगरबत्ती की सुगंध के साथ हमारे शरीर में ख़तरनाक किस्म के न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक भी पहुंचते हैं यह इतना खतरनाक होता है कि इसकी थोड़ी सी मात्रा भी कैंसर, लीवर या ब्रेन हेमरेज का कारण बन सकती है।
६ आँखों में जाने पर खतरनाक केमिकलों से आँख में खुजली ,जलन और ऐलर्जी होने लगती है। आँखों की रौशनी खराब होने का डर रहता है।
शास्त्रो में पूजन विधान में कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता केवल धूप दीप का उल्लेख मिलता है।
भगवान की मूर्ति के आगे दीपक जलाना

दीपक, धूप अगरबत्ती से यज्ञ का कोई विरोध नहीं है।इनको जलाना लाभकारी है परन्तु धार्मिक होना नही है, यह शुद्ध होनी चाहिए।

इस बात को अपने मस्तिष्क से निकाल दो कि दीया जलाने से ईश्वर प्रशन्न होते है । दीया प्रकाश देता है। प्रकाश का आध्यात्मिक अर्थ है ज्ञान, अतः दीया हमें ज्ञान का दीपक जलाने की प्ररेणा देता है। अत: ज्ञान से ही अज्ञानरूपी अंधेरा भाग जाता है । अगरबत्ती सुगंध देती हैं। हमें प्रेम और श्रद्धा की सुगंध से समाज को सुगंधित करना है ।
जिस ईश्वर ने सूर्य ,चन्द्रमा ,तारे बनाये इनके द्वारा जीवधारियों को प्रकाश और ऊर्जा दी जा रही है ,इस ईश्वर की मूर्ति बनाकर उसके आगे दिया जलाना ऐसे है जैसे भरी धुप में दिया जलाकर उजाला करने का भ्र्म। एक कवि ने कहा है –
अजब हैरान हूं भगवन! तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं ।
कोई वस्तु नहीं ऐसी, जिसे सेवा में लाऊं मैं ॥
तुम्हीं हो मूर्ति में भी,तुम्हीं व्यापक हो फूलों में ।
भला भगवान पर,भगवान को कैसे चढाऊं मैं ॥
लगाना भोग कुछ तुमको,यह एक अपमान करना है ।
खिलाता है जो सब जग को,उसे कैसे खिलाऊं मैं ॥

तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं,सूरज-चांद और तारे ।
महा अन्धेर है कैसे तुम्हें,दीपक दिखाऊं मैं ॥

बड़े नादान है वे जन,जो गढ़ते आपकी मूरत ।
बनाता है जो सब जग को,उसे कैसे बनाऊँ मैं ॥

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