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राजनीति

पश्चिम बंगाल में ढलने लगा है ममता बनर्जी का सूरज

———- इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार, भूतपूर्व महामंत्री, यादवपुर विश्वविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन ——————————————— सागरदिघी चुनाव में ममता की हार ममता की आने वाले दिनों में होने वाले प्रत्येक चुनाव में उनकी होने वाली भयंकर पराजय का संकेत है। समझो उनके पतन का डंका बज चुका है।यह मै अपने ५४ वर्षीय राजनैतिक जीवन के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं। सागरदिघी सीट पर ममता के छात्र परिषद के साथी सुब्रत साहा २०११ से जीतते आ रहे थे। वहां अचानक सुब्रत शाहा की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में ममता की ज़बरदस्त हार उनके आने वाले दिनों की इबारत लिख दी है। समझो कि पाप का घड़ा भर चुका है।
यह आने वाले दिनो की आहट है। ममता बनर्जी के इस मजबूत किले के बारे में यह कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह इस प्रकार भूमिसात हो जाएगा।
पश्चिम बंगाल के इतिहास में ममता सरकार के समान भ्रष्ट सरकार आज तक देखने में नही आआई। प्रत्येक क्षेत्र में बंगाल की जनता को ममता दीदी ने निराश किया है। वहां के सामाजिक परिवेश को वह कतई सुरक्षित नहीं रख पाई और बौद्धिक ताकत के रूप में विख्यात रहे पश्चिम बंगाल की साख को भी वह सुरक्षित नहीं रख पाई हैं। सागरदिघी जनता की ममता की भ्रष्ट सरकार के बिरुद्ध एक बड़ी राय है। ममता जो कुछ नहीं थी, उससे भी अधिक लोग हमें समझते रहे। ममता ने अपने दम पर २००६ में चुनाव लड़ा पर मात्र ३० बिधान सभा क्षेत्र में उसे सफलता मिली। जबकि कांग्रेस को २४ सीट मिली। ममता का इतिहास कहता है वह दूसरी पार्टी को ब्यवहार करने में बहुत अधिक निपुण है।
।१९९८ में जब ममता ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की ।उसके सामने लक्ष्य था – कांग्रेस से बड़ी बन कर निकले। भाजपा का १० प्रतिशत वोट था। बाजपेयी बहुत पोपुलर थे। भाजपा के साथ समझौता करके ममता ९ सांसद तृणमूल के लिए जिता पाई । जबकि कांग्रेस के ५ सांसद ही जीत पाये। ममता की तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस से बड़ी पार्टी बन गई। अब भाजपा को दगा देने में ममता ने देरी नही की। २००१ के विधान सभा चुनाव में भाजपा का साथ छोड़ कर कांग्रेस के साथ समझौता कर लिया। कांग्रेस का प्रदर्शन ममता की तुलना में बहुत बेहतर था। ममता २४६ सीट पर लड़ कर मात्र ६० सीट जीत पाई जबकि कांग्रेस ४८ सीट पर लड़ कर ३० सीट पा गई। यदि २०११ में सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी का बलिदान करके ममता से समझौता नही किया होता तो ममता अपने दम पर ३० से ६० सीट पर ही पहुँच पाती। अपना काम कांग्रेस से बन जाने के बाद ममता ने कांग्रेस पार्टी पर हमला आरम्भ कर दिया और उसको समाप्त करने में लग गई। २०१९ में जनता ने ममता के पंचायत चुनाव में पश्चिम बंगाल में गणतंत्र की हत्या करने वाली ममता को २२ सीट पर लाकर खड़ा कर दिया। भाजपा ७८ हज़ार बूथ में मात्र २०००० बूथ पर अपना एजंट दे पाई ।वह १८ लोकसभा सीट जीत लेती है।
२०२१ का बिधान सभा चुनाव ममता ने मुस्लिम समाज में एनआरसी का भय दिखाकर जीता। उन्होंने मुस्लिम समाज में यह डर बैठा दिया कि यदि भाजपा आ जायेगी तो एनआरसी लागू कर देगी। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में २ स्थान व ३५ लाख वोट मिले थे। वह सब वोट ममता ले गई २ लोकसभा सांसद पाने वाली कांग्रेस को शून्य विधायक मिले। म्यूनिसिपल चुनाव में प्रतिपक्ष भाजपा को गुंडा गर्दी करके उसके कार्यकर्ता को घर के बाहर ही नही निकलने देती वह राज्य की प्रायः सभी म्यूनिसिपैलिटी जीत लेती है। आने वाले पंचायत चुनाव भी म्यूनिसिपल चुनाव की तरह ममता लड़ेगी। ममता यह भूल जाती है भाजपा को अभी मात्र ५५ प्रतिशत हिन्दू वोट मिलता है। ।।सीपीएम का १ करोड़ ६० लाख हिन्दु शरणार्थी वोट में अभी १ करोड़ वोट ही भाजपा के पास गया है। आने वाले लोकसभा चुनाव में सीपीएम का बचा हुवा ६० लाख हिन्दु शरणार्थी वोट भाजपा में जाएगा ही जायेगा। ऊपर से बंगाल में ममता की तृणमूल की भ्रष्टाचार की आँधी का वोट ममता को कहा पहुँचायेगा ?- कहा नही जा सकता। ममता ने तृणमूल कांग्रेस को परिवारवादी पार्टी बनाने के लिये अपने परिवार के अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को २ नम्बर बना दिया।अभिषेक बनर्जी ने राजनीति में कोई संघर्ष नही किया न ही उचित सोच वाला व्यक्ति है। प्रथम श्रेणी का मूर्ख है। कहता है दिल्ली २ लाख आदमियों को ले जाऊँगा ,दिल्ली का घेराव करने। उसको क्या ज्ञान है बंगाल से दिल्ली २ लाख लोगों को ले जाने के लिये २०० रेल गाड़ी की व्यवस्था करनी होगी। जो असम्भव काम है।
जब कोई असंभव बातों को करने लगता है तब समझोगे वह या तो मूर्ख है या फिर घमंड के वशीभूत होकर ऐसा बोल रहा है। सत्ता का नशा हमेशा नहीं रहता । जब सूरज ढलता है तो किसी से कह कर नहीं ढलता। देखते देखते उसकी जवानी कहां चली गई ,? इसका किसी को पता भी नहीं चलता । यही हाल अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का होने वाला है।

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