रामचंद्रजी पिता की पीड़ा को देखकर माता कैकेयी से पूछ लेते हैं कि ”माते! मेरे राजतिलक होने के पश्चात से पिताजी इतने व्यथित क्यों हैं?” माता कैकेयी रामचंद्रजी को सारा वृतांत सुना देती है, और कह देती है कि मुझे दिये वचनों से वह लौट नहीं सकते और तुम्हें राजतिलक करके अब तुमसे वनगमन के लिए नहीं कह सकते, अच्छा हो कि तुम स्वयं ही वन गमन कर जाओ।” माता कैकेयी की बात सुनकर रामचंद्रजी वन की तैयारी करने लगते हैं और अपने निर्णय से पिता को भी अवगत करा देते हैं। कितना अनुकरणीय उदाहरण है श्रीराम के जीवन का, पिता की आज्ञा को नहीं अपितु इच्छा को ही अपने लिए आज्ञा मानकर राजपाट छोड़ देते हैं।
फिर दूसरा उदाहरण उस भाई भरत का देखिये, जिसके लिए माता कैकेयी ने सारे पापड़ बेले, इतना बड़ा खेल खेला कि उस छलपूर्ण षडय़ंत्र में अपने सुहाग की भी परवाह नहीं की, केवल इसलिए कि मेरे पुत्र भरत को राज्य मिल जाए। समय आने पर उसी पुत्र भरत ने वस्तुस्थिति की जानकारी होते ही राज्य को लात मार दी और ज्येष्ठ भाई राम को वन से लौटाने के लिए चल दिया। भाई के सामने जाकर हृदय से रोने लगा। मां के लिए अपशब्द कहने लगा, उसके किये की क्षमा मांगने लगा। कहने लगा-‘भ्राताश्री! मेरा स्थान राज्य सिंहासन पर बैठने का नहीं है-मेरा स्थान तो इन चरणों में बैठने का है।’ अंत में श्रीराम के ना मानने  पर उनकी चरण पादुकाएं लाता है और उन्हें सिंहासन पर रखकर उनके प्रति अपनी ‘एकलव्य भक्ति’ का प्रदर्शन करते हुए राज्य चलाने लगता है। वास्तव में ‘एकलव्य भक्ति’ का पहला उदाहरण भरत हंै, जिन्होंने विश्व के इतिहास में पहली बार सिद्घ किया था कि सच्ची निष्ठा को हृदयंगम कर राजा के ना होते हुए भी राज्य कार्य चलाया जा सकता है। भरत का यह समर्पण भाव भारतीय संस्कृति की एक ईंट बन गया, और यह ईंट इतनी कांतिमान है कि आज भी अलग ही चमकती है। इस ईंट को ‘स्वर्णिम आभा’ प्रदान की थी वेद के इस आदेश ने कि-‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षत्’ अर्थात भाई भाई से द्वेष ना करे।
कितनी महान है भारत की संस्कृति? कहती है कि भाई भाई से द्वेष न करे। यदि द्वेष करेगा तो वह ‘दारा’ के लिए ‘औरंगजेब’ बन जाएगा। सत्ता के लिए भाई की हत्या करने में भी उसे देर नहीं लगेगी। यह देश भरत के समर्पण का और राम के त्याग का देश है-इसकी हवाओं में भरत का समर्पण और राम का त्याग समाहित है, और इस प्रकार समाविष्ट है या गुंठित है कि उसे अलग करके देखा ही नहीं जा सकता।
यही त्यागमयी राम अपने प्रिय अनुज लक्ष्मण को शक्तिबाण लग जाने पर बालकों की भांति रोने लगते हैं, कहते हैं :-
जो जनतेऊं बन बंधु बिछोहूं
पिता बचन मनतेऊं नहिं ओहूं
‘अरे लक्ष्मण! जो मैं यह जानता कि वन में जाकर बंधु वियोग देखना होगा तो पिता के बचनों को भी मैं नहीं मानता और वन नहीं आता। मैं पिता के वचन के लौटने से जो पाप लगता उसे तो झेल लेता पर तुम्हारा वियोग मुझसे झेला नहीं जा रहा।’ शक्तिबाण लगे लक्ष्मण को जगाने का प्रयास करते हुए राम कहते हैं :-
सुत बिना भवन परिवारा, होहिं जाहि जग बारहिं बारा
अस विचारि जियं जागहुं ताता, मिलह न जगत सहोदर भ्राता,
‘हे अनुज लक्ष्मण! पुत्र, धन, स्त्री घर और परिवार ये संसार में बारम्बार होते और जीते हैं। हे तात!  हृदय में ऐसा विचार कर जागो कि संसार में सहोदर भाई दुबारा नहीं मिलता।’
‘जथा पंख बिनु खग अति हीना, 
मणि बिन, फनि करिवर करिहीना 
अस यम बंधु बिन तोहि, 
जौ जड़ दैव जियावै मोहिं।’
जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प, सूंड के बिना हाथी दीन हो जाता है, वैसे ही हे भाई! मेरा जीवन तेरे बिना हो गया है, यदि विधाता फिर भी मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। अब तो मैं यह भी सोचता हूं :-
जैह्ऊं अवध कौन मुहु लाई
नारि हेतु प्रिय भाई गंवाई

‘लोग मुझे ताना देंगे कि नारी के लिए भाई को गंवाने वाला यह राम है? मुझे समझ नहीं आता कि अवध में मैं कौन सा मुंह लेकर जाऊंगा।’ 
आज इस देश में क्या हो रहा है? यही कि एक भाई विधायक बनने के लिए अपने ही एक मासूम भाई को मरवा देता है। मासूम भाई की छाती में गोली उतारते हुए उसे तनिक भी कष्ट नहीं होता, तनिक भी दया नहीं आती, और सब कुछ करने के पश्चात तनिक भी पश्चात्ताप नहीं होता। कितनी सार्थक हैं ये पंक्तियां :-
‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान
कितना बदल गया इंसान, 
सूरज ना बदला, चांद ना बदला
ना बदला रे आसमान….कितना बदल गया….
क्यों बदल गया इंसान? इसलिए बदल गया कि हम ‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षत्’ की वैदिक शिक्षा को साम्प्रदायिक मानने लगे  और ‘औरंगजेब’ को अपना आदर्श मानकर ‘गंगा जमुनी संस्कृति’ के उपासक बन गये। साम्प्रदायिक सोच हमें पूजनीय  दिखने लगी और वास्तव में वंदनीय महापुरूष और वंदनीय संस्कृति हमें हेय दिखाई देने लगी। यदि राम के स्थान पर औरंगजेब को बैठाओगे तो सत्ता संघर्ष तो होना ही है। इस सत्ता संघर्ष को आप इंच इंच के लिए लड़ते हुए भाईयों के बीच में गली मौहल्लों में भी देख सकते हो। भाई-भाई के बीच त्याग भावना समाप्त है वैर है और विरोध है। उसी वैर विरोध ने और स्वार्थ की पराकाष्ठा ने मानव को मानव न छोडक़र दानव बना दिया है। तभी तो राम की इस पवित्र भूमि पर एक भाई सत्ता के लिए अपने ही भाई का रक्त पी रहा है।
आप देखना कभी ध्यान से सडक़ पर कुत्ता मर जाए तो उसे दूसरा कुत्ता आकर संूघता तो है पर उसे कभी खाता नहीं है। कहने का अभिप्राय है कि ‘स्वबंधुद्रोह’ के लिए विख्यात कुत्ता भी खून की इतनी शर्म करता है कि उसे सूंघकर पीछे हट जाता है, मानो अपनी मौन श्रद्घांजलि देते हुए गर्व से कहता है कि-‘मैं तो कुत्ता हूं, अपने भाई से झूंठा ही तो लड़ता हूं, मैं इंसान नहीं हूं  जो भाई का खून पीने के लिए उससे लडंू।’
कुत्ते को गर्व है अपने कुत्ते होने पर हमें शर्म नहीं आती अपने मनुष्य होने पर? भाई ने भाई को मार दिया-यह मानवता के लिए शर्मनाक है सचमुच आज कुत्तों की जय बोलने के लिए मन करता है-पर मानव के लिए नहीं।

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