जब आप किसी के लिए कुछ कहते हैं तो समझ लीजिए कि आपके कहे की वह प्रतिक्रिया अवश्य करेगा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि आप कुछ कहें और आगे वाले की ओर से कुछ भी प्रतिक्रिया ना हो। आगे वाले की प्रतिक्रिया हमारे लिए कर्णप्रिय और हृदय को प्रफुल्लित करने वाली हो-इसके लिए आवश्यक है कि आपकी अपनी वाणी दूसरे के लिए कर्णप्रिय और हृदय को प्रफुल्लित करने वाली हो। हमारे नीतिकारों की मान्यता रही है कि राजनीति में राजनीतिज्ञों को कटाक्ष और व्यंग्य की भाषा से बचना चाहिए, उसके स्थान पर भाषा आपके विरोधी को लपेटने वाली हो, और ऐसी हो कि जिसे समझने में उसे कुछ देर लगे और इससे पहले कि वह आपकी भाषा के शब्दों के अर्थ को समझे-आप अपनी बात को कहकर आगे निकल जाएं। ऐसी भाषा को ही राजनीति में कूटनीति कहा जाता है। ‘कूट’ का अभिप्राय रहस्य से है -एक ऐसे वातावरण से है, जिसे समझने के लिए आपके विरोधी को कई परतें उधेडऩी पड़ेंगी और उसे अपना मस्तिष्क आपके सच को समझने में लगाना पड़ेगा।
भारत के इस कूटनीति के चक्र को पश्चिमी देशों के राजनीतिशास्त्रियों ने ‘डिप्लोमेसी’ का नाम दिया है। यद्यपि ‘डिप्लोमेसी’ और ‘कूटनीति’ में भारी अंतर है। ‘डिप्लोमेसी’ जहां आपको अपने विरोधी के विरूद्घ कुछ भी करने की छूट देती है-वहीं कूटनीति आपके विरोधी की निजता को सुरक्षित रखते हुए व उसके आत्मसम्मान का ध्यान रखते हुए उसको आपके समक्ष परास्त करने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें युद्घ से बचकर आप भयंकर से भयंकर परिस्थिति से भी बच निकलें। ‘डिप्लोमेसी’ में युद्घ के लिए गुप्त संधियां करके युद्घ को निकट लाने ओर विध्वंस को आमंत्रित करने की सारी कपटपूर्ण नीतियों पर न केवल विचार किया जाता है अपितु उन्हें लागू भी किया जाता है। जबकि ‘कूटनीति’ में ऐसे सभी उपायों पर विचार किया जाता है जिससे युद्घ को मानवता के लिए अभिशाप माना जाकर उसे पीछे धकेला जाता है और युद्घोन्मादी शत्रु को विश्व के समक्ष नंगा किया जाता है जिससे सारा विश्व समुदाय यह देख सके कि मानवता का शत्रु कौन है? इस प्रकार ‘डिप्लोमेसी’ में क्रूरता है और कूटनीति में क्रूरता का सामना करने के लिए बनायी जाने वाली एक विवेकपूर्ण रणनीति है। चाणक्य कूटनीति के उदाहरण हैं तो नेपोलियन बोनापार्ट और चर्चिल ‘डिप्लोमेसी’ के उदाहरण हैं। इनके जीवन चरित स्पष्ट कर देंगे कि ‘डिप्लोमेसी’ क्या है और ‘कूटनीति’ क्या है?
राजनीति में कूटनीति की सदा आवश्यकता होती है। यदि कोई राजनीतिज्ञ कूटनीति की सच्चाईयों से परे है तो वह अपने देश के राजनीतिक हितों की रक्षा नहीं कर सकता। हमारी कूटनीति हमें ‘षठे षाठयम् समाचरेत्’  का पाठ भी पढ़ाती है। हमारी कूटनीति की उदारता स्वराष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के प्रति कठोरता में जाकर समाप्त होती है-जो स्पष्ट करती है कि हम उदार तो हैं पर राष्ट्रहितों के प्रति पूर्णत: सजग भी हैं, आप या तो हमारे उपदेश सुनिये-नहीं तो हमारी लाठी के प्रहार को झेलने के लिए भी तैयार रहो।
हमारी कूटनीति की कठोरता में भी उदारता और मानवता झलकती है, क्योंकि हम लाठी के प्रहार से पहले शत्रु को सावधान करते हैं कि-‘संभलो! अब मैं आप पर प्रहार करने वाला हूं।’ इसके विपरीत चर्चिल की कूटनीति शत्रु को अपनी चाल के जाल में फंसाकर छल से मारने की है, इस प्रकार चाणक्य की कूटनीति के विपरीत चर्चिल की ‘डिप्लोमेसी’ क्रूर है, छली है, कपटी है, धोखेबाज है, दानवीय है।
हमारे पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों नोटबंदी के प्रकरण पर प्रधानमंत्री मोदी पर प्रहार करते हुए  उनके इस कार्य को ‘संगठित लूट और कानूनी चूक’ कहकर संबोधित किया था। वास्तव में उनके ये शब्द बहुत ही कठोर थे, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के साहसिक निर्णय का उपहास उड़ाया गया था और उपहास के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया वे निश्चय ही अति कठोर थे। जिन्हें डा. मनमोहन सिंह के भाषण तैयार करने वालों ने बिना सोचे समझे ही गढ़ दिया था। अब बारी थी क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया की। पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अपशब्दों का उत्तर उन्हीं की भाषा में दिया और स्पष्ट किया कि ‘संगठित लूट’ तो डा. मनमोहन सिंह के शासनकाल में मची थी-जब हर मंत्री भ्रष्टाचार की दलदल में आकण्ठ फंसा था और ऐसा लग रहा था कि जैसे हमाम में सभी नंगे हैं और जी भर कर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगा लेना चाहते हैं। निश्चय ही उस समय के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने रेनकोट (वह ईमानदार थे) पहन रखा था, जो ‘बाथरूम’ में घुसे तो सही और नहाये भी खूब-पर अपने शरीर को पानी नहीं लगने दिया अर्थात स्वयं भ्रष्टाचार की कीचड़ से अलग रहे। पीएम मोदी का पूर्व प्रधानमंत्री के लिए इन कूटनीतिक शब्दों का प्रयोग करना जहां उनके व्यक्तिगत चरित्र की रक्षा करने वाला है, वहीं उनके शासनकाल की वास्तविकता को स्पष्ट करने वाला भी है। डा. मनमोहन सिंह अपने आप में ईमानदार थे, यह तो मोदी ने माना, पर वह बेईमानों के संरक्षक बन गये इस पर उन्हें लपेट दिया।
कांग्रेस अपनी वास्तविकता को पी.एम. मोदी द्वारा इन शब्दों में प्रकट करने पर तिलमिला गयी है। उसने प्रधानमंत्री के भाषण का बहिष्कार कर राज्यसभा से बहिगर्मन किया। अब यह तो कोई बात नहीं हुई-यह तो वही बात हुई कि ‘गुलगुले खायें और  गुड़ से परहेज।’ डा. मनमोहन सिंह जैसे विनम्र व्यक्ति से कांग्रेस ने मोदी की नोटबंदी को ‘संगठित लूट’ कहलवा दिया। जिससे ऐसा लगा कि मोदी ने अपने लोगों को नोटबंदी के दौरान संगठित होकर देश को लूटन्ने का ठेका दे दिया था। जबकि ऐसा था नहीं। बस इसी बात को प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस के तरकश से निकलने वाले तीर के रूप में लिया और इसे संभालकर उन्हीं पर चला दिया। अब कांग्रेस अपने ही तीर से घायल हुई छंटपटा रही है और देश से कह रही है कि यह मोदी बड़ा ही तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्ति है, इसे बोलना नहीं आता। पर देश भी समझ रहा है कि तीर किसका है और धनुष किसका है? अपने तीर को ही यदि कांग्रेस पहचान नहीं पा रही है तो इसमें उसका स्वयं का दोष है-देश का या प्रधानमंत्री का कोई दोष इसमें नहीं है।

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