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राजनीति

अब देश में गढ़ा जा रहा है विकास का नया वोट बैंक

न केवल पिछड़ों का, बल्कि इन वोट बैंक माने जाने वाले वर्गों का भी अच्छा खासा हिस्सा उन दलों में बंटता है, जिनको इनके खिलाफ माना जाता रहा है। इनमें से बहुत से मतदाता अपने प्रत्याशी अथवा दल की उपलब्धियों और विकास की नीतियों के कारण उसे मत देते हैं। यह अपने आप में सकारात्मक और लोकतांत्रिक बदलाव है कि अब लोग जाति और धर्म के नाम पर ही नहीं, बल्कि विकास के एजेंडे पर भी वोट देने लगे हैं। यह एक शुभ संकेत है और हमारा लोकतंत्र स्वस्थ लोकतंत्र बन जाएगा।
सन् 2014 का लोकसभा चुनाव अपने आप में विशिष्ट था, वैसे ही जैसे सन् 1972 और 1977 के लोकसभा चुनावों की अलग खासियत थी। सन् 1971 में हमने पाकिस्तान को जंग में हराया था और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश की स्थापना हुई थी। वह एक ऐतिहासिक क्षण था और उससे अगले चुनावों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इसका पूरा लाभ मिला था। तब सारे देश ने एकजुट होकर इंदिरा गांधी को अपूर्व बहुमत दिलाया था। सन् 1977 का लोकसभा चुनाव तो और भी खास था। देश में आपातकाल लागू था और तत्कालीन प्रधानीमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन की छाया में लोकसभा चुनाव संपन्न हुए थे। इस बार फिर देश ने एकजुट होकर लोकतंत्र के पक्ष में मत दिया। सन् 2014 का चुनाव भी इसी प्रकार विशिष्टता लिए हुए था, जब सारे देश ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार और अनिर्णय के विरोध में एकजुट होकर ‘काम करने वाली सरकार’ और ‘विकास करने वाली सरकार’ के पक्ष में वोट दिया। यह वस्तुत: ‘विकास’ का वोट बैंक था। यह क्षेत्रवाद, जातिवाद या धर्म से जुड़ा वोट बैंक नहीं था, यह शुद्ध विकास का वोट बैंक था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह बड़ी जीत थी कि सन् 2014 में वह कद में भाजपा से भी बड़े हो गए और बहुतेरे लोगों ने भाजपा को नहीं, बल्कि मोदी को वोट दिया। मोदी की यह भी बड़ी जीत थी कि मतदाताओं ने क्षेत्र, जाति, संप्रदाय और धर्म से ऊपर उठकर मोदी के विकास के नारे को समर्थन दिया और लंबे समय के बाद किसी एक दल को बहुमत मिला। हालांकि मोदी सरकार भी गठबंधन सरकार है, पर इस बार गठबंधन सरकार विवशता से अधिक व्यावहारिकता का प्रतीक है। सन् 2014 में मोदी का प्रभामंडल इतना चमकीला था कि सारा देश उनके सामने नतमस्तक था। उससे पहले भाजपा के किसी नेता को ऐसा व्यक्तिगत समर्थन नहीं मिला था, हालांकि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह को इसी प्रकार का व्यक्तिगत समर्थन उनसे पहले मिल चुका था, लेकिन भाजपा के किसी नेता की ऐसी व्यक्तिगत लोकप्रियता पहली बार देखने को मिली थी। सन् 2014 का आम चुनाव इस मायने में ऐतिहासिक था। इससे पहले हमारा समाज चरणों में बंटता रहा है। पंजाब के आतंकवाद के समय पहली बार हिंदू और सिखों में खाई बनी। विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करके आरक्षण बढ़ाने से पहली बार सवर्णों और पिछड़ी जातियों में बंटवारे की लाइन खिंची। बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई और गहरी हुई। क्षेत्रवाद के नाम पर राज्यों का बंटवारा होता रहा है। यही नहीं, जाति और संप्रदाय के नाम पर दंगे होते रहे हैं और लोग मरते रहे हैं।
समाज का यह बंटवारा अत्यंत दुखदायी है और लोकतंत्र के लिए घातक है। इस समस्या को और भी विकराल बनाया उन राजनीतिक दलों ने, जिन्होंने क्षेत्र, संप्रदाय और जाति के नाम पर वोट बैंक बनाए और अपने-अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए अलगाववादी सुर अपनाए। लेकिन सन् 2014 के आम चुनावों में जीत के बाद नरेंद्र मोदी भाजपा का चेहरा बन गए और विकास का नारा चल निकला। परिणाम यह रहा कि हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार की घोषणा न होने के बावजूद भाजपा की सरकार बनी और बिलकुल नए तथा राजनीति के क्षेत्र में लगभग अनजान व्यक्तियों ने मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया। लेकिन दिल्ली और बिहार के चुनावों तक आते-आते मोदी सरकार की उपलब्धियों पर सवालिया निशान लगने लगे और भाजपा को निराशाजनक हार का सामना करना पड़ा। लेकिन विकास का नारा यहां भी कामयाब रहा, अंतर सिर्फ इतना था कि दिल्ली और बिहार में विकास के चेहरे बदल गए। बिहार में नीतीश कुमार विकास का पर्याय बने तो दिल्ली में मतदाताओं ने यह भरोसा अरविंद केजरीवाल में जताया। इस समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सभी संबंधित राजनीतिक दलों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बने हुए हैं। माना जाता है कि दिल्ली के सिंहासन की राह उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती है, इसलिए उत्तर प्रदेश की विशेष चर्चा है और सभी दलों का फोकस भी उत्तर प्रदेश पर सबसे ज्यादा है। शुरू में भाजपा ने केंद्र की तरह यहां भी अपने चुनाव का फोकस विकास पर रखने का दावा किया था, लेकिन धीरे-धीरे जब उससे इस सवाल का माकूल जवाब नहीं दिया जा सका कि उसने केंद्र में रहकर अब तक कौन-कौन से विकास के काम किए हैं तो वह फिर से अपने सांप्रदायिक एजेंडे यानी उग्र हिंदुत्व पर लौट आई है।
इसके विपरीत समाजवादी पार्टी और उसके नेता मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अभी तक अपना सारा जोर अब तक किए यूपी के विकास पर लगा रखा है। खेद का विषय है कि आज भी मतदाता के रूप में हम क्षेत्र, संप्रदाय और जाति के मकडज़ाल से बाहर नहीं निकल पाए हैं और आज भी बसपा दलितों व मुसलमानों, भाजपा सवर्ण हिंदुओं, कांग्रेस पार्टी मुस्लिमों और सपा यादवों तथा मुसलमानों के वोट बैंक पर निर्भरता को नहीं छोड़ पा रही। यहां तक कि प्रगतिशील विचारधारा के वाहक रहे अरविंद केजरीवाल भी मुख्यत: दलितों के समर्थन का लोभ नहीं संवरण कर पा रहे। एक तरफ राजनीतिक दल क्षेत्र, धर्म, संप्रदाय और जाति का ज़हर फैलाने से बाज नहीं आ रहे, तो दूसरी तरफ विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े वोट बैंक के मतदाताओं ने चुनाव में अपनी हैसियत खत्म कर ली है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सिर्फ पिछड़े वर्ग के मतदाताओं ने खुद को सही मायने में फ्लोटिंग वोट बना रखा है, जिसके कारण उनकी महत्ता सबसे ज्यादा बनी हुई है और हर राजनीतिक दल इसी फिराक में है कि पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए वह कारगर रणनीति अपनाए। वस्तुत: राजनीतिक दल यह जानते हैं कि हर वर्ग के वोटों का बंटवारा तो होगा ही, लेकिन फिर भी जब कोई राजनीतिक दल किसी एक वर्ग को लुभाने के लिए विशेष प्रयास करता है तो उस वर्ग का जो हिस्सा उसके साथ जुड़ता है, वह उसकी सीट संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी कर सकता है। मिसाल के तौर पर सन् 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को मुसलमानों के 39 प्रतिशत वोट मिले थे और यादवों का वोट प्रतिशत 66 ही था।
ऐसे ही बहुजन समाजवादी पार्टी का वोट बैंक समझे जाने वाले जाटव वर्ग के 62 प्रतिशत मतदाताओं ने ही उसे वोट दिया था, जबकि 2007 के चुनाव में यह फीसद 86 था। इसी तरह जो ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य भाजपा का पक्का वोट बैंक समझे जाते हैं, उनमें से उत्तर प्रदेश के 2012 के विधानसभा चुनाव में उसको क्रमश: 38, 29 और 42 लोगों ने ही भाजपा को अपना मत दिया था।
कहने का मतलब यह है कि न केवल पिछड़ों का, बल्कि इन वोट बैंक माने जाने वाले वर्गों का भी अच्छा खासा हिस्सा उन दलों में बंटता है, जिनको इनके खिलाफ माना जाता रहा है। इनमें से बहुत से मतदाता अपने प्रत्याशी अथवा दल की उपलब्धियों और विकास की नीतियों के कारण उसे मत देते हैं। यह अपने आप में सकारात्मक और लोकतांत्रिक बदलाव है कि अब लोग जाति और धर्म के नाम पर ही नहीं, बल्कि विकास के एजेंडे पर भी वोट देने लगे हैं। यह एक शुभ संकेत है और हमारा लोकतंत्र स्वस्थ लोकतंत्र बन जाएगा अगर ऐसे लोगों की संख्या इतनी बढ़ जाए कि राजनीतिक दलों को विकास के मुद्दों को उपेक्षित करने की हिम्मत न रहे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा होगा और शीघ्र ही होगा।

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