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भारत का चीन को स्पष्ट व दमदार संकेत।*

बृजेन्द्र सिंह वत्स।
भारत शंघाई सहयोग संगठन की अध्यक्षता कर रहा है और इसी नाते भारत में इस संगठन के रक्षा मंत्रियों की बैठक का आयोजन हुआ। इस बैठक में संगठन के भागीदार चीन की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बैठक की अध्यक्षता करते हुए चीन के रक्षा मंत्री जनरल शी फुंगलू की उपस्थिति में भारत की स्थिति को अत्यंत ही दृढ़संकल्पित रूप में प्रस्तुत किया। श्री सिंह का स्पष्ट रूप से यह कहना कि आतंकवाद का निषेध संगठन की प्राथमिकता में होना चाहिए तथा सहयोगी देशों को आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए प्राणपण से उद्यत रहना चाहिए। देखा जाए तो यह चोट सीधी चीन पर पड़ती है क्योंकि आतंकवाद के सबसे बड़े निर्यातक देश पाकिस्तान का यही तो पालन पोषण करता है। इसके अतिरिक्त इन्हीं दिनों पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर भी चीन का दौरा कर रहे हैं और वहां पर रक्षा सहयोग पर बातचीत चल रही है। अब यदि चीन से पाकिस्तान अस्त्र-शस्त्र पाएगा तो उसका प्रयोग जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को प्रायोजित करने में ही तो किया जाएगा। इस परिपेक्ष्य में भी श्री सिंह की टिप्पणी चीन हेतु चेतावनी पूर्ण तथा समयानुकूल थी। इस से पूर्व द्विपक्षीय बैठकों का आयोजन भी हुआ, जिसमें विशेष रुप से चीन के रक्षा मंत्री जनरल शी फुंगलू और रूस के रक्षा मंत्री जनरल सर्गई सोयगू के साथ होने वाली द्विपक्षीय बैठकों का अधिक महत्व है। इन दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के साथ राजनाथ सिंह जी की हुई बैठकों में उनके व्यवहार से बहुत कुछ संकेत मिलते हैं ।एक और जहां रूस के रक्षा मंत्री के साथ गर्मजोशी पूर्ण व्यवहार था,वहीं दूसरी ओर चीन के रक्षा मंत्री से श्री सिंह ने बातचीत के मध्य रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि चीन ने अपनी ओर से भारत के साथ अतीत में हुए एलएसी से संबंधित समझौतों को भंग किया है। गलवान के पश्चात दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की यह पहली बैठक थी। चीनी रक्षा मंत्री द्वारा रक्षा क्षेत्र में सहयोग का प्रस्ताव देते ही,भारतीय रक्षा मंत्री ने सुनते ही इस प्रस्ताव को विचार योग्य भी नहीं माना और तुरंत निरस्त करके भारत के कड़े रुख का संकेत दे दिया । चीन ने भारत के इतने कड़े व्यवहार की अपेक्षा नहीं की होगी और भारत में जो चीनी समर्थक लॉबी काम करती है, वह भी इस व्यवहार पर अपने नाखून चबाने पर विवश हो रही होगी क्योंकि इससे पहले तो भारत के रक्षा मंत्री संसद में यह घोषणा करते थे कि एलएसी पर यदि सड़क बनाई जाएगी तो उसका प्रयोग चीन कर लेगा।इस से स्पष्ट है कि हमारा नेतृत्व चीन के सामने कितना सहमा हुआ रहता था लेकिन २०१४ के पश्चात से ब्रह्मपुत्र में पर्याप्त जल राशि बह गई है। अब भारत पुराना भारत नहीं है।
वस्तुतः चीन की नीति विस्तार वादी है। विश्व के अन्यत्र देशों से चीन का सीमा विवाद चलता रहता है। वह रूस के ब्लडीबास्टक सहित पूरे ताइवान को जापानी, वियतनामी भाग, फिलीपींस के समुद्री भाग सहित अन्य भी न जाने कितने देशों से पंगे बाजी करता रहता है। भारत के प्रति चीन का “अनुराग ” को परखने हेतु थोड़ा अतीत में जाना होगा। चीन में वर्तमान व्यवस्था १९४८ में साम्यवादी क्रांति के फल स्वरुप अस्तित्व में आई। स्वाधीनता के पश्चात प्रारंभ में चीन की कोई सीधी सीमा भारत से नहीं मिलती थी। एक स्वतंत्र राज्य तिब्बत चीन और भारत के मध्य स्थापित था तथा इस प्रकार भारत की सीमा तिब्बत से मिलती थी। चीन की कुदृष्टि तिब्बत पर पड़ने लगी तथा उसकी इसी मनोदशा को भांपते हुए तत्कालीन गृहमंत्री लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने प्रधानमंत्री नेहरु को चेतावनी दी थी कि चीन पर भरोसा करना भारत के दृष्टिकोण से लाभकारी नहीं होगा। चीन की ओर से सदैव सचेत रहना होगा लेकिन कल्पना लोक में खोए नेहरू जी जिन्हें संयोग से तानाशाही व्यवहार के नेता यथा स्टालिन, मार्शल टीटो या कर्नल नासिर सरीखे राजनेता अधिक पसंद थे,ने लौह पुरुष की चेतावनी पर कोई कान नहीं धरे। चीनी नेतृत्व से प्रेम की पींगे इस सीमा तक बढ़ाई गई कि उन्होंने अपनी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को वहां राजदूत नियुक्त कर दिया लेकिन जो होना था , जिसकी कल्पना लौह पुरुष ने की थी और नेहरू को चेतावनी भी दी थी, वही हुआ चीन ने बलात अपना आधिपत्य तिब्बत पर कर लिया। होना तो यह चाहिए था कि भारत को इस आधिपत्य को चुनौती देनी चाहिए थी लेकिन नेहरू ने तिब्बत को चीन का भाग स्वीकार करते हुए इस आधिपत्य को मान्यता दे दी, फल स्वरूप उन्होंने चीन को सीधे भारत की सीमा पर आमंत्रित कर लिया। आज चीन अरुणाचल प्रदेश को केवल इसलिए अपना भाग कहता है की उसके अनुसार अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी भाग है। अब तिब्बत तो चीन का भाग नेहरू जी की कृपा से बना था।
नेहरू जी की विदेश नीति विरोधाभासों से परिपूर्ण थी। १९५९ में जब दलाई लामा तिब्बत से भागे तो उन्हें नेहरु जी ने धर्मशाला में राजनीतिक शरण दी, जहां उन्होंने तिब्बत की निर्वासित सरकार का संचालन आरंभ किया जो आज तक चल रहा है। इस घटना से पूर्व नेहरू जी तिब्बत का अस्तित्व चीन को सौंप चुके थे और इसीलिए यह समस्या आई थी। अब यहां यक्ष प्रश्न यह है कि यदि तिब्बत नाम का कोई देश नहीं था तो नेहरू जी ने उसकी निर्वासित सरकार का संचालन भारत की धरती से क्यों होने दिया ? अर्थात नेहरू जी तिब्बत देश के शासन को स्वीकार कर रहे थे लेकिन तिब्बत देश को वे चीन की गोद में डाल चुके थे। १९६२ में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत की वायु सेना चीन के सापेक्ष अधिक सुदृढ़ थी लेकिन आश्चर्यजनक था कि भारत ने युद्ध में अपनी वायु सेना का उपयोग ही नहीं किया। क्या यह किसी षड्यंत्र के अंतर्गत ऐसा हुआ था अथवा यह रणनीति का भाग था, इस पर शोध होने की आवश्यकता है लेकिन इस युद्ध के परिणाम स्वरूप ऑक्साईचिन भारत से चीन के अधिकार में चला गया और इस भूभाग के माध्यम से चीन का सीधा संपर्क तिब्बत से जुड़ गया और चीन ने नेहरू जी के जीते जी तिब्बत पर पूर्णरूपेण अपना आधिपत्य जमा लिया। अभी हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के कुछ शहरों के नाम चीन ने परिवर्तित किए हैं । भारत की सरकार द्वारा जो उत्तर दिया जाना था वह दिया गया है लेकिन दुर्भाग्य से भारत के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित किसी ने भी चीन की इस कुचेष्ठा पर कोई विरोध नहीं किया है।
चीन के प्रति कॉन्ग्रेस का व्यवहार कुछ अलग ढंग का है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गांधी के अलावा संभवत: विश्व का कोई और नेता यह धारणा नहीं रखता होगा कि चीन सद्भावना के मार्ग पर चलता है। राहुल जी ने अपने लंदन प्रवास के समय यह टिप्पणी की थी कि चीन सद्भावना का व्यवहार करता है जबकि वस्तुस्थिति यह है कि चीन में तो सद्भावना नामक चिड़िया फड़फड़ाती ही नहीं है। जो चीन शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात कह रहे अपने नागरिकों को थ्येनमन चौक पर टैंक चलवा सकता हो,वहां कैसी सद्भावना? हो सकता है कि थ्येनमन चौक की घटना राहुल के संज्ञान में न हो लेकिन वर्तमान में शिंजियांग प्रांत में चीन द्वारा उइगर मुसलमानों के साथ जो पाशविक व्यवहार किया जा रहा है उससे समस्त मानवता लज्जित है, इसमें राहुल को सद्भावना दिखाई दे रही है तो यही कहा जाएगा कि वह भी अपने पूर्वज के बताई राह पर ही चल रहे हैं। हो सकता है इस सद्भावना के नेपथ्य में वह समझौता भी हो जो राहुल ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ किया है। यह समझौता एक रहस्य है। क्या एक दल विशेष का नेता किसी देश की सत्ता साथ कोई गोपनीय समझौता कर सकता है? राहुल गांधी और चीनी सत्ता के बीच हुए इस समझौते के प्रतिबंधों को देश के सामने उजागर होना ही चाहिए।
भारत में आज वीरोचित राजनैतिक इच्छा शक्ति से परिपूर्ण नेतृत्व कार्य कर रहा है। पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र के एक ग्राम में एक रात व्यतीत कर करके आए हैं और इस प्रकार उन्होंने चीन को निश्चित भाषा में संदेश दे दिया है कि अरुणाचल भारत का ही अभिन्न अंग है। इस गांव को गृहमंत्री ने अरुणाचल का प्रथम गांव कहां है, ठीक इसी प्रकार जैसे कुछ समय पहले प्रधानमंत्री उत्तराखंड के चीनी सीमा से लगे एक ग्राम में पहुंचे थे, अभी तक उस गांव को देश का अंतिम गांव कहा जाता था लेकिन प्रधानमंत्री ने उसे देश का प्रथम गांव कहा था। भारत सरकार अरुणाचल से लेकर उत्तराखंड तक जितनी भी चीन से लगी हुई भारत की सीमा से जुड़े हुए लगभग ३००० गांव में वाइब्रेंट विलेज योजना के अंतर्गत सब सुख-सुविधाओं का जाल बिछा रही है । पर्यटन के दृष्टिकोण से भी इन गांव को विकसित किया जाएगा जिससे भारत के अन्य छोर के नागरिक भी यहां पर आवागमन कर सकें। भारत सरकार का इससे मंतव्य स्पष्ट है कि चीनी सीमा से सटे हुए समस्त भारतीय गांवों में जनजीवन सुचारू रूप से चलता रहे और वहां बसने वाले नागरिक भी भारतवर्ष की आम धारा से जुड़े रहें। अब तक चीन निर्जन तथा सूनापन का लाभ उठाकर भारतीय भूमि पर अतिक्रमण करने का जो प्रयास करता था वह निष्फल हो जाएगा और इस प्रकार चीन की सीमा पर जीवंत भारत खड़ा होने का प्रयास कर रहा है इसके अतिरिक्त चीनी सीमा पर भारतीय सशस्त्र सेनाएं अपना प्रभाव और अधिक विस्तृत कर रही हैं। एस४०० डिफेंस सिस्टम तथा राफेल विमानों की चीनी सीमा पर तैनाती से भारत के सशस्त्र बलों को और अधिक बल मिला है।
भारत को तिब्बत का प्रकरण उठाना चाहिए। भारत तिब्बत की निर्वासित सरकार का शरणदाता है। उस निर्वासित सरकार के देश के विषय में फिर से भारत को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए। तिब्बत एक संप्रभु देश रहा है और भारत को तिब्बत की संप्रभुत्ता तथा स्वायत्तता के लिए कूटनीतिक स्तर पर और अधिक प्रयास करने चाहिए। भारत को ताइवान से भी अपने संबंध अधिक दृढ करने चाहिए इससे चीन पर अतिरिक्त दबाव बनेगा। भारत में इस समय जो राजनीतिक चेतना नेतृत्व दे रही है उससे ऐसे निर्णय लेने की अपेक्षा की जा सकती है क्योंकि उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति है। संभव है कि भविष्य में ये योजनाएं मूर्त रूप लेती दिखाई दें।

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