सर्वधर्मसमभाव का भ्रम-3

राकेश कुमार आर्य

हमें चाहिए कि हम
धर्म के वास्तविक
अर्थों को समझें,
ग्रहण करें और
मानवीय समाज के
शत्रु संप्रदायों के
दानवी स्वरूप को
त्यागें। किसी भी
मजहब अथवा संप्रदाय
की धर्म पुस्तकों
की उन व्यर्थ
बातों को भूलने
और मिटाने का
संकल्प लें जो
सृष्टिïक्रम और
विज्ञान के सिद्घांतों
के सर्वथा विपरीत
हैं। ऐसी नब्बे
प्रतिशत व्यर्थ की बातों
को समीक्षा और
विवेचना की अपनी
छलनी में छान
दें।

आज हमारे तथाकथित राजनेता
इसी खेल को
खेल रहे हैं।
जो शास्त्र इन्हें
वास्तविकता का ज्ञान
करा सकते हैं
उन्हें ये साम्प्रदायिकता
को बढ़ावा देने
वाले शास्त्र मानते
हैं, और जो
साम्प्रदायिकता को वास्तव
में बढ़ाते हैं
उन्हें ये पढऩा
चाहते हैं। इसलिए
बेचारे पका रहे
हैंबेमेल की
खिचड़ीअर्थात सर्वधर्म समभाव
की खिचड़ी। देखें
यहबीरबल की
खिचड़ीकब तक
पकती है?

प्रजा राजा का
अनुकरण करती है

मुझे दो महापुरूषों
के जीवन की
दो घटनायें स्मरण
रही हैं,
जो कि आज
के स्वार्थी राजनीतिज्ञों
और अन्य लोगों
के लिए मार्गदर्शन
कर सकती हंै।
पहली घटना है
महर्षि दयानंद सरस्वती जी
के जीवन की
और दूसरी घटना
है स्वामी विवेकानंद
जी के जीवन
की। देखिये

महर्षि दयानंद जी का
चिंतन

एक बार महर्षि
दयानंद जी फर्रूखाबाद
में गंगा के
किनारे एक झोंपड़ी
में रह रहे
थे, उनका एक
कैलाश नाम का
भक्त उनके दर्शन
करने वहां पहुंचा।
झोंपड़ी के बाहर
से ही कैलाश
ने भीतर आने
की अनुमति पूज्यवर
स्वामी जी से
मांगी। स्वामी जी ने
स्मिताहास में कहा-”यदिकैलाश
इस झोंपड़ी में
सकता है
तो अवश्य आये।
भीतर आने पर
कैलाश ने स्वामी
जी से कहा-”आप इतने
ऊंचे स्तर के
तपे हुए महात्मा
हैं कि आपको
मोक्ष पद की
प्राप्ति होना सहज
संभव है। मैं
सोचता हूं कि
आप इसके उपरांत
भी समाज सुधार
के कार्य में
अपना समय नष्ट
कर रहे हैं,
क्या यह गलत
नहीं है?”

यह सुनकर महर्षि गंभीर
हो गये। कुछ
क्षण मौन रहकर
जो उत्तर उन्होंने
दिया वह सचमुच
बड़ा ही मार्मिक
था। उन्होंने कहा
कि-”मैं स्वयं
मोक्ष पाना नहीं
चाहता। मुझे स्पष्ट
दिखाई दे रहा
है कि संसार
में सर्वत्र अशांति
है, यह अश्रु
सागर में डूब
रहा है, दुखों
की अग्नि में
झुलस रहा है,
अत्याचारों से त्रस्त
है, तब भला
ऐसी स्थिति में
उसे अनदेखा कैसे
कर सकता हूं?
मैं मोक्ष प्राप्ति
का इच्छुक नहीं
हूं, ही
केवल अपने लिए
मिलने वाले मोक्ष
का अभिलाषी हूं।
मैं मुक्त होऊंगा,
तो सबको साथ
लेकर, अन्यथा मुझे
मुक्ति नहीं चाहिए।

स्वामी विवेकानंद की जीवन
दृष्टि

स्वामी विवेकानंद जी कहीं
चले जा रहे
थे। रास्ते में
एक नदी आयी।
जिसके किनारे खड़े
होकर वह रूक
गये और नाव
की प्रतीक्षा करने
लगे। कुछ देर
पश्चात वहां एक
महात्मा आये। परिचयोपरांत
महात्मा ने स्वामी
जी से वहां
खड़े होने का
कारण पूछा। स्वामी
जी ने  नदी पार
करने हेतु नाव
की प्रतीक्षा में
खड़ा होना अपना
प्रयोजन बताया। इस पर
वह महात्मा कहने
लगे कि तुम
तो स्वामी हो,
बड़े आध्यात्मिक गुरू
और दार्शनिक माने
जाते हो। जरा
सी नदी पार
नहीं कर सकते,
तो क्या करोगे?
इस कार्य के
लिए इतनी देर
खड़े रहोगे तो
आगे क्या करोगे?

ऐसा कहकर वह
महात्मा नदी के
पानी पर चलते
हुए स्वयं कुछ
क्षणों में नदी
का चक्कर लगाकर
अर्थात दूसरे किनारे को
छूकर वापस
गये। इस सिद्घि
पर आश्चर्य व्यक्त
करते हुए उनसे
पूछा कि आपने
यह सिद्घि कैसे
प्राप्त की? महात्मा
जी गर्व से
फूले हुए कहने
लगे-”यह सिद्घि
ऐसे ही नहीं
मिली। इसके लिए
मुझे पूरे तीस
वर्ष हिमालय की
कंदराओं में जाकर
गहन तपस्या करनी
पड़ी है।स्वामी
ऐसा सुनकर कहने
लगे कि-”महात्मन्
नदी पार करना
तो मात्र दो
पैसे की बात
थी। इस बात
के लिए आपने
अपने जीवन के
तीस वर्ष लगा
दिये। इस समय
को जनसेवा में
लगाते तो समाज
और संसार का
कितना कल्याण होता?”
महात्मा जी स्वामी
जी का ये
तर्क सुनकर निरूत्तर
खड़े रह गये।
इन दोनों घटनाओं
ने मेरे मानस
को झकझोर दिया।
सचमुच बड़ा वही
होता हैजिसकी
सोच बड़ी होती
है, और जिसका
लक्ष्य बड़ा होता
है। महर्षि दयानंद
और स्वामी विवेकानंद
बड़े इसलिए थे
कि उनका जीवन
दर्शन बड़ा था,
सोच बड़ी थी
और लक्ष्य बड़ा
था। निजी स्वार्थों
की पूर्ति करना
यदि उनका लक्ष्य
होता तो संसार
आज उन्हें इतनी
श्रद्घा से स्मरण
और नमन
कर रहा होता।
उनके जीवन में
परमार्थ रहा, इसलिए
संसार आज उन्हें
स्मरण और नमन
कर रहा है।

इन लोगों के लिए
स्वार्थ संसार रूपी नदी
की उस मुख्य
धारा का नाम
है जो बड़ेबड़ों का अपने
साथ बहा ले
जाने के कारण
अपने ऊपर बड़ा
घमण्ड करती है।
जबकि संतों के
लिए परमार्थ रूपी
नदी का वह
किनारा है, उसमें
वह स्वयं ही
नहीं अपितु

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