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अक्षय तृतीया पर्व

डॉ डी के गर्ग

“भारतीय पर्व एवं परम्पराये ” से साभार

अक्षय तृतीया का पर्व वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।
प्रचलित कथा: यह कथा इस प्रकार है कि एक धर्मदास नाम के व्यक्ति ने अक्षय तृतीया का व्रत किया। इसके बाद ब्राह्मण को दान में पंखा, जौ, नमक, गेहूं, गुड़, घी, सोना और दही दिया। हर साल वह पूरी श्रद्धा और आस्था से अक्षय तृतीया का व्रत करते थे।
पौराणिक मान्यताये:
1. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं उनका अनेकों गुना फल मिलता है।यह तिथि दान और पुण्य की तिथि है। इस तिथि मे किया गया दान और पुण्य अक्षय होता है मतलब दान और पुण्य का फल तो आपको मिलता है, साथ ही पुण्य नष्ट नही होता। पुण्य अक्षय बना रहता है।इस प्रकार के दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा वे समस्त वस्तुएं स्वर्ग में गर्मी की ऋतु में प्राप्त होगी।
२. भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन बिना पंचांग देखे ही शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि किये जा सकते हैं।
३. पुराणों के मुताबिक अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका से हुआ था। इसी कारण अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम की पूजा की जाती है।
४. इसी दिन भगवान विष्णु के चरणों से धरती पर गंगा अवतरित हुई।
५. सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इसी दिन से होती है।
६. हिंदू मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सोना का जेवर खरीदने से घर में धन लाभ होता है। घर में सुख शांति और समृद्धि होती है। घर के लोगों की तरक्की होती है।
विश्लेषण: पहले इस पर्व के नाम पर विचार करते है।
१. अक्षय का अर्थ होता है जिसका कभी क्षय ना हो यानी जो कभी नष्ट ना हो।
२. तृतीया यानि बैसाख के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन, यानि अक्षय तृतीया का अर्थ है तृतीया जो क्षय न हो। अक्षय तृतीया का पर्व बसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है।
आगे इस पर्व के पीछे दी गयी सभी मान्यताओं पर एक-एक करके विचार करते है।
मान्यता १- प्रश्न उठता है की क्या अच्छे कार्य के लिए क्या इसी दिन का इंतजार किया जाये? क्या बाकी दिन गलत कार्य किये जा सकते है। धर्म कहता है की हमेशा अच्छे कार्य ही करें चाहे कितनी भी मुसीबते आये ।
आज के दिन दान पुण्य का फल मिलना: दान करना हमारी अति प्राचीन परम्परा है। लेकिन शाश्त्र कहते है की दान केवल सुपात्र को दिया जाये और दान सुपात्र को उसकी आवश्यकता के अनुसार अपनी छमता के अनुसार ही देना चाहिए इसके लिए किसी विशेष दिन की प्रतीक्षा की जरुरत नहीं है लेकिन दान बिना किसी लालच के और बिना किसी बदले की भावना से, फल प्राप्ति की इच्छा के लिए नहीं करना चाहिए। ईश्वर स्वतः इसके पुण्य का निर्धारण करता है ।
मान्यता -२ इस दिन बिना पंचांग देखे ही शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि किये जा सकते हैं। ये शुभ कार्य भी कभी भी किये जा सकते है, किसी कार्य के लिए पंचांग पर निर्भर रहना अंधविस्वास है, ईश्वर के बनाये सभी दिन शुभ होते है ।
मान्यता -३ परशुराम का जन्म इस दिन होना इस पर्व को मनाने का विशेष कारण नहीं कहा जाता है, इसका मतलब ये एक संयोग हो सकता है
मान्यता -४ इस दिन भगवान् विष्णु के चरणों से गंगा अवतरित हुई। यदि ये मान भी लिया जाये तो गंगा तो केवल भारत में और सिर्फ ३-४ राज्यों तक ही सीमित है। फिर की ईश्वर ने बाकी दुनिया और भारत वासियो के साथ भेदभाव किया ? फिर तो ये पर्व जैसे राजस्थान,पंजाब, हिमाचल आदि में नहीं होना चाहिए जबकि वहा भी जोर शोर से मनाते है। इसका मतलब ये कारण नहीं हो सकता, कोई और कारण है ।
ईश्वर ने दुनिया का निर्माण करने से पहले जल, वायु, पृथ्वी आदि दिए। ईश्वर, जीव और प्रकृति सनातन है कभी नष्ट नहीं होती। इसमें जल भी एक पांच तत्व है।
विष्णु का अर्थ: (विष्लृ व्याप्तौ) इस धातु से ‘नु’ प्रत्यय होकर ‘विष्णु’ शब्द सिद्ध हुआ है। ‘वेवेष्टि व्याप्नोति चराऽचरं जगत् स विष्णुः’ चर और अचररूप जगत् में व्यापक होने से परमात्मा का नाम ‘विष्णु’ है।
इस अलोक में उपरोक्त कारण भी सही नहीं है। और इसका कोई प्रमाण भी नहीं है।
मान्यता -५ अन्य मान्यता है की सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इसी दिन से होती है। लेकिन इसके पीछे प्रमाण क्या है ? ये मान्यता हिन्दू नव वर्ष जो अप्रैल के प्रथम सप्ताह में आता है, के विपरीत है।
मान्यता -६ सोना आदि खरीदने से धन की वृद्धि होने की बात भी गले नहीं उतरती क्योकि इससे ये बात उठती है की क्या ये पर्व गरीबो के लिए नहीं है जिनको दो समय का भोजन भी नहीं मिल पाता? गरीब क्या करेगा इस दिन ? क्या हमारे पर्व भी इस अंधविस्वास पर है की इसी दिन खरीदे चाहे सोना चांदी आदि दुगने दाम में मिले?
सारांश और पर्व की वास्तविकता: मेरा हमेशा से ये विचार रहा है की कोई भी पर्व अकारण सुरु नहीं हुआ इसलिए यथार्थ पर जाना चाहिए। इस पर्व को कब, कैसे सुरु किया गया इसका कोई प्रमाण नहीं है, हां कारण बताने के लिए अंधविस्वास और तुक्के बाजी का सहारा लिया गया है।
बहुत गहरायी से इस पर्व के आगे पीछे की परम्पराओं पर विचार किया तो मालूम हुआ की कुछ ही समय पहले हमारे देश में बैसाखी, बीहू, ओणम, जैसे पर्व पूरे देश के चारो और मनाये गए थे जो अच्छी फसल ध्कृषि को लेकर थे। भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषक की खुशहाली देश की खुशहाली है। ये बैसाख माह ऐसा महीना है जिसके मध्य तक फसल पकने के बाद कट चुकी होती है। कई माह के परिश्रम के बाद किसान को कुछ समय का विश्राम मिल जाता है।कुछ दिन आराम के बाद भूमि फिर से तैयार हो जाएगी। कुछ बारिश भी होगी। और ज्वार, बाजरा, तिल, दलहन की बुवाई का समय आ जायेगा। किसान फसल को बाजार में उचित दाम में बेच देता है। अनाज के भण्डारण होते है। चारो तरफ खुशहाली और समृद्धि दिखाई देती है। इस कारण से शाश्त्रो में धन कमाना और धन खर्च करना दोनों आवश्यक कार्य बताये गए है। इसलिए परिवार के लिए जरुरत का सामन खरीदना चाहिए। इससे चारो तरफ सभी को मजदूर से लेकर किसान और व्यापार करने वाले को लाभ होता है।
जब किसान फुर्सत में हो और जेब में पैसा हो तो विवाह आदि कार्यो के लिए यही शुभ समय कहलायेगा इसलिए अक्षय तृतीया के आसपास हमारे पूर्वजो ने इस कार्य को शुभ माना है। और अभी ये कार्य जैसे विवाह आदि नहीं करना हो तो ये सलाह है की भविष्य के लिए सोना चांदी खरीद सकते है ।
ये एक सामाजिक पर्व है, इसका अन्य कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता।

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