अमरसिंह राठौड़ का शौर्य है आज भी प्रेरणा का स्रोत

पी.एन.ओक कहते हैं….
अपनी पुस्तक ”क्या भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं द्वारा लिखा गया है?” में लिखी गयी भूमिका में पी.एन. ओक महोदय लिखते हैं :-
”भारतीय इतिहास में जिन विशाल सीमाओं तथा अयथार्थ और मनगढ़ंत विवरण गहराई तक पैठ चुके हैं, वह राष्ट्रीय घोर संकट के समान है। जो अधिक दुखदायी बात है वह यह है कि प्रचलित ऐतिहासिक पुस्तकों में समाविष्ट इन तोड़-मरोड़ों भ्रष्ट विवरणों तथा विसंगतियों के अतिरिक्त अनेक विलुप्त अध्याय भी हैं। इन विलुप्त अध्यायों का संबंध विशेष रूप से उस साम्राज्यशाली प्रभुत्व से है जो भारतीय क्षत्रियों को दक्षिण पूर्व प्रशांत महासागर में बाली द्वीप से उत्तर में बाल्टिक सागर  तथा कोरिया से अरेबिया और संभवत: मैक्सिको तक प्राप्त था। कम से कम उसी विशाल क्षेत्र में तो वे दिग्विजयें (सभी दिशाओं को विजय करना) हुई थीं जो हम बहुधा भारतीय  वांग्मय में पाते हैं। हमारे आधुनिक इतिहास ग्रंथ उन पराक्रमों का कुछ भी उल्लेख नही करते।”
भारत के जिस पराक्रमी इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को विलुप्त करने का राष्ट्रघाती कार्य किया गया है उसके अनेक पृष्ठों को हम अपनी इस लेखमाला के माध्यम से अब तक बहुत अधिक सीमा तक कर चुके हैं। अब एक ऐसे ही अन्य स्वर्णिम पृष्ठ पर चर्चा करना उचित प्रतीत होता है। इस पृष्ठ का नाम है अमरसिंह राठौड़।

अमरसिंह राठौड़ के विषय में संक्षिप्त जानकारी
राव अमरसिंह राठौड़ मध्यकालीन भारत का एक ऐसा दैदीप्यामान नक्षत्र है, जिसके व्यक्तित्व पर यदि शोध करके पूर्ण प्रकाश डालने का प्रयास किया जाएगा तो देश की युवा पीढ़ी मारे रोमांच के उछल पड़ेगी। वैसे वीरों का वसंत होना भी ऐसा ही चाहिए, जिसके रंग में रंगकर युवा बलिदानी होली खेलने के लिए लालायित हो उठें। इतिहास का कार्य भी यही है कि इतिहास की धारा को ना तो विलुप्त होने दिया जाए और ना ही सुप्त होने दिया जाए। राव अमरसिंह राठौड़ भारत के इतिहास का वह प्रकाश स्तंभ है जो सदियों से भारत के युवा के लिए राष्ट्रीय राजपथ पर प्रकाश उत्कीर्ण कर रहा है, उसका मार्ग दर्शन कर रहा है।
अमरसिंह राठौड़ के पिता महाराजा गजसिंह थे। महाराजा गजसिंह जोधपुर के राजा थे। उनकी सोनगरी रानी मनसुखदे ने विक्रमी संवत 1670 पोष सुदी 11 दिन रविवार तदानुुसार 12 दिसंबर 1613 ई. को एक पुत्ररत्न को जन्म दिया। इस बच्चे का नाम इतिहास ने राव अमरसिंह राठौड़ के रूप में जाना।
प्रत्येक बच्चा अपने समय में शैतानी करता है। कुछ बच्चे कम करते हैं तो कुछ अधिक शैतानी करते हैं। हर माता-पिता भली प्रकार यह जानते हैं कि बच्चे शैतानी तो करते ही  हैं। परंतु इसके उपरांत भी हर युवा पीढ़ी बच्चों की शरारतों को उतने हल्के रूप में नही लेती, जितने में लेना चाहिए। कई बार ऐसा हेाता है कि नई पीढ़ी की उच्छ्रंखलताएं पुरानी पीढ़ी को कुछ अधिक ही अप्रिय लगने लगती हैं। जिसका परिणाम यह आता है कि दोनों पीढिय़ों के मध्य ‘मनभेद’ ही उत्पन्न नही हो जाते हैं, अपितु मनभेद भी इतने गहरे हो जाते हैं कि जिन्हें मापना या पाटना ही असंभव हो जाता है।

अमरसिंह राठौड़ था असाधारण साहसी
अमरसिंह राठौड़ अपने बचपन में उच्छं्रखल प्रवृत्ति वाला था। पर उसकी उच्छ्रंखलताओं में असाधारण साहस और स्वतंत्र प्रकृति का भाव छुपा हुआ होता था। उसके उपरांत भी राव अमरसिंह राठौड़ के पिता गजसिंह को यह सब अच्छा नही लगता था। अमरसिंह राठौड़ को अपने कार्यों और निर्णयों में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार्य नही था। इसलिए पिता पुत्र में दूरियां बनती चली गयीं। अमरसिंह राठौड़ में एक वीर के सारे गुण विद्यमान थे, एक देशभक्त की सारी देशभक्ति विद्यमान थी और एक कुलीन की सारी कुलीनता विद्यमान थी। परंतु पिता ने अपने पुत्र के भीतर इन सब गुणों के रहते हुए भी अपने कनिष्ठ पुत्र कुंवर जसवंतसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
अमरसिंह राठौड़ को जब पिता के निर्णय की जानकारी मिली, तो उस महावीर ने उसी श्रीराम की परंपरा का निर्वाह किया जिसने पिता की इच्छा मात्र से वन जाना स्वीकार कर लिया था, और राज्य को लेकर अपने भाई भरत के प्रति अपने हृदय में  तनिक सा भी विद्वेष भाव उत्पन्न नही होने दिया था। 
अब तक भारत में ऐसे अनेकों राम हो चुके थे जिन्होंने पिता की इच्छा को ही अपने लिए आदेश माना और राज्य सिंहासन को त्यागकर उस ओर देखा तक भी नही। इसी को वीरता कहते हैं-जिसका अभिप्राय है कि अपने भीतर के अहम को जीत लेना। अपने हृदय में अहम के स्थान पर निर्विकारता उत्पन्न कर लेना या द्वंद्वों को अपने भीतर उत्पन्न तक न होने देना-छोटी मोटी साधना का लक्षण नही है-यह। इसके लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। बहुत कुछ सहना पड़ता है।
अमरसिंह राठौड़ ने इसी बात का परिचय दिया कि वह बहुत कुछ करने वाला भी है और बहुत कुछ सहने वाला भी है। 13 अप्रैल 1634 को वह जोधपुर से निकलकर बिलाड़ा होते हुए मेड़ता चला गया। यहां जाकर उसने शाही (बादशाह शाहजहां की) सेवा में जाने का विचार बनाया। उसके पिता पहले से ही शाही सेवा में थे। उन्होंने उसे शाही सेवा में लेने के लिए अपने पास बुलावा भेजा। 

शाहजहां के सैन्य दल में सम्मिलित हो गया राठौड़
अमरसिंह ने पिता के आदेश को मौन रहकर यथावत स्वीकार कर लिया। गजसिंह उस समय लाहौर में थे। इसलिए अमरसिंह राठौड़ वहीं चला गया। पिता ने अपने पुत्र का परिचय बादशाह शाहजहां से कराया। शाहजहां को तो मानो ऐसी घड़ी की ही प्रतीक्षा थी कि किसी राजा का कोई उत्तराधिकारी उसकी शरण में आये तो सही। इसलिए शाहजहां ने अमरसिंह राठौड़ को सहर्ष अपनी सेवा में लिया और उसे डेढ़ हजार सवार का मनसब व जागीर में पांच परगने दे दिये।

राठौड़ को शाहजहां ने बना दिया सेना नायक
शाहजहां अमरसिंह राठौड़ की वीरता से और उसके गुणों से प्रभावित था। इसलिए उसने राठौड़ को कई युद्घों में अपनी सेना का नेतृत्व देकर भेजा। अमरसिंह ने भी कई युद्घ जीते और अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया। अमरसिंह राठौड़ का उदभव होता जा रहा था, अब लोग धीरे-धीरे उसे एक महायोद्घा के रूप में जानने लगे थे, उसकी ख्याति दूर-दूर तक फेेल गयी थी।
सूर्य देवता कई बार घटाओं में रहकर भी अपनी गरमी से लोगों को अपनी उपस्थिति की अनुभूति करा देता है। इसी प्रकार महापुरूष कष्टों में रहकर ही अपनी महानता का परिचय देते हैं। मानो कष्ट ही उसकी महानता के सिरजन का कार्य कर रहे हैं  अन्यथा उसका निर्माण भी संभव नही था। इसलिए विवेकशील लोग कष्टों का सामना बड़ी सावधानी से करते हैं, उनका साहस और धैर्य अक्षुण्ण रहता है, और कदाचित ये दोनों तत्व ही उस महावीर के महान जीवन की ढाल बन जाते हैं। अमरसिंह के साथ भी ऐसा ही हो रहा था।

नागौर का परगना दे दिया शाहजहां ने
इसी मध्य 6 मई 1538 ई. को जोधपुर के राजा गजसिंह का देहांत हो गया। बादशाह शाहजहां ने महाराजा की अपनी  इच्छा का सम्मान करते हुए उसके छोटे पुत्र जसवंत सिंह को खिलअत प्रदान की और उसे 4 हजारी जात और 4 हजार सवार का मनसब, राजा का खिताब, नक्कारा, झण्डा सोने की जीन का घोड़ा और खासा हाथी भी भेंट में दिया। बादशाह ने अमरसिंह राठौड़ का पद बढ़ाकर तीन हजारी जात व तीन हजार सवार का मनसब तथा नागौर का परगना प्रदान कर दिया।
नागौर का परगना मिल जाने पर अमरसिंह ने मुगल दरबार में रहकर मुगलों की चाटुकारिता करने के स्थान पर नागौर में स्वतंत्र रूप से रहना श्रेयस्कर समझा। इसलिए वह बादशाह से अनुमति प्राप्त कर नागौर चला गया। वहां जाकर अमरसिंह ने अपना शासन सुचारू रूप से करना आरंभ कर दिया।

अमरसिंह का चरित्र चित्रण
अमरसिंह राठौड़ के विषय में डा. हुकुमसिंह भाटी ने अपनी पुस्तक ‘वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़’ में लिखा है :-”राजस्थान की इस धरती पर वीर तो अनेक हुए हैं-पृथ्वीराज चौहान, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़ आदि पर अमरसिंह की वीरता एक विशिष्ट थी, उसके शौर्य में पराक्रम की परकाष्ठा के साथ रोमांच के तत्व भी विद्यमान थे। उसने अपनी आन बान रखने के लिए 31 वर्ष  की आयु में ही इहलीला समाप्त कर ली। आत्मसम्मान की रक्षार्थ मर मिटने की इस घटना को जन जन का समर्थन मिला। सभी ने अमरसिंह के शौर्य की सराहना की। साहित्यकारों को एक खजाना मिल गया। उन्होंने अमरसिंह के आदर्शों का गुणगान करने के लिए डींगलगीत, कविता, दोहे, झमाल जिलों का, ऊबाका और बात अनेकों रचनाएं रच डालीं। रचना धर्मियों के साथ ही कलाकारों ने एक ओर जहां कठपुतली का मंचन कर अमरसिंह की जीवनगाथा को जनजन में प्रदर्शित करने का उल्लेखनीय कार्य किया, वहीं दूसरी ओर ख्याल लेने वालों ने अमरसिंह के जीवन मूल्यों का अभिनय बड़ी खूबी से किया। रचना धर्मियों और कलाकारों के संयुक्त प्रयासों से अमरसिंह जनजन का हृदय सम्राट बन गया।”
राव अमरसिंह राठौड़ जैसे वीर योद्घा के लिए श्री भाटी का यह कथन उचित ही है। उसने अपने जीवन में वह कार्य किया जिसका गुणगान भारत की आने वाली पीढिय़ां युग-युगों तक गायेंगे। अब हम उसके जीवन के उसी पक्ष पर चलते हैं जिसके कारण अमरसिंह राठौड़ ‘अमरसिंह राठौड़’ बना।

‘अमरसिंह राठौड़’ का जीवन था रोमांचकारी 
उन दिनों मुगल वंश के बादशाह शाहजहां का शासन था। उसके शासनकाल को महिमामंडित करते हुए कई इतिहासकारों ने ‘स्वर्णयुग’ तक कह दिया है और भारत से इस स्वर्णयुग पर गर्व करने की अपनी एक पक्षीय संस्तुति भी आरोपित कर दी है। 
शाहजहां की हिंदुओं के प्रति नीति में कोई परिवर्तन नही आया था। उसने भी हिंदुओं के प्रति अपनी उसी परंपरागत नीति का पालन किया जो उसके पूर्ववर्ती मुगल शासक  करते आये थे। कई स्थानों पर हिंदू को हिंदू से लड़ाकर अपना स्वार्थ सिद्घ कर जाने की बातें इस बादशाह की ओर से भी की गयीं।
इस बादशाह के भीतर अपने मित्रों, सहयोगियों और विश्वास पात्रों के प्रति भी शंका आशंका के बादल उतनी ही शीघ्रता से उमड़ते-घुमड़ते और बरसते थे जितनी शीघ्रता से अन्य मुस्लिम शासकों के हृदय में ऐसी विनाशकारी मचलन उत्पन्न करते थे।
जब राव अमरसिंह राठौड़ नागौर जाकर रहने लगा तो उसके प्रति ईष्र्या भाव रखने वाले लोगों ने बादशाह से उसकी मित्रता को समाप्त कराने के उद्देश्य से बादशाह के सामने उसकी निंदा चुगली करनी आरंभ कर दी।

शाहजहां बनाने लगा राठौड़ से दूरी
‘उन्हें भी निंदा श्रवण में रस उपजता है जो किसी की भी स्वयं निंदा नही करते।’ इसलिए निंदा सुनने वाले को भी अच्छी लगती है। फलस्वरूप शाहजहां भी निंदा-श्रवण के उपरांत राव अमरसिंह राठौड़ से धीरे-धीरे दूरियां बनाने लगा। संयोग की बात रही कि इसी समय नागौर और बीकानेर के दो गांवों (जाखपीया नागौर का, और सीलवा बीकानेर राज्य का) में सीमा विवाद की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गयी। यह विवाद इतना बढ़ा कि दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विरूद्घ युद्घ करने की तैयारियां करनी आरंभ कर दीं और अंत में 9 अक्टूबर 1642 ई. को दोनों पक्षों की सेनाओं में एक युद्घ हो ही गया। 

राठौड़ को हुई भारी क्षति
इस युद्घ में यूं तो दोनों पक्षों को जन-धन की अपार हानि हुई, पर नागौर पर राठौड़ की सेना को तो पराजय का ही मुंह देखना पड़ा। अमरसिंह राठौड़ के लिए यह दोहरा संकट था उसे जनधन की हानि तो उठानी ही पड़ी साथ ही पराजय का अपमान भी झेलना पड़ा। उसके कई महत्वपूर्ण साथी और सेनानायक इस युद्घ में वीरगति को प्राप्त हो गये थे। जिनकी वीरता का लाभ उसे भविष्य में कहीं किसी अवसर पर मिल सकता था। पर अब अमरसिंह कर भी क्या सकता था? जो चले गये-वे अब आ भी तो नही सकते थे। यद्यपि युद्घ के समय अमरसिंह नागौर में नही था, उसकी अनुपस्थिति में ही युद्घ लड़ा गया और नागौर युद्घ हार गया। उसने अपनी पराजय का समाचार पाते ही नागौर आने का मन बनाया।
बीकानेर के राजा की समझदारी
उस समय बीकानेर का राजा कर्णसिंह था। उसे पता था कि यदि अमरसिंह नागौर चला गया तो उसके जाते ही युद्घ की ज्वाला पुन: भडक़ सकती है। जिसका परिणाम विपरीत भी आ सकता था। इसलिए उसने बादशाह शाहजहां के सामने अमरसिंह की चुगलियां मारीं और बादशाह ने अमरसिंह राठौड़ को नागौर जाने की अनुमति प्रदान नही की। इससे राठौड़ की क्रोधाग्नि और भी अधिक भडक़ गयी। पर वह उस समय अपने मित्र और विश्वसनीय साथी गिरधर व्यास के द्वारा समझाने पर उस समय मौन ही रहा।

‘फीलचराई’ और राठौड़
मुगल काल में हाथी की चराई के लिए जो भूमि दी जाती थी उस पर भी कर लगाने का प्राविधान था। इस कर को उस समय ‘फीलचराई’ कहा जाता था। अमरसिंह राठौड़ के हाथियों के लिए दी गयी भूमि पर भी यह कर लगाया गया, परंतु उसे देने से अमरसिंह राठौड़ ने स्पष्ट इंकार कर दिया। 
बादशाह शाहजहां तो इस पर मौन हो गया परंतु उसका साला सलावत खां  ‘फीलचराई’ के लिए अमरसिंह पर निरंतर दबाव बनाता रहा। तब कहा जाता है कि अमरसिंह राठौड़ ने बादशाह से मिलने का निर्णय लिया। अमरसिंह राठौड़ के विषय में हम पूर्व में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वह अपने निर्णयों में किसी का हस्तक्षेप सहन नही करता था। इसलिए उसे बादशाह के लोगों का अपने ऊपर ‘फीलचराई’ देने के लिए दबाव बनाना भी कष्टकर और अपमान जनक लगा। बस ये दो घटनाएं ऐसी थीं कि जिन्होंने अमरसिंह राठौड़ को अमरसिंह राठौड़ बनने की ओर अग्रसरित कर दिया।

बादशाह शाहजहां से अमरसिंह की भेंट
अमरसिंह के आग्रह पर बादशाह शाहजहां ने इस हिंद केसरी को मिलने का समय सहर्ष दे दिया। वह भी चाहता था कि अमरसिंह राठौड़ के साथ किसी प्रकार का तनाव ना लिया जाए। यद्यपि बादशाह अमरसिंह राठौड़ से रूष्ट अवश्य था। जिस समय अमरसिंह से दरबार में मिलने का समय निश्चित किया गया उस दिन दरबार में सलावत खां ना हो, भला यह कैसे हो सकता था? उसे तो उपस्थित रहना ही था। 
सलावत खां पर उस समय ‘फीलचराई’ लेकर अमरसिंह को अपमानित करने का भूत सवार था। इसलिए उसने अमरसिंह के मुगल राजदरबार में उपस्थित होने पर उसे उत्तेजित करना आरंभ कर दिया। उसने उत्तेजक शब्दों का प्रयोग करना भी प्रारंभ कर दिया।
अमरसिंह राठौड़ सब मौन रहकर सुनता रहा। बादशाह या किसी भी राजदरबारी ने सलावत खां को अमरसिंह के साथ किये जा रहे अभद्र और अशोभनीय वार्तालाप या व्यवहार करने से नही रोका। वह निरंतर अशोभनीय वार्तालाप करता रहा। अंत में कहा जाता है कि वह अपनी सीमाएं लांघ गया, और अमरसिंह राठौड़ के लिए मूर्ख तक कह गया। वार्तालाप के इस क्रम में बादशाह मौन ही रहा, परंतु उसके मौन में छिपे क्रोध को अमरसिंह राठौड़ समझ गया और बादशाह का साला भी सब समझ रहा था कि बादशाह सलामत के मौन रहने का रहस्य क्या है?
इसीलिए वह अपनी भाषा पर नियंत्रण खो बैठा वह नही जानता था कि सीमाएं टूटने के पश्चात क्या हो जाता है?
अपने लिए प्रयुक्त किये गये मूर्ख शब्द पर अमरसिंह राठौड़ अपना आपा खो बैठा। इसे सुनते ही अमरसिंह राठौड़ का स्वाभिमान, आत्माभिमान और उसकी निजता आदि सब मचलने लगे, जिन्होंने उसे अपने स्थान से उठने और शत्रु को ‘उचित पुरस्कार’ देने के लिए प्रेरित किया। 
अमरसिंह बड़े ही वेग से उठा और अपनी कटार को उसने भरे दरबार में सलावत खां की छाती में भोंक दिया। कटार का प्रहार इतना घातक था कि सलावत खां दरबार में ही ढेर हो गया।

पड़ गया रंग में भंग
इस घटना को देखकर सारा दरबार आश्चर्य चकित और सन्न रह गया। किसी ने भीयह अनुमान नही लगाया था कि एक हिंदू अपनी वीरता और शौर्य का इस प्रकार प्रदर्शन कर सकता है? कहा जाता है कि घटना के पश्चात दरबार में एक भी व्यक्ति नही रहा सब भाग गये। बादशाह स्वयं भी उठकर भाग निकला और अपने स्नानागार या रनिवास में जाकर छिप गया। किसी का साहस इस ‘हिंदू वीर’ का सामने करने का नही हुआ। चारों ओर भय का वातावरण बन गया। दरबार में केवल ‘भारत का शेर’ दहाड़ रहा था। जिसके सामने सारे ‘वन्य पशु’ कुछ भी करने की स्थिति में नही थे।
अमरसिंह को अब बाहर भी निकलना था। अत: वह बाहर की ओर चल दिया। सारे दरवाजे बंद देखकर वह एक खिडक़ी से बाहर निकल जाना चाहता था। वह खिडक़ी इस प्रकार की थी जिसमें से पहले सिर बाहर निकलना था, शेष शरीर उसके पश्चात बाहर आता। 
अमरसिंह जब इस खिडक़ी से बाहर निकलना चाह रहा था तो दूसरी ओर उसका साला अर्जुन गौड़ खड़ा था-उसने अमरसिंह राठौड़ का सिर निकलते ही अपनी कटारी से घातक प्रहार कर दिया। अमरसिंह ने वीरगति प्राप्त की, परंतु वीरगति प्राप्त करते-करते उसने भी अपनी कटारी से ऐसा वार अर्जुन गौड़ पर किया कि उसका कान कट गया और वह वहां से भाग लिया।

सरदार बल्लू के घोड़े चंपावत का बलिदान
अब भारत के इस शेर का शव उठाकर लाना एक चुनौती बन गया था। राजपूतों और मुस्लिमों में इस बात को लेकर घोर संग्राम छिड़ गया। अमरसिंह राठौड़ का पार्थिव शरीर खुले प्रांगण में रखा था, जिसे अमरसिंह राठौड़ के एक सरदार बल्लू ने साहस का प्रदर्शन करते हुए अपने नियंत्रण में लिया और शव अपने सैनिकों को देकर उन्हें एक द्वार से निकालने का संकेत कर वह बड़ी शीघ्रता से किले की एक बुर्ज पर जा चढ़ा। वहां से उसके अपना चंपावत नामक घोड़े को नीचे कुदा दिया। घोड़ा तो स्वर्ग सिधार कर अपने स्वामी से जा मिला, परंतु बल्लू ने अपना कार्य संपन्न कर दिखाया। भारत के शेर अमरसिंह राठौड़ का शव नागौर पहुंचा, और उसे पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। इस प्रकार भारत का यह ‘सिंह अमर’ हो गया। उसके साहस और शौर्य आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उसी इतिहास में ऐसे अमरसिंह राठौड़ खोजने कठिन होंगे, और सरदार बल्लू और चंपावत जैसे घोड़े भी खोजने कठिन ही होंगे जिन्होंने समय आने पर अपने देश और अपने स्वामी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नही किया।
क्रमश:

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