उसे हर प्रकार के शोषण से लडऩे और उसे उजागर करने के लिए प्रेरित किया जाता, राष्ट्र के नितांत ईमानदार और राष्ट्रसेवी आचार्य उसके भीतर की छिपी हुई मानवीय शक्तियों और प्रतिभाओं को सही दिशा और दशा प्रदान करते तो यह राष्ट्र अब तक स्वर्ग सम बन गया होता। इसमें दो मत नही हो सकते।
हमें ऐसी व्यवस्था प्रत्येक सरकारी अर्थ-सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्यरत सभी कर्मचारियों एवं अधिकारियों को प्रशिक्षण के काल में प्रदान करनी चाहिए। राष्ट्र में मानवीय समाज की संरचना के लिए हमारे द्वारा उठाया गया यह पग हमें आशातीत सफलता प्रदान करेगा। उसे बताया जाए कि समाज में व्यक्ति को अज्ञान से लडऩा या अन्याय से लडना अथवा अभाव से लडऩा अपनी नौकरी के सेवाकाल में आपकी प्रथम वरीयता होनी चाहिए।
रोटी, कपड़ा और मकान को आप अपनी प्राथमिक और मूलभूत आवश्यकता नही मानेंगे अर्थात स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ को प्राथमिकता प्रदान करेंगे। इस भावना से होगा राष्ट्र का कल्याण। वेद का आदेश है-”अन्यो अन्यामभि हर्यत वत्सं जातमिंवाघ्न्या। अर्थात परस्पर एक दूसरे को ऐसे चाहो और प्रेम करो जैसे उत्पन्न (नवजात) हुए बछड़े को गाय चाहती है अथवा प्रेम करती है। कितनी सुंदर और आदर्श व्यवस्था है? गाय अपने बछड़े से नि:स्वार्थ प्रेम करती है-उसे अपने बछड़े से किसी प्रत्युपकार की आशा नहीं है। वैसे ही हम भी नि:स्वार्थ प्रेम करने वाले बनें। ऐसे ही योग्य अधिकारियों के लिए वेद (ऋग्वेद 8-25) में कहा गया है कि-
ये पर दुख निवारण शक्ति के धनी, सत्याचरण तथा नियमपालन में स्वभावसिद्घ लोग ही साम्राज्य के वास्तविक अधिकारी हैं। हमें देखना होगा कि वेद की इस आदर्श व्यवस्था को हमने कितना अपनाया है?

पुलिस विभाग और अपराध 
पुलिस विभाग अपराध को रोकने के लिए है। किंतु समाचार पत्रों की सुर्खियों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होगा कि अपराध को संरक्षण पुलिस से ही मिलता है। बलात्कार की घटनाओं में पुलिसकर्मी संलिप्त पाये गये हैं। चोरी, हत्या और डकैती में पुलिसकर्मी स्वयं सम्मिलित मिले हैं। जहां रक्षक ही भक्षक बन चुके हों भला वहां कानून तो पुस्तकों तक सिमट कर रह ही जाना है। चौराहों पर पुलिसकर्मी आपको रात्रि समय में खड़े मिल जाएंगे-सज्जनों की गाडिय़ों को रोकने के लिए तथा अवैध वसूली करने के लिए।
रात्रि में पुलिस गश्त लगाती है-गाड़ी की विशेष प्रकार की ध्वनि को करती हुई जब पुलिसकी गाड़ी आती है तो मानो वह प्रतीक है इस बात की है कि यदि कोई असामाजिक व्यक्ति कोई गलत कार्य करने के आशय से कहीं खड़ा है या कुछ ऐसा कर रहा है जो अनुचित और गैर कानूनी कहा जा सके तो वह उस विशेष प्रकार की ध्वनि को सुनकर चलता हो जाए। पुलिस के निकलने पर चाहे पुन: अपना काम कर ले। देहात में भी पुलिस जब गश्त पर होती है तो वहां की सडक़ों पर चलती उसकी गाड़ी की विशेष प्रकार की ध्वनि को सुनकर असामाजिक तत्व उससे पहले ही किनारा कर लेते हैं। इससे क्या स्पष्ट होता है? यही कि पुलिस अपनी सुरक्षा के प्रति पहले चिंतित हैं। वह कहीं चुपचाप बिना किसी प्रकार की ध्वनि के अचानक पहुंचकर अपनी जान को जोखिम में डालना नही चाहती। इस स्थिति के दो कारण हैं। प्रथम तो असामाजिक तत्वों के सामने पुलिस स्वयं को असहाय मानती है।
दूसरे पुलिस भी कहीं न कहीं अपराधियों से मिली हुई है। ये दोनों कारण ही परिस्थितिक साक्ष्य से बलशाली जान पड़ते प्रतीत होते हैं। कई मामलों में तो अपराधियों से पुलिस का मासिक कमीशन बंधा होने का सनसनीखेज रहस्योद्घाटन भी हुआ है। किसी भी शहर या कस्बे में आपको जो रेहड़ी, ठेली वाले, खोखे मिलेंगे वे तो अपना महीना अपने आप ही संबंधित थानों में पहुंचा देते हैं।
वास्तव में रेहड़ी, ठेली और खोखे वाले पुलिस के कमाऊ पूत हैं। इसलिए इनके कारण आप जाम में फंसे, या आपका बेटा जाम में फंसकर किसी प्रतियोगी परीक्षा या साक्षात्कार के लिए देरी से जाए, अथवा आपका कोई रोगी प्राण छोड़ जाए, या और किसी प्रकार की समस्या का आपको सामना करना पड़ जाए, सब चलता है, पुलिस पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नही पडऩे वाला। अभी अभी दिसंबर 2006  में नोएडा के निठारी गांव में बच्चों को उठाकर उनकी निमर्मता से हत्या करना और उनका यौन उत्पीडऩ करने का मामला प्रकाश में आया है। इसमें पुलिस की संलिप्तता देखकर मानवता कराह उठी। मानवीय संवेदनाओं के साथ इतना क्रूर मजाक पुलिस विभाग करेगा यह तो किसी ने भी नही सोचा था। यह मामला वर्तमान में न्यायालय में लंबित है देखते हैं क्या निष्कर्ष सामने आते हैं? एक पुलिसकर्मी के विषय में मेरे एक परिचित कई वर्ष पूर्व बता रहे थे कि वह ट्रक वाले से अवैध वसूली कर रहा था। ट्रकवाले ने गाड़ी नहीं रोकी अपितु गाड़ी की गति धीमी कर ली। धीमी गति देखकर पुलिसकर्मी उसकी खिडक़ी से गाड़ी में ऊपर चढ़ गया, उसके पश्चात उस पुलिसकर्मी का क्या हुआ? कहां गया? आज तक कुछ पता नही चला।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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