कांग्रेस अपने नेता की राजनीतिक अपरिपक्वता को भाजपा की बदले की कार्यवाही कहकर रफा-दफा नहीं कर सकती

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गाजियाबाद ( ब्यूरो डेस्क) 23 मार्च का दिन कांग्रेस के इतिहास में निश्चय ही एक महत्वपूर्ण दिवस के रूप में दर्ज हो गया है। जब लोकसभा सचिवालय ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने का आदेश जारी कर दिया है। यह आदेश गुजरात की एक कोर्ट के आदेश के आने के ठीक अगले दिन जारी हुआ जिसमें राहुल गांधी को मानहानि के एक मामले में कोर्ट ने दो साल की सजा सुनाई थी। हालांकि कोर्ट ने सजा सुनाने के बाद इसपर अमल के लिए 30 दिन की रोक भी लगा दी थी, लेकिन लोकसभा सचिवालय के अनुसार चूंकि दो साल की सजा मिल चुकी है, कानूनन राहुल गांधी की सदस्यता को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
आदेश में कहा गया कि केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी की संसद सदस्यता 23 मार्च 2023 से समाप्त की जाती है। यह कार्रवाई जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत की गई है। जब तक राहुल को ऊपरी अदालत से सजा में राहत नहीं मिलती है तब तक उनकी सदस्यता बहाल नहीं हो सकेगी। न वह तय समय सीमा तक चुनाव लड़ सकेंगे। हालांकि कांग्रेस ने राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होने के बाद राजनीतिक और कानूनी रूप से इसके खिलाफ आक्रामक लड़ाई लड़ने का ऐलान कर दिया है। वहीं तमाम दूसरी विपक्षी दल भी इस मसले पर राहुल गांधी के साथ खड़े दिख रहे हैं।
राहुल गांधी ने 2019 आम चुनाव के दौरान मोदी सरनेम का हवाला देकर टिप्पणी की थी जिसके बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। दिलचस्प बात है कि जिस कानून के तहत राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता गई है वह कानून राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही 2013 में बना था। जब उन्होंने इससे राहत दिलाने से संबंधित यूपीए सरकार के ऑर्डिनेंस को सार्वजनिक मंच से फाड़कर अपनी असहमति दिखाई थी। मालूम हो कि संसद के मौजूदा बजट सत्र में राहुल गांधी पहले से ही सियासी टकराव के केंद्र में थे।
अडाणी मुद्दे पर जेपीसी की मांग को लेकर कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष आक्रामक थी और राहुल गांधी ने लोकसभा में अपने भाषण में सरकार पर तीखा हमला बोला था। तब उनके भाषण के कई हिस्से को कार्यवाही से हटा दिया गया था। उस मामले में भी राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया गया है और सत्ता पक्ष के सदस्यों ने उन्हें अयोग्य करने की मांग की थी। फिर लंदन में राहुल के दिए गए भाषण पर भी सत्ता पक्ष के सदस्य उनसे माफी की मांग से लेकर उनके खिलाफ कार्रवाई तक की मांग कर रहे थे।
अब राहुल गांधी पर लोकसभा सचिवालय की कार्रवाई के बाद सियासी टकराव के और बढ़ने की संभावना दिखने लगी है। जहां सत्ता पक्ष इस मसले पर किसी तरह झुकने के मूड में नहीं है और इस मामले को ओबीसी समाज के खिलाफ बोलने की सजा बता रही है वहीं कांग्रेस इसे अडाणी और आम लोगों से जुड़े मसले उठाने की सजा बता रही है। तमाम विपक्षी दलों का इस मामले पर राहुल गांधी को समर्थन मिला है। आने वाले दिनों में इसपर संघर्ष और बढ़ने की संभावना दिखने लगी है। संसद सत्र को भी तय समय से पहले स्थगित करने की संभावना है। यह भी दिलचस्प बात है कि राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी की भी जून 1975 में कोर्ट के फैसले से संसद सदस्यता रद्द हो गई थी।
कांग्रेस इस सारे प्रकरण को इस समय भाजपा की बदले की कार्यवाही के रूप में देख रही है और कह रही है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को धूमिल करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर केंद्र कि मोदी सरकार ने जानबूझकर ऐसा कदम उठाया है। यदि इसमें भाजपा की मोदी सरकार की वास्तव में किसी प्रकार की बदले की कार्यवाही की भावना निहित है और वह राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को चौपट कर देना चाहती है तो निश्चय ही इसे उचित नहीं कहा जा सकता। यद्यपि राजनीति में सब कुछ चलता है ऐसा कहा जाता है, पर हमारा मानना है कि राजनीति में सब कुछ नहीं चलता। विशेष रूप से तब जब भाजपा जैसी पार्टी राजनीति को धर्म आधारित बना देना चाहती है। धर्म आधारित राजनीति में बहुत सारी चीज़ें विदा हो जाती हैं। उनमें बदले की कार्यवाही और किसी भी प्रकार से किसी व्यक्ति को नीचा दिखा कर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी के रूप में उसे समाप्त कर देने जैसी किसी भी कार्यवाही को स्थान नहीं दिया जा सकता।
जहां भाजपा की इस प्रकार की राजनीति को हम उचित नहीं मानते वहीं हम कांग्रेस से भी कहना चाहेंगे कि वह भी अपने नेता के बचपने को समाप्त कर उसमें परिपक्वता लाने का गंभीर प्रयास करें। कोई भी पार्टी किसी ऐसे नेता को अपन नेता आखिर कब तक मानेगी जो कई बार संसद रहने के उपरांत भी राजनीतिक परिपक्वता से अनभिज्ञ हो?
फिलहाल कांग्रेस अपने नेता की राजनीतिक अपरिपक्वता और अकुशलता को भाजपा की बदले की कार्यवाही कहकर रफा-दफा नहीं कर सकती और यदि ऐसा करने का प्रयास उसकी ओर से किया जाता है तो समझा जाएगा कि उसने इतिहास और घटनाओं से कोई शिक्षा नहीं ली है। कांग्रेस इस समय एक बीमारी को ढोते रहना ही अपना सौभाग्य मान रही है जिसे आत्मघात के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता है।
साभार

 

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