आनंद लोक को ले चले, बिरला मिलता नेक

बिखरे मोती-भाग 189

गतांक से आगे….
”जीना है तो दिव्यता में जीओ।”
”आत्मा की आवाज सुनो और आगे बढ़ो।” आत्मा की आवाज परमात्मा की आवाज होती है। आत्मा की बात को मानना भगवान की बात को मानना है। इस संदर्भ में भगवान राम ‘रामचरितमानस’ के उत्तरकाण्ड पृष्ठ 843 पर कहते हैं-
सोइ सेवक प्रियतम मम होई।
मम अनुशासन मानै सो जोई।।
अर्थात वही मेरा सेवक है और वही मेरा प्रियतम है जो मेरी आज्ञा में रहता है।
ढोल पहाड़ और युद्घ तो,
दूर से मन को भाय।
ज्यों-ज्यों इनके ढिंग चलें,
तो आफत बन जाए ।। 1118 ।।
व्याख्या :-इसे नियति नहीं तो और क्या कहेंगे? ढोल दूर बजता है, तो अच्छा लगता है। वही ढोल कान के पास बजने लगे तो व्यक्ति झल्लाकर कहता है-‘इसे बंद कर दो, तुम्हारे ढोल ने तो हमारे कान फोड़ दिये।’ पर्वत के मनोरम दृश्य टीवी अथवा कैमरे पर देखने में अच्छे लगते हैं। यदि सर्दी-गर्मी अथवा बरसात में लंबे समय के लिए उन पर रहना पड़ जाए तो वहां के जीवन की जटिलताओं का तब कटु अनुभव होता है, जिसे मनुष्य भुलाये नहीं भूलता है, जैसे भारी हिमपात होना, भीषण सूखा पडऩा, अतिवृष्टि होना, बाढ़ आना, भूस्खलन होना इत्यादि। इसके अतिरिक्त दो पक्षों अथवा देशों में जब युद्घ होता है तो बतौर दर्शक देखना तो अच्छा लगता है, किंतु स्वयं लडऩा पड़ जाए तो होश ठिकाने आ जाते हैं। छक्के छूट जाते हैं। ठीक इसी प्रकार मूढ़ अथवा दुष्ट व्यक्ति को दूर से देखने पर तरस आता है, किंतु जब उसकी मूढ़ता और दुष्टता का भुक्तभोगी होना पड़ता है तो वही व्यक्ति एक मुसीबत नजर आता है।
जगत ओर ले जानियां,
राही मिलें अनेक।
आनंद लोक को ले चले,
बिरला मिलता नेक ।। 1119 ।।
व्याख्या :-यह देखकर बड़ा ही कौतूहल होता है कि मनुष्य को इस संसार की तरफ ले जाने वालों की तो भीड़ लगी हुई है अर्थात इस नश्वर संसार से नाता जोडऩे वाले मोह माया की दलदल में फंसाने वाले तो बहुत मिलते हैं, किंतु आत्मा और परमात्मा के शाश्वत रिश्ते का मान कराने वाला, भक्ति की राह पर ले जाने वाला, भवबंधन से मुक्ति (मोक्ष) दिलाने वाला, भगवद्धाम (आनंद लोक) को ले जाने वाला कोई संत पुरूष इस संसार में बिरला ही मिलता है। यदि किसी को सत्पुरूष का सान्निध्य मिलता है तो इसे अपना परम सौभाग्य समझना चाहिए, जन्मांतरों के पुण्यों का फल मानना चाहिए। इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में कितना सुंदर कहते हैं :-
पुण्य पुंज बिन मिलहिं न सन्ता।
सत्संगति संस्कृति करे अन्ता।।
संतान को संपन्न करने के लिए खुद को विपन्न करना बहुत ही घाटे का सौदा है।
पाप पुण्य को भूलकै,
संतति की धनवान।
भोगना खुद को ही पड़ै,
लख योनि इंसान ।। 1120 ।।
व्याख्या-”भौतिकता आध्यात्मिकता के बिना पिशाचिनी होती है।” यह सूक्ति आज के आधुनिक और उन्नत कहलाने वाले मानव पर चरितार्थ होती प्रतीत हो रहा है, क्योंकि आज का मानव भौतिकता की अंधी दौड़ में नेत्र होते हुए भी नेत्रहीन दिखाई देता है। क्रमश:

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