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गृहणियों के कामकाज का आकलन कर उनके योगदान को भी सकल घरेलू उत्पाद में शामिल करना चाहिए

प्रह्लाद सबनानी

गृहणियों के कामकाज का आकलन कर उनके योगदान को भी सकल घरेलू उत्पाद में शामिल करना चाहिए
भारतीय अर्थशास्त्रियों द्वारा जैसी कि उम्मीद की जा रही थी एवं भारतीय रिजर्व बैंक ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था सम्बंधी अपने आंकलन में जो सम्भावना व्यक्त की थी, उसी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 की तृतीय तिमाही, अक्टूबर-दिसम्बर 2022, में देश के सकल घरेलू उत्पाद में 4.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 की प्रथम तिमाही, अप्रैल-जून 2022, में एवं द्वितीय तिमाही, जुलाई-सितम्बर 2022, में क्रमशः 13.2 प्रतिशत एवं 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। जबकि चौथी तिमाही, जनवरी-मार्च 2023, में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि की सम्भावना के चलते पूरे वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है। इसी प्रकार कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों जैसे गोल्डमेन सेच्स, मूडी, फिच, एशियाई विकास बैंक आदि ने भी वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत से आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं। एसएंडपी ने तो 7.3 प्रतिशत का अनुमान दिया है।

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज की गई वृद्धि पर नजर डालें तो ध्यान में आता है कि वित्तीय वर्ष 2022-23 की तृतीय तिमाही, अक्टूबर-दिसम्बर 2022, में कृषि क्षेत्र में 3.7 प्रतिशत, उद्योग क्षेत्र में 2.4 प्रतिशत एवं सेवा क्षेत्र में 6.2 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई है। कोरोना खंडकाल के बाद से कृषि क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र में लगातार सुधार दिखाई दे रहा है परंतु उद्योग क्षेत्र में अभी और अधिक सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। उद्योग क्षेत्र में हालांकि बिजली उत्पादन, गैस, जल एवं अन्य जनोपयोगी सेवाओं तथा निर्माण गतिविधियों में 8 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है परंतु विनिर्माण के क्षेत्र में 1.1 प्रतिशत की ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की गई है। जिससे उद्योग क्षेत्र की वृद्धि दर पर विपरीत असर पड़ा है।

भारत सरकार द्वारा देश के समस्त नागरिकों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन लाने की दृष्टि से, विशेष रूप से गरीब वर्ग की आर्थिक समस्याओं को दूर करने के उद्देश्य से, कई उपाय किये जा रहे हैं, उनका परिणाम स्पष्ट तौर पर अब दिखाई देने लगा है। भारत के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय अब बढ़कर 196,716 रुपए हो गई है जो वित्तीय वर्ष 2012 में केवल 71,609 रुपए प्रति व्यक्ति थी। वित्तीय वर्ष 2012 से 2022 के बीच प्रति व्यक्ति आय में 10.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष (चक्रवृद्धि दर से) वृद्धि दर्ज की गई है। जोकि अपने आप में बहुत प्रभावशाली वृद्धि दर है। वित्तीय वर्ष 2023 में तो प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 25,218 रुपए की अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है। इसका सीधा प्रभाव निजी अंतिम उपभोग व्यय पर भी दिखाई दिया है जो वित्तीय वर्ष 2023 में बढ़कर 164 लाख करोड़ रुपए का हो जाने का अनुमान है। इससे देश की आर्थिक गतिविधियों में और अधिक तेजी आने का अनुमान लगाया जा रहा है।

हालांकि कोविड खंडकाल के दौरान सकल पूंजी निर्माण में वित्तीय वर्ष 2021 में कुछ कमी देखने में आई थी परंतु वित्तीय वर्ष 2022 में यह अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गया है। विशेष रूप से कृषि, विनिर्माण, बिजली उत्पादन, व्यापार एवं होटेल, रीयल एस्टेट, जन प्रशासन एवं अन्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार एवं कई राज्य सरकारों द्वारा अपने पूंजीगत खर्चों में की गई जबरदस्त वृद्धि के कारण यह सम्भव हो सका है तथा इसके कारण ही वित्तीय वर्ष 2022-23 में प्रति व्यक्ति आय एवं उपभोग व्यय में भी तेजी दिखाई दी है।

पूंजीवादी मॉडल को अपना रहे विकसित एवं अन्य कई देशों में प्रत्येक व्यक्ति, जो व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न रहता है, की आय को देश के सकल घरेलू उत्पाद की गणना में शामिल किया जाता है। चूंकि इन देशों में सामान्यतः समस्त महिलाएं व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल रहती हैं अतः उनकी आय को उस देश के सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाता है। परंतु भारत में सामान्यतः समस्त ग्रहणियां घर के काम काज में अपना हाथ बंटाती हैं एवं इसके एवज में उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है अतः इन गतिविधियों को भारत के सकल घरेलू उत्पाद में शामिल नहीं किया जाता है। इस संदर्भ में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा हाल ही में एक अध्ययन प्रतिवेदन में यह रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारी दी है कि भारत में 18 वर्ष से 60 वर्ष के बीच ग्रामीण इलाकों में 28.7 करोड़ महिलाएं एवं शहरी इलाकों में 18.2 करोड़ महिलाएं निवास करती है। इनमें से 1.4 करोड़ महिलाएं ग्रामीण इलाकों में एवं 4 करोड़ महिलाएं शहरी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न हैं, अतः इनकी आय भारत के सकल घरेलू उत्पाद में गिनी जाती है। परंतु शेष 27.3 करोड़ महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों में एवं 9.3 करोड़ महिलाएं शहरी क्षेत्रों में, घरेलू कार्यों में व्यस्त रहती हैं, परंतु उन्हें इन कार्यों के लिए किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है और इस प्रकार इन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरु कार्य को भारत के सकल घरेलू उत्पाद में शामिल नहीं किया जाता है। यदि यह माना जाये कि इन महिलाओं द्वारा प्रतिदिन 8 घंटे घर में कार्य किया जा रहा है एवं उन्हें प्रतिमाह 5000 रुपए ग्रामीण क्षेत्रों में एवं प्रतिमाह 8000 रुपए शहरी क्षेत्रों में प्रतिफल के रूप में भुगतान किया जाये तो ग्रामीण क्षेत्रों में 14.7 लाख करोड़ रुपए एवं शहरी क्षेत्रों में 8 लाख करोड़ रुपए का भुगतान इन गृहिणियों को करना होगा। इस प्रकार भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कुल मिलाकर 22.7 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज हो सकती है जो कि भारत के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद का 7.5 प्रतिशत है। उक्त आकलन के अनुसार, एक तरह से भारत का सकल घरेलू उत्पाद प्रतिवर्ष 7.5 प्रतिशत से कम बताया जा रहा है। भारत में ग्रहणियों के द्वारा किए जा रहे घरेलू कार्य को भी सकल घरेलू उत्पाद में शामिल करने के सम्बंध में अब गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए।

अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों में सामान्यतः समस्त महिलाओं द्वारा चूंकि आर्थिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों में कार्य किया जाता है अतः उन्हें घरों में लगभग नहीं के बराबर कार्य करना होता है। इन देशों की संस्कृति ही इस प्रकार की है कि ग्रहणियों को घरों में न तो बुजुर्गों की सेवा सुश्रुषा करनी होती है और न ही पोते पोतियों एवं नाते नातियों की देखभाल करनी होती है क्योंकि यहां तो पुत्र एवं पुत्री के 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही सामान्यतः उन्हें अपना अलग घर बसा लेना होता है। साथ ही, इन महिलाओं को न तो घर में भोजन पकाना होता है और न ही भारतीय महिलाओं की तरह घर की साफ सफाई करनी होती है। इसके ठीक विपरीत भारतीय संस्कृति में तो ग्रहणियों को अपने बच्चों का भविष्य गढ़ने, अपने बुजुर्गों की सेवा सुश्रुषा एवं पोते पोतियों एवं नाते नातियों की देखभाल जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने के साथ-साथ पूरे घर की देखभाल भी करनी होती है। भारतीय ग्रहणियों द्वारा पूरा कुटुंब सम्हालने जैसे असाधारण कार्य करने के उपरांत भी उनके कार्य को सकल घरेलू उत्पाद में शामिल नहीं किया जाता है। यह पूंजीवादी मॉडल के अंतर्गत सकल घरेलू उत्पाद आंकने की पद्धति में सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है।

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