1947 में साम्प्रदायिक आधार पर देश के बंटवारे को अपनी सहमति देने वाले नेहरू-गांधी की कांग्रेस आज तक कहे जा रही है कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ कांग्रेस अपने सामने लगे तथ्यों के ढेर की उपेक्षा करके अपनी झूठी बात के महिमामंडन करते रहने की अभ्यस्त रही है। इसके सामने इतिहास गला फाड़-फाडक़र चिल्ला रहा है कि विदेशी मजहब की घृणा जब-जब परवान चढ़ी तब-तब ही इस देश को विभाजन की प्रसव-पीड़ा से दो चार होना पड़ा है। विदेशी मजहब ने 1947 में देशी जमीन का बंटवारा कराया तो मजहबी बैर और उससे जन्मी घृणा सिर चढक़र बोली। इसके उपरांत मजहब को क्षमा करके घटना को भूल जाने की मूर्खता तत्कालीन नेतृत्व ने की। हमें पुन: पढ़ाया जाने लगा कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ मानो 1947 में मजहब ने जो कुछ किया वह तो उसे उस समय आ रही पागलपन की मिर्गी के कारण अचानक घटित हो गया था। वास्तव में उसका कोई दोष नहीं था। इन कांग्रेसियों ने आज तक यह नहीं समझा है कि जिस इकबाल ने यह कहा था कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- वह स्वयं समय आने पर अपना सामान हिन्दुस्तान से उठाकर पाकिस्तान चला गया था। यह उसकी मजहबी घृणा का ही मुंह बोलता प्रमाण था। वह एक बार भी नहीं कह पाया था कि ‘हिंदूस्थान’ हमारा है और हम इसे साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित नहीं होने देंगे और यदि मजहब हमें बांटने की या परस्पर वैर रखने की शिक्षा या प्रेरणा दे रहा है तो मैं ऐसे मजहब को नहीं मानता।
1947 में भारत के नेतृत्व ने इस सबके उपरांत भी तथ्यों से मुंह फेरा और उसने अपनी मूर्खता से कश्मीर का दर्द हमें विरासत में दे दिया। सरदार पटेल और सावरकर के व्यावहारिक दृष्टिकोण और समझ की कश्मीर के संदर्भ में पूर्ण उपेक्षा की गयी। ये दोनों महानुभाव प्रथम तो विभाजन के विरोधी थे और यदि विभाजन हो ही रहा था तो जिन्ना के ‘जीन’ को कुचलकर देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने के लिए अंतिम क्षणों तक ये संघर्ष करते रहे थे।
जिस पाकिस्तान को गांधीजी ने कंगाल भारत के कंगाल खजाने से स्वतंत्रता मिलते ही 55 करोड़ रूपया दिलवाया था-वही पाकिस्तान हमारी भूमि का ही एक टुकड़ा पाकर पहले दिन से ही हमारे ही करोड़ों हिंदू भाईयों को समाप्त करने पर लग गया। भारत छोडक़र पाकिस्तान गये ‘इकबाल’ के ये बोल पाकिस्तान में भी काम न आये ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ इकबाल की उपस्थिति में ही मजहब के नाम पर पाक की ‘नापाक’ भूमि पर अल्पसंख्यकों का उत्पीडऩ होने लगा, दलन-दमन और उनके जीवन का अंत होने लगा।
इधर भारत के नेतृत्व ने कश्मीर में ‘नागों’ को दूध पिलाना आरंभ कर दिया। गांधी की अहिंसा और भाईचारे की बातों के संदेश के साथ कश्मीर को आज तक अरबों रूपये के कितने ही पैकेज दिये गये पर वे सारे के सारे पैकेज इस बात को सत्य सिद्घ नहीं कर पाये कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ वहां मजहब ही आपस में बैर रखना सिखाता रहा और हमारे ही लोगों को अपनी ही भूमि से अपने ही घरबार छोडक़र भागने के लिए विवश करता रहा। इधर कांग्रेस आतंकवादियों के साथ ऐसा व्यवहार करती रही जैसे कि वे बहुत बड़े देशभक्त हैं और उनकी सुरक्षा पर या उनकी सुख-सुविधा पर धन व्यय करना हमारा राष्ट्रीय कत्र्तव्य है।
अब मोदी सरकार आयी तो पता चला कि कितने ‘नाग’ देश की माटी का अन्न खाकर देश को ही तोडऩे के लिए सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे थे? मोदी सरकार ने उन देशतोडक़ों की सुविधाएं छीन लीं, तो ये सारे देशतोडक़ अपने वास्तविक स्वरूप में ततैया बनकर बाहर आ गये। अब कश्मीर की सडक़ों पर जो लोग पत्थरबाजी कर रहे हैं वे उन्हीं ततैयों के विचारबीज गुर्गे हैं जो अभी तक देश का खाते रहे और मौज लेते रहे, पर अब उनके सामने से स्वादिष्ट भोजन की सोने की थाली मोदी सरकार ने खींच ली है, तो उन्हें कष्ट हो रहा है। देश के कुछ उतावले लोग कहने लगे हैं कि मोदी सरकार के काल में जितने सैनिक मारे गये हैं उतने के आधे भी मनमोहन सरकार में नही मारे गये थे। अत: हमें ’56 इंची छाती का पीएम’ नहीं चाहिए हमें तो वही मनमोहन चाहिए जो शांति बनाये हुए था। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि मोदी ने घाव की मवाद को निकालना आरंभ कर दिया है, जिससे रोगी को पीड़ा भी होगी और उसका रक्तस्राव भी होगा। कहने का अभिप्राय है कि उड़ते ततैयों को वश में करने के लिए तथा उनके आकाओं का मस्तिष्क ठीक करने के लिए हमें अब और भी अधिक क्षति उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। सैनिकों के हताहत होने की हमारी संख्या और भी बढ़ेगी, साथ ही जन-धन की हानि भी होगी, पर हमें मानसिक रूप से तैयार रहना होगा कि हम वह सब झेलेंगे। अब हम मनमोहन सिंह या उनके आदर्श नेहरू-गांधी परिवार की नीतियों के अनुसार शत्रु को दूध पिला-पिलाकर और अपनी ओर से सुख सुविधाएं दे-देकर अपनी मौत का सामान स्वयं एकत्र कराने की मूर्खता नही ंकरने वाले। कश्मीर के दर्द का और देश के मर्ज का उपचार करने का समय आ गया है।
पीएम मोदी ने नब्ज पर हाथ रख दिया है। अब अच्छा यही होगा कि यह हाथ हटना नहीं चाहिए। देश की जनता अपने पीएम के साथ है। नेहरू गांधी की अदूरदर्शिता पूर्ण कश्मीर-नीति और उनकी भूलों के स्मारक पर पैकेजों के अनगिनत फूल यह देश चढ़ा-चढ़ाकर थक चुका है, पर मजहब के नाम पर वैर पालने वालों का उपचार नहीं हो पाया है। पीएम मोदी ने अमेरिका से या रूस से जो रक्षा सौदे किये हैं और देश का हजारों-लाखों करोड़ रूपया सैनिक साजो-सामान पर व्यय किया है ये निश्चय ही ‘बड़े ऑप्रेशन’ की तैयारी का संकेत है। अपने पीएम का हमें धन्यवाद करना चाहिए कि इस ‘बड़े ऑप्रेशन’ में ‘विदेशी डाक्टर्स’ की ‘बड़ी टीम’ भी उनके साथ खड़ी होगी। कहने का अभिप्राय है कि इस बार पूर्ण उपचार होगा। पुतिन और ट्रम्प बड़े डाक्टर के रूप में हमारे साथ होंगे बस पाकिस्तान और चीन के लिए यही सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति है। कश्मीर व देश की सुरक्षा के लिए करोड़ों, अरबों के अस्त्र-शस्त्र खरीदकर मोदी ने दब्बू नेहरूवाद और गांधीवाद को अंतिम श्रद्घांजलि दे दी है।

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