अधिकार मानवों के लिए होते हैं
दानवों के लिए नहीं
भारत में अब स्थिति और भी दु:खपूर्ण मोड़ ले रही है। यहां लुटेरों, हत्यारों, आतंकवादियों, बलात्कारियों और समाज के दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के अधिकारों के लिए भी आवाजें उठ रही हैं।
मानवाधिकारवादी फांसी की सजा का विरोध कर रहे हैं, वे आततायी और दुष्ट लोगों के अधिकारों के संरक्षणवादी बनकर आगे आ रहे हैं। इन्हें नहीं पता कि यदि आप अधिकारों की ही बातें करते हैं तो ये अधिकार तो केवल मानव को मिला करते हैं दानवों को नहीं।
दुर्भाग्य से भारतवर्ष में आतंक से उजड़े कश्मीरी पंडित और उन्हें उजाडऩे वाले आतंकवादी दोनों के समान अधिकार माने जाते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि जो उजड़ा है या उजाड़ा गया है, अधिकार तो मौलिक रूप से उसी के पास था। उसका अधिकार छीना गया। छीनने वाले ने अपने कत्र्तव्य का उल्लंघन किया इसलिए उसने अपने जीवन को दांव पर लगा दिया।
परिणामस्वरूप पहले के अधिकार छीनने का आरोप तो उस पर है ही उसने अपने कत्र्तव्य का उल्लंघन भी किया, यह अपराध भी उसके साथ है। इसलिए उसे अपराधी कहा जाएगा। जो अपराधी है और दूसरों के अधिकारों का हंता है वही दानव है, जिसका विनाश करना भारत की परंपरा है और विधि के अनुकूल है। तब अपराधी को कैसा संरक्षण? कैसे उसके अधिकार? और कैसी उसकी मानवता? मानवाधिकारवादी तनिक विचारें और बतायें कि इन प्रश्नों के उत्तर क्या हैं?
एक प्रसिद्घ लोकोक्ति
हमारे यहां भारतीय समाज में एक कहावत है कि ‘हाथ का सच्चा और लंगोट का पक्का’ कभी मार नहीं खाता। ऐसा व्यक्ति सर्वत्र प्रशंसित होता है। यह कहावत मानवीय स्वभाव का विधिक और नैतिक पक्ष उद्घाटित करती है। इस कहावत में विधिकता तो यह है कि आपको यदि समाज में विधि व्यवस्था का पालन करना है तो दो बातों का ही ध्यान रखना है कि न तो भ्रष्ट होना है और न ही व्यभिचारी होना है। जबकि यही बात इसका नैतिक पक्ष भी है। इस प्रकार विधि पालन के पीछे हमारे यहां नैतिक शक्ति है। यहां नीति ही विधि को तोड़ता है। विधि दूसरों के अधिकारों की प्रहरी है, जबकि नीति आपको अपने कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक बनाये रखकर दूसरों के अधिकार क्षेत्र में झांकने से भी रोकेगी।
यह नीति मर्यादा का स्थानापन्न है। यदि आप नीतिवान हैं तो मर्यादित भी हैं। यदि मर्यादित हैं तो दूसरों के अधिकारों का ध्यान और सम्मान करने वाले भी हैं। यह भी मानना पड़ेगा इसलिए ऐसी स्थिति में आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करेंगे। जब कहीं किसी के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं तो समाज में शांति व्यवस्था स्वयं ही बनी रहेगी ऐसी अपेक्षा स्वाभाविक है। मानवाधिकार आयोग की आवश्यकता है अथवा मानव कत्र्तव्य अधिकार आयोग की आवश्यकता है? मानव को मानव बनाने के लिए तो निस्संदेह मानव कत्र्तव्य अधिकार आयोग की आवश्यकता है। क्योंकि मानव की अधिकारवादी प्रवृत्ति समाज में झगड़ों और विवादों को जन्म देती है। जबकि उसकी कत्र्तव्यवादी प्रवृत्ति उसे सहिष्णु, सहयोगी और एक दूसरे के प्रति संवेदनशील बनाती हैं।
आप देखें, भारत में एक वर्ग को शूद्र कहा गया। कालांतर में एक वर्ग विशेष ने इस वर्ग के अधिकारों का शोषण करना आरंभ कर दिया। परिणामस्वरूप भारत में ऊंच-नीच छुआछूत और जातिवाद का बोलबाला हो गया, अब मानवाधिकारवादी कहेंगे कि जिस वर्ग ने शूद्र के अधिकारों को छीनकर उसे अछूत बनाया, हम अछूत को बराबर के अधिकार दिला देना चाहते हैं। फिर भी समाज में जातिवाद एक विष बनकर खड़ा है, वह मिट नहीं रहा अपितु और भी भयंकर होता जा रहा है। इसकी भयंकरता पर विचारना आवश्यक है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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