भारतवर्ष में अंग्रेजों का शासन चाहे जितनी देर रहा हो उसके दिये गये कुसंस्कार और कुपरम्पराएं हमारा पीछा आज तक कर रही हैं। हम जब तक इन कुसंस्कारों से या कुपरम्पराओं से मुक्त नहीं हो जाते हैं, तब तक हम चाहे कितने ही स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मना लें तब तक हम अपने आपको स्वतंत्र देश के नागरिक कहलाने के अधिकारी नहीं होंगे।
ऐसे कुसंस्कारों और कुपरम्पराओं में से कई ऐसे कुसंस्कार और कुपरम्पराएं हैं जो कि उस समय देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार हमने एक राष्ट्रीय संस्कार के रूप में अपने पौरूष, पराक्रम और अंग्रेजों के शासन का प्रतिरोध करने के लिए अपनाये थे, पर कालांतर में वे हमारी नसों में रम गये और आज स्वतंत्रता के 70 वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत भी वे हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। इनमें से एक संस्कार था-सरकार का प्रत्येक स्तर पर असहयोग करना और कर चोरी करना। आज की चर्चा को हम यहीं तक सीमित रखेंगे। प्राचीनकाल में भारत में राजा और प्रजा ने मिल बैठकर राष्ट्रोन्नति के लिए कर निर्धारण की प्रक्रिया स्वयं निश्चित की थी। ऐसे अनेकों प्रमाण हमारे वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। सार्वजनिक कार्यों के लिए और विकास व उन्नति के लिए राज्य के पास धन की व्यवस्था होना आवश्यक है। इसलिए जनता राष्ट्र के विकास में स्वेच्छा से भागीदार होती थी और राजा को स्वेच्छा से कर देती थी। जिससे कि हमारे सार्वजनिक कार्यों को राजा और उसका प्रशासन समय से पूर्ण कर सके।
राजा भी अपनी प्रजा के लिए पूर्ण तन्मयता और सेवाभाव के साथ कार्य करता था। उसकी तन्मयता और सेवाभावना ही उसका राजधर्म था। इस समन्वयी शासकीय प्रणाली में राष्ट्रोन्नति सर्वोपरि थी, इसमें राजा और प्रजा का एक ही लक्ष्य था-राष्ट्रोन्नति। राजा भ्रष्ट नहीं था और प्रजा चोर नहीं थी। अत: कर देने में प्रजा को कोई कष्ट नहीं होता था। इसके विपरीत वह कर देने को अपना राष्ट्रीय कत्र्तव्य मानती थी और यह कत्र्तव्य भावना ही हमारा राष्ट्रीय संस्कार था।
मुगलों व अंग्रेजों के काल में परिस्थितियां बदल गयीं। क्योंकि उस समय शासक वर्ग का उद्देश्य कर संग्रह से निजी सुख सुविधाओं को प्राप्त करना हो गया था। हम देखते हैं कि कर संग्रह से भी जब इन विदेशी शासकों का पेट नहीं भरता था तो उस समय येे किसी संपन्न राजा पर आक्रमण करते और उसे परास्त करके उसकी प्रजा तक को लूटते और काटते थे। अंग्रेजों ने मुगलों से यह संस्कार प्राप्त किया और बड़ी निदर्यता से भारत को लूटना आरंभ किया। उन्होंने ‘कलैक्टर’ जैसे दुष्ट अधिकारी के पद का सृजन किया। जिसका कार्य कर ‘कलैक्ट’ (संग्रह) करना था। इस कार्य के लिए उस अधिकारी को पुलिस भी दी जाती थी। इस प्रकार कलैक्टर और पुलिस भारत में लोगों के शोषण के लिए बनाये गये। न्यूनाधिक कलैक्टर और पुलिस का आचरण आज तक भी जनता के प्रति विनम्रता और सेवा भाव का नहीं है। यह एक राष्ट्रीय कुसंस्कार है जो हमारे लिए अभिशाप बनकर हमारे प्रशासन में रम गया है। हमारे धन को अपनी सुख सुविधाओं पर व्यय करने और उस धन को स्वदेश ले जाकर उससे वहां विकास कार्य करने की कुप्रवृत्ति को जब हमारे लोगों ने विदेशी शासकों की कार्यशैली में देखा तो उन्होंने कर देने मंग आनाकानी आरंभ की, और वे कर चोरी को अपनाने के लिए युक्तियां खोजने लगे। तब उन्हें कर देना एक दण्ड सा लगता था।
कर को दण्ड समझना और उसे ना देने के लिए हरसंभव युक्तियां खोजना उस समय तो हमारा राष्ट्रीय संस्कार था, जिसे अपनाया जाना भी एक प्रकार की देशभक्ति ही थी, पर आज जब शासन प्रशासन अपना है तो हम उस समय भी सामूहिक रूप से कर चोरी कर रहे हैं या उसकी युक्तियां भिड़ा रहे हैं तो यह स्थिति हम सभी को चोर सिद्घ कर रही है। इस अवगुण को हम यदि अपना राष्ट्रीय कुसंस्कार कहें तो कोई अत्युक्ति नहीं होंगी।
देश में बिजली की चोरी प्रतिवर्ष एक लाख तीन हजार करोड़ रूपये की हो रही है। हर व्यक्ति इस दांव में लगा हुआ दिखता है कि तू तो चोर बना रहे पर शेष सभी ईमानदार रहें। देर तक कर चोरी करते-करते हम ‘कर चोर’ स्थायी रूप से हो गये हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है-जिसे हमें स्वतंत्रता मिलने के उपरांत छोड़ देना चाहिए था। आज स्थिति ये है कि एकस्वर्णकार नहीं चाहता कि उस पर सरकार कर लगाये और उसका व्यापार ईमानदारी की सीमाओं में आकर देश निर्माण के लिए स्वेच्छा से अपने आपको समर्पित कर दे। एकचिकित्सक चाहता है कि उसकी लूट तो यथावत मची रहे पर शेष सभी ईमानदार हो जाएं। यही स्थिति अन्य व्यवसायियों की है। यहां तक कि एक अध्यापक भी कामचोर हो गया है, उसे राष्ट्रपति पदक चाहिए पर ऐसी युक्तियां खोजता है कि ये पदक बिना परिश्रम किये ही मिल जाए तो अच्छा है। हमारी इसी कुप्रवृत्ति के कारण बिजली चोरी हो रही है।
जब मोदी सरकार ने नोटबंदी लागू की तो लगभग एक करोड़ नये आयकर देने वाले लोग सामने आये और अब जीएसटी के लागू होने से भी लगभग इतने ही नये कर दाताओं के सामने आने की आशा है। इन लोगों से मिलने वाले कर से निश्चय ही देश का विकास होगा। हमारी यह प्रवृत्ति अब परिवर्तन की मांग कर रही है कि हम सरकार को कर देने में असहयोगी बने रहेंगे। इसके विपरीत सरकार को कर देकर देश निर्माण में अपना सहयोग देंगे यह भावना विकसित होनी चाहिए। जो लोग कर देने की स्थिति में नहीं है या जिनके व्यवसाय को सरकारी अनुदान या छूट की आवश्यकता है उन्हें अनुदान या छूट मिलनी चाहिए। यह तभी संभव है जब साधन संपन्न लोग स्वेच्छा से कर देना चाहेंगे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो सरकार को विकास कार्य करने में कठिनाई आएगी। सरकार को भी चाहिए कि वह लोगों से कर लेकर उसे राष्ट्रोन्नति में ही व्यय करे। हर स्थिति में देश का पैसा देश के विकास में ही लगे तो ही उत्तम होगा। चोर शासन और प्रशासन में भी हैं, और इतने बड़े चोर हैं कि उन्हें तो चोर ना कहकर ‘डकैत’ कहा जाए तो उत्तम होगा। सुधार की आवश्यकता जनता में ही नहीं है, अपितु डकैतों का भी सुधार करने की आवश्यकता है। हम यह गारंटी से कह सकते हैं कि यदि भारत में ईमानदारी से कर संग्रह होने लगे अर्थात राजा और प्रजा में कर संग्रह को लेकर पूर्ण समन्वय हो जाए और फिर उसे सार्वजनिक कार्यों पर ही व्यय किया जाने लगे तो भारत में पचास वर्ष के विकास कार्य दस वर्ष में ही पूर्ण हो जाएंगे। इसके लिए पहल तो शासन को ही करनी पड़ेगी और उसे यह विश्वास दिलाना होगा कि अब भारत में मुगलों या अंग्रेजों का शासन नहीं है, अपितु अब तो ‘रामराज्य’ है। इधर जनता अपने ‘राम’ को स्वेच्छा से कर देना आरंभ कर दे। देश सचमुच तीव्र गति से आगे बढऩे लगेगा। तब हमें ‘कलैक्टर’ और पुलिस की आवश्यकता भी नहीं रहेगी, भारत में पुन: ताले मिलने बंद हो जाएंगे

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