प्रणव मुखर्जी अब भारत के पूर्व राष्ट्रपति हो गये हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि उनका व्यक्तित्व असाधारण है और उन्हें अपने जीवन में राष्ट्रपति के रूप में नहीं अपितु प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्र की सेवा करने का अवसर मिलना चाहिए था। परंतु कांग्रेस में जब तक एक ही परिवार की आरती उतारने वाली चारण मण्डली जीवित है-तब तक प्रणव जैसी और भी प्रतिभाओं के यूं ही मसले जाने की पूर्ण संभावना है।
अब प्रणव मुखर्जी ने जाते-जाते देश को फिर एक संदेश दिया है कि भारत की आत्मा सहिष्णुता है। अत: हमें देश में अहिंसा की शक्ति को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर दिन हिंसा का बढ़ता हुआ रूप हम देख रहे हैं…इसके केन्द्र में भय और आपसी अविश्वास है। पूर्व राष्ट्रपति ने देश के लोगों को सचेत किया कि भारत एक भौगोलिक क्षेत्र भर नहीं अपितु विभिन्न सोच, विचारधारा और दर्शन का मिलन है। सहिष्णुता हमें शक्ति देती है। हम किसी से सहमत हों, या असहमत, पर देश के भीतर व्याप्त बहुलतावाद को नकार नहीं सकते।
प्रणव दा का राष्ट्रपति के रूप में दिये अंतिम संदेश का एक-एक शब्द माला का मोती बनाकर पिरोया गया। बिना किसी अतिरिक्त उत्साह के उन्होंने शालीनता के साथ अपना अंतिम संदेश राष्ट्र को दिया। जिसमें उनकी पूर्ण गम्भीरता और शालीनता झलकती रही-मानो उन्होंने विदा के क्षणों में भी शान्त और निद्र्वन्द्व रहने का गीता का शाश्वत उपदेश अंगीकार कर लिया था। सदा की भांति अपने अंतिम संदेश में भी वह देश की नब्ज पर हाथ रखकर बोले। उनका यह संदेश देश के लिए उपदेशामृत से कम नहीं था। इसके उपरांत भी कुछ लोगों ने पूर्व राष्ट्रपति के अंतिम संदेश की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है कि जैसे वह वर्तमान सरकार को असहिष्णुता के मुद्दे पर कठघरे मंय खड़ा कर गये हों। जबकि ऐसा नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव दा एक सुलझे हुए विचारों के राजनेता रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में रहकर कांग्रेसी पृष्ठभूमि का होते हुए भी प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के साथ गरिमापूर्ण सहयोग किया। उन्होंने इस बात को समझा कि मोदी को देश के लोगों ने जनादेश दिया है-तो मुझे इस जनादेश का सम्मान करते हुए सरकार का उचित मार्गदर्शन करना चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अपनी पहली भेंट में ही यह संदेश दे दिया था कि-‘तुम्हें जनता ने जनादेश दिया है, जिसका मैं सम्मान करता हूं।’ तीन वर्ष से अधिक उन्होंने पीएम मोदी के साथ कार्य किया, पर इस कार्यकाल में उन्होंने सरकार का इतना सहयोगपूर्ण मार्गदर्शन किया कि उनके विदाई भाषण में श्री मोदी की आंखों में आंसू आ गये। सारे देश ने लोकतंत्र की गहराई और सच्चाई को अपनी आंखों से देखा और यह समझा कि सहिष्णुता क्या होती है? अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा में पले-बढ़े दो महानायक देश चलाने के लिए साथ-साथ चले और पिता-पुत्र की भांति चले। तीन वर्ष के इस काल को भारत के लोकतंत्र ने अपनी शानदार उपलब्धि मानकर इतिहास की मंथनशाला में डाल दिया है। निश्चय ही इतिहास इस काल पर लोकतंत्र की भावना के अनुरूप ही अपनी सहमति की मुहर लगाएगा।
सहिष्णुता निश्चय ही लोकतंत्र की आत्मा है। इस भावना का सम्मान भारत ने प्रारम्भ से ही किया है। वेद ने भारत के जन-जन को यह संदेश दिया है कि वही शासन व्यवस्था उत्तम होती है जिसमें ये तीन बातें मिला करती हैं :-(1) शासन में न्याय ठीक-ठाक और समय पर हो। (2) राजा अथवा शासकवर्ग सारी प्रजा को निज संतान समझकर प्रेम से व्यवहार करने वाला हो (3) राजा शत्रुओं से राष्ट्र की रक्षा करने वाला हो।
यदि तीन बातें शासन व्यवस्था में होंगी तो वेद कहता है कि ”अंह दुरितम् न अष्ट” (साम. 426) पाप, दुर्गति और अशान्ति कभी नहीं होंगी।
प्रणव दा और प्रधानमंत्री मोदी ने मानो राष्ट्र के कल्याण के लिए मिलकर अपना न्यूनतम सांझा कार्यक्रम वेद के उपरोक्त संदेश को बना लिया था, और देश को पाप, दुर्गति और अशांति से बचाने के लिए पिता-पुत्र की भांति साथ-साथ चलना स्वीकार कर लिया। सहिष्णुता की कितनी ऊंची मिसाल है?
पूर्व राष्ट्रपति ने अपना संदेश सभी के लिए दिया है। इसे इसी रूप में जानना चाहिए। उन्होंने तथाकथित गौ आतंकियों और भगवाधारियों के लिए ही यह संदेश नहीं दिया है। जो लोग उनके संदेश का ऐसा अर्थ निकाल रहे हैं-वे अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दे रहे हैं और एक बड़े संदेश को दलगत राजनीति की कीचड़ में सानकर उसके अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने प्रत्येक प्रकार की असहिष्णुता को राष्ट्र के लिए अनर्थकारी माना है। उन्होंने जब ऐसा कहा है तो उसका अर्थ यह भी है कि वे मजहब के नाम पर किये गये देश के बार-बार के विखण्डन की पीड़ा से पीडि़त हैं, और जो लोग इसी आधार पर देश का पुन: विभाजन करने-कराने के सपने उधेड़ बुन रहे हैं, वे वास्तविक रूप में असहिष्णु हैं, क्योंकि उन्हें इस देश की एकता और अखण्डता बनी रहे-यही सहन नहीं है, उन्होंने काश्मीर से अपना घर बार छोडक़र अपने ही देश में शरणार्थी बन गये लोगों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त कर उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करने वाली असहिष्णुता को भी लताड़ा है। साथ ही जो लोग हमारे शैक्षणिक संस्थानों में बैठे रहकर हमारी ही संस्कृति को मिटाने का षडय़ंत्र रच रहे हैं और जिन्हें भारत की कोई भी मान्यता और कोई भी मूल्य इसलिए मान्य नहीं है कि वह भारतीय है-पूर्व राष्ट्रपति ने ऐसी असहिष्णु मानसिकता को भी लताड़ा है, उन्होंने उन लोगों को भी लताड़ा है जो भारत का खाकर पाक के गीत गाते हैं, उन्होंने कश्मीर के पत्थरबाजों को भी लताड़ा है और पूर्वोत्तर में उन अलगाववादी संगठनों को भी लताड़ा है जो देश की बहुलतावादी संस्कृति का सम्मान न करके वहां धर्मांतरण के बीज बोकर देश के विभाजन की तैयारी कर रहे हैं और हिंसा में संलिप्त हैं। सचमुच पूर्व राष्ट्रपति के संदेश के बड़े गहरे और व्यापक अर्थ हैं। उसका गहन विस्तार है। हमें उसे सही अर्थों व संदर्भों में लेने की आवश्यकता है। वह सबके लिए बहुत बड़ी बात कह गये हैं, किसी शायर ने क्या खूब कहा है :-
इन्हें आंसू समझकर यूं न मिट्टी में मिला जालिम।
पयामे दर्दे दिल है और आंखों की जुबानी है।।

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