आर्य (हिन्दू) की व्याख्या और ऊर्जा का अपव्यय, भाग-5

इन सारी विकृतियों से मुक्त समाज ‘आर्य समाज’ ही होगा। उसे चाहे आप जो नाम दे लें। किंंतु वह समाज वास्तव में मानव समाज कहलाएगा। जिसकी ओर बढऩे के लिए हमको वेद ने आदेशित करते हुए कहा कि-‘मनुर्भव:’ अर्थात मनुष्य बन।
श्रेष्ठ मानव समाज और कर्म और विज्ञान के समुच्चय में विश्वास रखने वाले मानव धर्म की स्थापना करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमें आलोचना के तीखे स्वरों को शान्त करना होगा, क्योंकि यह केवल श्रम, समय और अर्थ शक्ति का दुर्विनियोजन है। हमें अपनी ऊर्जा का सही दिशा में व्यय करना चाहिए। जिस दिन विश्व समाज भारत के ‘मनुर्भव:’ के रहस्य को समझ जाएगा और इसी के अनुसार व्यक्ति निर्माण की योजना पर कार्य आरंभ कर देगा-उस दिन समष्टि निर्माण स्वयं हो उठेगा।
जो लोग हिंदुस्थान, हिंदी और हिंदू के समीकरण पर आपत्ति कर रहे हैं वे कुछ उदारवादी और लचीला रूख दिखाते हुए इस समीकरण के साथ समन्वय दिखायें। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हिंदू इस देश का महत्तम समापवर्तक है। प्रसिद्घ आर्य विद्वान ‘क्षितिश वेदालंकार’ जी लिखते हैं –
‘हम जानते हैं कि आज तक हिंदू शब्द की जितनी परिभाषाएं की गयीं हैं उनमें अव्याप्ति या अति व्याप्ति का दोष रहा है और वे सर्वमान्य नहीं हो पायी हैं। पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण यही है कि जिस मान्यता से अधिकतम समस्याओं का अधिकतम समाधान हो सके उसे ही मान लेना चाहिए।’
आज इसी दृष्टिकोण को अपनाकर ऊर्जा के गलत दिशा में हो रहे अपव्यय से बचना होगा। परिस्थितियों का तकाजा और युगीन आवश्यकता यही है। यदि हिंदी को हम संस्कृत का आधुनिक संस्करण बना सकते हैं तो हिंदू को भी आर्य का आधुनिक संस्करण बनाने की तैयारी हमें करनी होगी। जिससे हमारे बीच के अनावश्यक वाद-विवाद समाप्त हो सकते हैं। और भी कुछ नहीं तो हम हिन्दू को आर्य का स्थानापन्न तो स्वीकार कर ही लें, और हिन्दू शब्दों की व्याख्या को लेकर लडऩा-झगडऩा बंद करें। वैज्ञानिक आधार पर आर्य को अपने लिये अपनायें और वर्तमान संदर्भों में अपनी पहचान के लिए हिन्दू को अपना लें।
हिन्दुत्व की सुरभि का नाम आर्यत्व है और हिंदू का उत्कृष्टतम् स्वरूप आर्य है-इसी सुरभि और उत्कृष्टतम् स्वरूप का नाम ‘आर्य संस्कृति’ है, जो मानव को मानव से जोड़ती है। इसी को आज ‘हिंदुत्व’ के नाम से जाना जाता है।
इस सत्य को हमें समझना होगा, क्योंकि आर्य संस्कृति विश्व को परिवार मानती है-उसका नारा है-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ विश्व के किसी भी कोने में रहने वाला व्यक्ति इसके मानवीय दृष्टिकोण से परे नहीं है। व्यक्ति के दृष्टिकोण की इसी पूर्णता का नाम हिंदुत्व भी है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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