भारत में ‘कंस’ को निपटाने के लिए ‘कृष्ण’ उत्पन्न होते रहे हैं, और भारत की जनता ने ऐसे जननायक कृष्ण को ‘भगवान’ की श्रेणी में रखकर यह बताने का प्रयास किया है कि वह लोककल्याणकारी शासक को भगवान के समान इसलिए मानती है कि भगवान का कार्य भी लोककल्याण ही होता है। अत: यदि उसके इस महान कार्य को कोई व्यक्ति पूर्णता के साथ संपन्न करता है तो उसे वह ऐसा सम्मान देगी ही। ये जननायक भारत के ‘जनलोकपाल’ हैं, जिन्हें भारत ने इतना महिमामंडित किया है कि वे इस सनातन राष्ट्र की सनातन संस्कृति के अविभाज्य अंग ही बन गये हैं और हमें अपने साथ सदा खड़े दिखायी देते हैं। उनका व्यक्तित्व युग-युगों से भारत का नेतृत्व करता आ रहा है और जब तक यह सृष्टि है तब तक करता रहेगा। इसका कारण केवल यही है कि हमारे इन महापुरूषों का व्यक्तित्व असाधारण था और उन्होंने असाधारण ही कार्य किये। जब कभी भी और जहां भी हम शासक वर्ग को ‘कंस’ बनते देखते हैं तो गीता हमारे लिए भगवान कृष्ण बनकर किसी न किसी ‘अर्जुन’ को दुष्ट दलन के लिए प्रेरित कर ही डालती है। यह गीता ही थी-जिसने विदेशी आततायी शासकों के विरूद्घ भारत को पहले दिन से युद्घ करना सिखाया और जब तक विदेशी आततायी शासक यहां से चला नहीं गया तब तक उसके विरूद्घ भारत में जनांदोलन चलते रहे। इस प्रकार गीता इस देश का एक क्रांतिकारी ग्रंथ है, जिसमें व्यवस्था देने और दुव्र्यवस्था को परिवर्तित कर देने की पूर्ण संभावनाएं हैं।

इसके उपरांत भी इन दीर्घकालीन जनान्दोलनों को आप भारत में ‘गृहयुद्घ’ की संज्ञा नहीं दे सकते। इसका कारण यही है कि ये जनान्दोलन ‘कंस’ को मिटाने के लिए ‘कृष्ण’ के व्यक्तित्व का ऐसा विस्तार थे-जिनमें एक साथ अनेकों ‘कृष्ण’ उत्पन्न हो गये थे। ये ‘कृष्ण’ कंस का वध करते जा रहे थे और भारत में क्रांति की अलख जगा रहे थे। इन्हें ‘गृहयुद्घ ‘ इसलिए नहीं कहा जा सकता कि ये जनान्दोलन दुष्ट आततायी शासकों के विरूद्घ इसलिए चल रहे थे कि उसकी क्रूर राजशाही का अंत हो सके और जनता को वास्तविक लोककल्याणकारी शासन मिल सके। इसे गृहयुद्घ तब कहा जा सकता है-जब देश में एक वर्ग किसी दूसरे वर्ग के मौलिक अधिकारों का हनन करने को उतारू दिखता हो और उस वर्ग ने ऐसे शोषक वर्ग के विरूद्घ तलवार उठा ली हो। जैसा कि विदेशों में अक्सर हुआ है। भारत इतना मजबूत सामाजिक ढांचा विकसित कर चुका था कि उसमें कोई भी वर्ण किसी भी दूसरे वर्ण के साथ समन्वय करके ही आगे बढ़ सकता था। उससे किसी दूसरे वर्ण के मौलिक अधिकारों के हनन की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती थी। ब्राह्मण के लिए क्षत्रिय की आवश्यकता थी और क्षत्रिय के लिए ब्राह्मण की आवश्यकता थी। इतना ही नहीं वैश्य की आवश्यकता भी प्रत्येक वर्ण को थी और वैश्य को भी प्रत्येक वर्ण की आवश्यकता थी। शूद्र के साथ भी ऐसा ही था। पर शूद्र को अपनी सामाजिक व्यवस्था को उत्तम बनाने की पूरी छूट थी, वह विद्घत्ता प्राप्त कर द्विज बन सकता था। इसी को वास्तविक लोकतंत्र कहा जाता है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ भी इसी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के माध्यम से संभव है।
भारत में वर्ण व्यवस्था थी- जिसमें वर्ग संघर्ष नहीं था। इसके विपरीत वर्ण समन्वय था और यदि इस समन्वय को तोडऩे का किसी ने प्रयास किया या इसके स्वरूप में कभी कहीं पर कोई विद्रूपता दिखायी भी दी तो उसे ठीक करने के लिए समय-समय पर कोई न कोई ‘शंकराचार्य’ या ‘महर्षि दयानंद’ उत्पन्न होता रहा। इसका अभिप्राय है कि सामाजिक समरसता को भारत में ठीक बनाये रखने का दायित्व राजशाही ने न संभालकर धर्माचार्य प्रमुखों ने या समाज सुधारक सामाजिक नेताओं ने ही संभाला है। उन्होंने शूद्र की स्थिति को सम्मानजनक बनाया और किसी भी वर्ण को इस बात के लिए स्वतंत्रता प्रदान नहीं की कि वह स्वेच्छाचारी या निरंकुश हो सके। इन लोगों के ऐसे महान कार्यों से भारत के समाज में शांति बनी रही। जिससे भारत में कभी भी गृहयुद्घ नहीं हुआ। जिन विदेशी सत्ताधीशों के विरूद्घ भारत में क्रांति होती रही या जनांदोलन हुए उनके विरूद्घ हुए उन जनान्दोलनों को भी गृहयुद्घ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन जनान्दोलनों में प्रथमत: तो हमारे ही लोगों का एक दूसरे के प्रति हिंसकभाव नहीं था और ना ही वे एक दूसरे की सम्पत्ति लूट रहे थे। उनका उद्देश्य तो विदेशी आततायी शासकों का अंत करना था। जिसमें सभी एक साथ मिलकर कार्य कर रहे थे। इसके विरूद्घ विदेशों में वर्ग संघर्ष की भावना प्रारंभ से ही रही है। जिसमें एक वर्ग ने दूसरे वर्ग पर अमानवीय अत्याचार किये हैं। जिनसे गृहयुद्घ भडक़े और उन गृहयुद्घों में विदेशों में लोगों ने भारी क्षति उठायी है। भारत ने वर्ण समन्वय की खोज की और विदेशों ने वर्ग संघर्ष की खोज की। चिंतन के इसी अंतर ने भारत को विश्व का सिरमौर बना दिया। विश्व में जितने भर भी युद्घ मजहब के नाम पर हुए हैं-वे सारे के सारे वर्ग संघर्ष की सोच की परिणति है। भारत पर भी मजहब के नाम पर जितने आक्रमण कर यहां अपनी शासनसत्ता स्थापित करने का लोगों ने प्रयास किया वे सब भी वर्ग संघर्ष का ही एक रूप थे। जिसमें एक वर्ग या एक संप्रदाय किसी दूसरे संप्रदाय या वर्ग को मिटाने के लिए आ रहा था। भारत में यह वर्ग संघर्ष की बीमारी जैसे ही प्रविष्ट हुई वैसे ही भारत ने उसे समूल नष्ट करने का प्रयास करना आरम्भ कर दिया। इसके उपरांत भी भारत के इतिहास को ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया है कि जैसे भारत में वर्ण समन्वय भी वर्ग संघर्ष की ही एक काली छाया थी। आज भी भारत के वर्ण समन्वय को विश्व यदि समझ ले और अपना ले तो वास्तविक विश्वशांति स्थापित हो सकती है, और पिछले दो हजार वर्ष से विश्व जिस प्रकार के वर्ग संघर्ष (साम्प्रदायिक या मजहबी युद्घों) से जूझ रहा है, उससे उसे मुक्ति मिल सकती है।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
interbahis giriş
interbahis giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vipslot giriş
vipslot giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
aresbet giriş
aresbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
Grandpashabet Giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
vipslot giriş
vipslot giriş
orisbet giriş
orisbet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
perabet giriş
perabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş