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आवश्यकता है पत्रकारिता को पहचानने की

राकेश आर्य (बागपत)
एक समय था जब हम किसी समाचार के लिए कहते थे कि अमुक बात समाचार पत्र में आई है, अत: इस पर शक करने की कोई गुंजाइश नहीं है, परंतु समय के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी गिरावट आई है और यहां भी कुछ पेशेवर लोग घुस आये हैं।
‘पत्रकारिता दिवस’ 30 मई के अवसर पर हमें पत्रकारिता धर्म पर भी कुछ निष्पक्ष चिंतन करने की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में जो लोग 8वीं 10वीं या इंटरमीडिएट तक की शिक्षा ग्रहण किये होते हैं और किसी समाचार पत्र के लिए संवाद लिखना तक नही जानते,
अपितु इधर -उधर से समाचार चोरी करके अपने समाचार पत्र के लिए भेजते हैं, वह भी स्वयं को जनता के बीच पत्रकार कहते हैं। मैं अपवादों का सम्मान करते हुए अपने सभी मीडिया बंधुओं से निवेदन करना चाहता हूं कि पत्रकारिता के क्षेत्र में अपात्र लोगों को घुसने से
रोकने के लिए भी एक आचार संहिता होनी चाहिए।
कुछ लोग मीडिया जगत में आकर अधिकारियों पर रोब जमाना और पत्रकारिता के अपने व्यवसाय की दुहाई देकर लोगों का भयादोहन करने पर लगे रहते हैं। स्वच्छ और स्वस्थ पत्रकारिता का तकाजा होता है कि सच्ची और अच्छी बात को तार्किक आधार पर प्रकाशित कराया
जाए। पत्रकारिता का उद्देश्य व्यवस्था में आये दोषों की ओर ध्यान दिलाकर उन दोषों को दूर करने के लिए अपनी ओर से अच्छे सुझाव प्रस्तुत करना भी होता है। जो लोग व्यवस्था में आई किसी कमी के कारण किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को केवल सजा दिलाने के
लिए समाचार छापते छपवाते हैं उनका आचरण भी स्वच्छ पत्रकारिता की भावना के विपरीत होता है।
 कुछ लोग अपनी ओच्छी मानसिकता की पत्रकारिता का कदम-कदम पर परिचय देते हैं। ऐसे लोगों को नहीं पता होता पत्रकारिन्ता किसे कहते हैं? इन लोगों के प्रत्येक कार्य से सिर्फ नकारात्मकता ही नजऱ आती है। मैं मानता हूं कि पत्रकारों को व्यवस्था की कमियों को
उजागर करना ही चाहिए, क्योंकि यह उनका विशेष अधिकार है और इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है, इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है। परंतु ऐसा न हो जाए कि कहीं कमियां उजागर करते-करते हमें सिर्फ काला ही काला अर्थात
व्यवस्था का दोष ही दिखाई दे, और कहीं पर भी अच्छाई नजर न आए।
ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम कुछ भी गलत या सही सिर्फ वाह वाही लूटने के लिए लिखते रहें, इससे समाचार पत्रों की गरिमा को चोट पहुंचती है और पत्रकार बंधुओं की पत्रकारिता की उच्चतम भावना की पवित्रता भी भंग होती है।
आज हम देखते हैं कि समाचार पत्र-पत्रिकाओं में छपी किन्हीं बातों पर कोई व्यक्ति खास विश्वास नहीं करता। इसके लिए कोई और नहीं बल्कि हम पत्रकार ही जिम्मेदार हैं, और इसका प्रभाव यह पड़ा है कि अब समाचार पत्र की किसी बात का वह असर भी नहीं होता
जो कभी हुआ करता था। अभी पिछले दिनों 27 मई को एक दैनिक समाचार पत्र में छपी एक खबर को ही लें, जिसमें पत्रकार बंधु ने शिक्षा विभाग के सभी अधिकारियों तथा अध्यापकों को एक झूठी खबर प्रकाशित कराकर भ्रष्ट बता दिया। यह खबर हो सकता है कि
दिल्ली प्रदेश के शिक्षा विभाग के लिए सत्य हो, परंतु उसे बिना सोचे-विचारे मेरठ से प्रकाशित कर के न सिर्फ झूठ परोसा गया, अपितु तथ्यों की भलीभांति पड़ताल न करके उसे छापने के लिए छपवाने का एक असामाजिक कृत्य भी किया है।
‘शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की पुरजोर कोशिश’ विषय पर लिखते हुए उक्त पत्रकार बंधु ने लिखा कि मिड डे मील के लिए 5.75 से 9.50 रुपए प्रति छात्र सरकार प्रदान करती है, जबकि सत्य यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार प्राथमिक विद्यालय में 4
रूपये 13 पैसे तथा उच्च प्राथमिक विद्यालय में 6.18 रुपये प्रति छात्र देती है, तथा उसके साथ ऐसा मैन्यू दिया है जो इस राशि में आज के समय में संभव नहीं है फिर भी पत्रकार बंधु ने सभी अधिकारियों तथा प्रधान- अध्यापकों का चरित्र हनन कर दिया।
अब आप देखिए 1 सप्ताह में 6 दिन में यदि 100 छात्रों के भोजन के लिए दी गयी राशि को देखें तो वह 2478 (41336)रुपए होती है इसमें से बुधवार को 100 छात्रों को 15 लीटर दूध देना होता है उसमें चीनी, गैस आदि को मिलाकर कुल खर्च
लगभग 1000रु आएगा। एक सप्ताह में सौ बच्चों के लिए 2478 रूपये मिड डे मील के लिए मिले, उसमें से 1000 रूपये बुधवार को दिये जाने वाले दूध के आप निकाल दें, तो अब 1478 रुपए बचे। इतने में 6 दिन के 600 (10036) छात्रों को
दाल , सब्जी, मसाले, गैस सोयाबीन की बड़ी, सफाई का सामान ,रिफाइंड आदि खरीद कर भोजन देना होता है। साथ ही आज के समय में 4 रूपए में कौन सा फल बिना काटे प्रति छात्र देना संभव है? पत्रकार बंधु ने चरित्र हनन करने से पहले यह भी गहराई
से नहीं सोचा कि क्या यह संभव है अथवा नहीं?
यहां पर अच्छा होता कि हमारे पत्रकार बंधु इन सारे तथ्यों पर विचार करते हुए अपना लेख तैयार करते। साथ ही चौदह सौ अठत्तर रूपये छह सौ बच्चों के लिए कितने पर्याप्त या अपर्याप्त हो सकते हैं, इस पर लिखते। यह भी स्पष्ट करते कि या तो सरकार इतने पैसे
देना बंद करे या फिर इस राशि को संतोषजनक ढंग से और बढ़ा दे।
मैं किसी संस्था या किसी कर्मचारी की वकालत नहीं कर रहा हूं, इसलिए अपने पत्रकार धर्म के साथ न्याय करते हुए मैं यह भी कहना चाहूंगा कि हमारे पत्रकार बंधु को अपने उक्त लेख में मिड डे मील योजना में हो रहे किसी प्रकार के घपले, भ्रष्टाचार या अनियमितता
को लेकर और उसे रूकवाने के उद्देश्य से यह भी स्पष्ट करना चाहिए था कि इसके लिए किसी अधिकारी की नियुक्ति की जाए और गांवों में या कस्बों में कुछ लोगों की ऐसी टीम गठित कर दी जाए जो विद्यालयों के अध्यापक अध्यापिकाओं की मनमानी पर रोक लगा सके।
इस प्रकार हम गलत सूचना देकर या तथ्यहीन लिखकर या किसी के चरित्रहनन के लिए लिखकर इन समाचार पत्रों के अस्तित्व को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ऐसी बातों पर कभी कोई विश्वास नहीं करेगा। कुछ पत्रकार बिना वजह या किसी लालच के वशीभूत होकर किसी
के भी खिलाफ कुछ भी लिख देते हैं, उनकी यह प्रवृत्ति बदलनी चाहिए। पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हमें इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए।   

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