हमारे प्राचीन ऋषियों ने पशु-पक्षियों की अनेकों प्रेरणास्पद कहानियों का सृजन किया, और उन्हें बच्चों को बताना व पढ़ाना आरंभ किया। उसे बच्चे के मनोविज्ञान के साथ जोड़ा गया और परिणाम देखा गया कि बच्चों पर उसका आशातीत प्रभाव पड़ा। वेद और उपनिषदों की गूढ़ बातों को पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से आचार्य लोग बड़े वात्सल्यपूर्ण भाव से अपने विद्यार्थी के हृदय में उतार देते थे। जिन्हें विद्यार्थी बड़े मनोयोग से सुनता था और उन्हें चाव-चाव में हृदयंगम कर जाता था।

आज की शिक्षा पद्घति भी खेल-खेल में शिक्षा की बात कहती है, परंतु उसकी खेल-खेल में शिक्षा भारत के आचार्यों द्वारा दी जाने वाली खेल-खेल में शिक्षा से भारी अंतर रखती है। आज कंप्यूटर या टी.वी. पर बच्चों को निर्जीव कार्टूनों के माध्यम से शिक्षा दी जा रही है। जिनमें गोली चलाने, चोरी करने या और किसी भी प्रकार की हिंसा या पापाचार के दृश्य भी आते हैं। इन्हें देखकर बच्चे हृदयहीन और हिंसक बन रहे हैं। जबकि पशु-पक्षियों की कहानी सुनकर बच्चे सहृदयी बनते थे और उनके भीतर सभी जीवधारियों के प्रति दयालुता का भाव उत्पन्न होता था। उन्हें लगता था कि पशु-पक्षी भी हमारे सहजीवी हैं और उनके भीतर भी संवेदनाएं हैं, जिनका हमें हृदय से सम्मान करना चाहिए। उन कहानियों से कोई न कोई शिक्षाप्रद संदेश उन्हें मिलता था -जिसे वे अपने जीवन के लिए अपना लेते थे। उनमें हर प्राणी के जीवन का सम्मान करने का भाव विकसित होता था। जिसे आचार्य का वात्सल्य भाव विशेष रूप से विकसित करता था।
हमारी शिक्षा प्रणाली की अनूठी विशेषता यह थी कि वह पूर्णत: नि:शुल्क होती थी। शिक्षा, दूध और पूत बेचना भारत में पूर्णत: निषिद्घ था। शिक्षा अर्थात ज्ञान नि:शुल्क देना पुण्य माना जाता था, दूध हमारे यहां इतना होता था कि उसका पैसा लेना पाप माना जाता था और पूत अर्थात पुत्र के जन्म लेते ही उसे सबका कल्याण करने वाला और सबके काम आने वाला माना जाता था। कोई भी चीज तभी बेची जाती है-जब उसकी कमी होती है। प्राचीनकाल में घर-घर में विद्वान होते थे, और ऐसे विद्वान होते थे कि उनका जीवनोद्देश्य ही संसार का कल्याण करना होता था। अत: वे अपने ज्ञान को नि:शुल्क बांटकर जनसेवा करते थे। उधर संसार भी ऐसे नि:स्वार्थी लोगों को भरपूर सम्मान दिया करता था। इन नि:स्वार्थी आचार्य लोगों के द्वारा नि:स्वार्थ भाव से की गयी सेवा का परिणाम यह निकलता था कि समाज के अन्य लोग भी समाजसेवी बनने के लिए प्रेरित होते थे।
ऐसे में समाजसेवा के लिए वैश्य लोग आगे आते थे और वे आचार्यों व ब्रह्मचारियों व ब्रह्मचारिणियों की वस्त्र व भोजनादि की व्यवस्था करते थे। भारत में समाज और धर्म की सेवा के लिए आज भी वैश्य लोग बड़े कत्र्तव्यनिष्ठ होकर सामने आते हैं। इसका कारण उनके भीतर भारत के इस पुराने संस्कार का समाविष्ट होना ही है। आचार्यों को अपने विद्यार्थियों की व यज्ञादि की सुरक्षा के लिए शस्त्र-निपुण क्षत्रिय लोगों की भी आवश्यकता पड़ती थी। जिसकी पूर्ति हमारे क्षत्रिय लोग अपना कत्र्तव्य समझकर किया करते थे, और अपनी नि:शुल्क सेवाएं देकर राष्ट्रयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने तक के लिए तत्पर रहते थे। विद्यालयों के उचित रख-रखाव आदि के लिए भी धनादि की आवश्यकता पड़ती थी। जिसे हमारे राजा लोग पूर्ण करते थे।
इस प्रकार एक विद्यार्थी के निर्माण के लिए सारा समाज अपना नि:स्वार्थ योगदान देता था। इस नि:स्वार्थपूर्ण परिवेश में सब एक दूसरे के काम आने को अपना सौभाग्य मानते थे। भारत में नागरिक निर्माण की या मनुष्य को मनुष्य बनाने की यही सुंदर परम्परा थी। ऐसे विद्यार्थी जब बड़े होते थे तो वह समझ जाते थे कि तेरे ऊपर सारे संसार का और समाज का भारी ऋण है, जिससे उऋण होना तेरा कत्र्तव्य है। इसलिए वह भी उस ऋण से उऋण होने के लिए विशेष कार्य करता था और समाज की भलाई के कार्यों में लगना अपना सौभाग्य मानता था।
आजकल हम किसी भी देश में मनुष्य या नागरिक निर्माण की इस भारतीय परम्परा को जनसाधारण की मान्यता मिलते हुए नहीं देख रहे हैं। कुल मिलाकर बच्चे के माता-पिता के ऊपर ही उसके निर्माण का दायित्व होता है, और वह भी अपनी वृद्घावस्था का सहारा उसमें देखकर उसे अपने लिए कुछ बनाने का प्रयास कर रहे होते हैं, जबकि वह विद्याध्ययन करते समय अपनी स्वयं की कार-कोठी और नौकर-चौकरों के सपने संजोता है। उसके सपनों में माता-पिता या किसी अन्य वृद्घजन को साथ रखना कहीं नहीं होता। इसका अभिप्राय हुआ कि आज जब एक विद्यार्थी का निर्माण हम करते हैं तो उस समय समाज का, उसके माता-पिता का और उसका स्वयं का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है। इन सब में मतैक्यता नहीं होती। जिससे समाज का परिवेश दूषित हो रहा है। बच्चे संसार के उपकार की बात तो छोडिय़े, माता-पिता के उपकार से उऋण होने के विषय में कुछ भी नहीं सोच रहे हैं।
भारत की महान परम्परा का चमत्कार देखिये कि बच्चा एक का है, और उसके निर्माण में योगदान सबका है। इसके विपरीत पश्चिमी शिक्षा की स्थिति देखिये कि जिसका बच्चा है-उसके निर्माण में उसी का योगदान है। चिंतन के इसी भारी अंतर के कारण भारत का प्राचीन समाज सुख-शान्ति से रहता था। जबकि पश्चिमी जगत आज भी सुख-शान्ति से नहीं रह पा रहा है। यद्यपि उसने अपनी सुख-शान्ति के लिए अपने भौतिक साधनों में पर्याप्त वृद्घि कर ली है, परंतु उसकी यह सारी भौतिक उन्नति उसे काट खाने को आती है। जिससे उसे चैन नहीं मिल पा रहा है। निश्चय ही भारत की शिक्षा प्रणाली को अपनाकर ही पश्चिमी देशों को स्थायी शांति प्राप्त हो सकती है।
हमारी गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली में समान व्यवहार और खान-पान आदि का भी विशेष ध्यान रखा जाता था। इसे भी भारत की प्राचीन शिक्षा-प्रणाली की विशेषता ही माना जाएगा। इससे बच्चों में समानता का भाव विकसित होता था।
उनमें ऊंच-नीच की भावना बचपन से ही मिट जाती थी। वे जीवन के हर क्षेत्र में सदा मिलकर चलने का प्रयास करते थे। कुछ लोगों ने एक ही बर्तन में साथ-साथ खाकर और एक ही पंक्ति में बादशाह और रियाया को इबादत के लिए खड़ा करके यह कहकर अपनी पीठ अपने आप ही थपथपाई है कि वास्तविक भाईचारा और समानता तो हमारे यहां है। इधर हम हैं कि हमने उनके इस तर्क को सत्य मान लिया है, और बिना इस बात पर विचार किये मान लिया है कि उनकी समानता या भाईचारा तो किन्हीं अपने ही मजहबी लोगों के लिए है, जबकि हमारा भाईचारा सदा सार्वभौम रहा है, सबके लिए रहा है। हमारा यह भाईचारा विद्यालय से ही बच्चों को सिखाया जाना आरंभ कर दिया जाता था।
मध्यकाल में जिन लोगों ने जातीय अभिमान के वशीभूत होकर छुआछूत या अस्पृश्यता की भावना को अपनाया और शूद्रों को या महिलाओं को शिक्षा का अधिकार न देकर या उन्हें पवित्र धार्मिक स्थलों पर जाने की अनुमति न देकर उनके प्रति अपनी असहिष्णुता या असमानता की भावना का प्रदर्शन किया, उनका यह अपराध भारत की संस्कृति नहीं है। इसे आप संस्कृति की विकृति कह सकते हैं। विकृति में सदा ही सुधार की आवश्कता होती है। यही कारण रहा कि इस प्रकार की विकृतियों के सुधार के लिए अनेकों समाज सुधारक भारत में समय-समय पर आते रहे हैं। इन लोगों ने आकर भारत के लोगों का मार्ग-दर्शन किया और उन्हें अपने संस्कृति बोध से प्रेरित कर भारत की वास्तविक संस्कृति से परिचित कराया।
क्रमश:

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