हम महाभारत के पृष्ठ पलटें तो पता चलता है कि दुर्योधन युधिष्ठिर की श्री को देखकर सदा जलता रहता था। वह अपने पिता धृतराष्ट्र से कहता भी है कि मैं जो कुछ भोगता हूं युधिष्ठिर की लक्ष्मी देखकर उनमें मन नहीं रमता। युधिष्ठिर की दैदीप्यमान राजश्री ही मेरे तेज को नष्ट कर रही है। इस पर शकुनि की सक्रियता बढ़ती है और वह दुर्योधन को युधिष्ठिर की अनुपम लक्ष्मी व राज्य को छल व कपट से जीतने का मार्ग बताता है। वह कहता है कि धरती भर में मैं चौपड़ खेलने में कुशल हूं। चौपड़ में हार जीत का भेद जानता हूं तथा उसके विभिन्न प्रकारों का भी ज्ञान रखता है। इसके साथ-साथ देशकालादि की विशेषता समझता हूं। युधिष्ठिर जुए से प्रेम करते हैं, परंतु खेलना नहीं जानते। इसलिए तुम उनसे जाकर कहो कि ‘आओ जुआ खेलें’ इस प्रकार बुलाये जाने पर वह अवश्य आएगा। फिर उसको छल पूर्वक जीतकर राज्य की प्राप्ति हो जाएगी। दुर्योधन ने शकुनि की बात सुनकर धृतराष्ट्र से कहा-चौपड़ में दक्ष मामा खेलकर पाण्डु पुत्रों की संपत्ति हड़पना चाहते हैं, अत: आप आज्ञा दीजिये।
धृतराष्ट्र दुर्योधन को समझाते हुए कहते हैं कि राज्य में जितना धन तुम्हें मिला है उतना ही पाण्डवों को भी मिला है, जो तुम्हारे मित्र हैं वही उसके भी मित्र हैं। वे किसी से द्वेष नहीं करते, फिर तुम उनसे क्यों द्वेष कर रहे हो? यदि तुम युधिष्ठिर की तरह श्री प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम भी यज्ञ करके राज्य प्राप्त करो।
इस प्रसंग को हम सामान्यत: एक कहानी का कथानक समझकर हल्के में लेते हैं। जबकि यह राजनीति का गम्भीर विषय है और मानवीय चरित्र की दुर्बलताओं को स्पष्ट करने वाला एक दृष्टान्त भी है। इससे हमें पता चलता है कि आपकी श्री दूसरों को जलाती है, आपका यश दूसरों के लिए असहय होता है और आपकी कहीं हो रही प्रशंसा दूसरों को कष्टप्रद होती है। आप लाख बार ‘युधिष्ठिर’ क्यों न हों पर आपकेलिए एक ‘दुर्योधन’ भी सौ कौरवों के साथ आपके विरूद्घ मोर्चा खोले खड़ा है। जो आपको जुए में हराएगा या आपके हराने की योजनाओं पर कार्य करता है। शकुनि आपकी किसी दुर्बलता को पकड़ेगा और आपको जुए में हराने के लिए अपनी चौपड़ सजा देगा। यह राजनीति का शाश्वत खेल है। यह चलता ही रहेगा। महाभारतकार ने बड़ी चतुराई और बौद्घिक कुशलता के साथ इस संवाद को हमारे भीतर उतारने का प्रयास किया है कि सावधान रहना, राजनीति के बाजार में सजी हुई चौपड़ें 18 अक्षौहिणी सेना का नाश करा सकती हैं।
हमने गलती यह की कि महाभारत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया इसलिए उसकी शिक्षाओं को भी एक उपन्यास का प्रसंग मानकर यूं ही रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। फलस्वरूप 1947 में जन्मे पाकिस्तान रूपी दुर्योधन और उसकेे मामाचीन रूपी शकुनि की चालों को हम समझ नहीं पाये। हमें उन्होंने कई बार ‘चौपड़ों’ के खेल में परास्त किया। तनिक याद करो 1972 का शिमला समझौता। जिसमें पाकिस्तान और चीन ने चौपड़ का ऐसा खेल खेला कि हमारी पीएम इंदिरा जी जैसी तेज तर्रार नेता भी उनकी शतरंजी चालों में फंस गयी और उन्होंने कश्मीर को लिये बिना ही पाकिस्तान के 93000 सैनिकों को मुक्त कर दिया।
पाकिस्तान अपने सैनिकों को मुक्त कराने के बाद भारत की ओर फिर गुर्राने लगा। राजनीति कहती है कि शत्रु को जाल में फंसने पर छोड़ो मत, और मानवता कहती है कि दया करो। जबकि नीति कहती है कि सोच समझकर निर्णय लो यदि चोटिल सांप को छोडऩे की मूर्खता की तो एक दिन तुम्हें डंसेगा अवश्य। हमने राजनीति और नीति की बात नहीं मानी। हमने मानवता की बात मानी और उसके पश्चात 1972 से 1985 तक 13 वर्ष का पंजाबी सिखों का आतंकवाद रूपी वनवास भोगा। इससे पता चलता है मानवता भावनात्मक होती है जो राजनीति में नीलाम कर दी जाती है। राष्ट्र के विषय में मानवता को सोच समझकर ही अपनाना चाहिए।
पाकिस्तान को भारत की श्री से घृणा है, जलन है। यश असहय है और भारत की प्रशंसा उसके लिए कष्टप्रद है। यह केवल सियासत का खेल माना जाए-यह भी मूर्खता है। बात को हल्का करके लेने और समझने की भूल है। वास्तव में पाकिस्तान का जनमानस भी भारत से घृणा करता है और उसका कारण यही है कि वे अपने देश के हिंदुओं को समाप्त कर चुके हैं तो उन्हें ‘हिन्दुस्तान’ अर्थात भारत भी पसंद क्यों आएगा? इसलिए पाकिस्तान की सियासत ही नही पूरी ‘रियासत’ ही भारत की शत्रु है। यही कारण है कि भारत के समूल नाश की योजनाएं विश्व में केवल पाकिस्तान में ही बनती हैं।
अब भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को बताया है कि इस समय भारत का ‘युधिष्ठिर’ तेरी चालों में नही आने वाला। श्रीमती स्वराज ने यूएन में अपने तेजस्वी भाषण से पाकिस्तान को इस विश्व मंच पर पूरी तरह नंगा करके रख दिया है। उन्होंने कहा है पाकिस्तान आतंकवाद की खेती करता रहा और भारत आई.टी. के क्षेत्र में आगे बढ़ता रहा। हमने आईआईटी, आईआई एम और एम्स जैसे संस्थान स्थापित किये जबकि पाकिस्तान अपने यौवन के हाथों मेंआतंक की बंदूक थमाता रहा। भारत की राजनीति का शुभ संकेत देखिये कि कांग्रेस ने भी श्रीमती स्वराज के भाषण की सराहना की है। इससे हमारी राजनीति का वह पक्ष स्पष्ट होता है जो हमें राष्ट्रीयता के बिंदु पर सबको एक करने का माद्दा रखता है। अब भारत की मजबूत स्थिति को देखकर पाकिस्तान के लिए कभी शकुनि तो कभी धृतराष्ट्र की भूमिका निभाने वाला चीन भी पाकिस्तान को समझाने लगा है कि भारत से अपने मुद्दे अपने आप सुलझाओ, मेरे भरोसे अधिक उछल कूद मचाने की आवश्यकता नहीं है।
भारत के सभी राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी सहमति की परम्परा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी के लिए यह बात विशेष रूप से कही जा सकती है कि वे सभी राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलने की अपनी ओर से पहल करते रहें सत्ता तो आती-जाती रहती है-पर देश सदा रहता है। आज कांग्रेस से सत्ता छीनी है तो कल को भाजपा से भी छिन सकती है। इसी प्रकार का आचरण कांग्रेस भी करे उसे भी याद रखना चाहिए कि सत्ता के लिए व्यग्रता बुरी चीज है। वह भी सत्ता संभालेगी-भविष्य सदा अनंत संभावनाओं से भरा है। वह संयमित और संतुलित विपक्ष की भूमिका निभाये जनता उसे पुन: अवसर देगी। इस सत्य को समझकर मोदी समर्थक और राहुल समर्थक सोशल मीडिया के विद्वान भी थोड़ा धैर्य का दान दें। सत्य को सहज रूप में प्रकट होने दें। अपनी बौद्घिक ऊर्जा को अनावश्यक उत्तेजना या व्यंग्य बाणों को चलाने में व्यय न करें। देश हम सबका है और इसे समाप्त करने के लिए शकुनि पूरी तैयारी कर रहा है-अच्छा हो कि ‘सोशल मीडिया’ के विद्वान ‘शकुनि’ को पकड़वाने में कानून की सहायता करें। शकुनि बाहर तो है ही भीतर भी छिपा बैठा है। अब चौपड़ नहीं सजनी चाहिए।

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