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राजनीति

मोदी जलवे की परीक्षा

हालिया सर्वेक्षण का निष्कर्ष यह है कि यदि आज चुनाव हो जाएं, तो भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में तो उभरेगी, लेकिन वह निर्धारित 360 सीटों का आंकड़ा नहीं छू पाएगी। वह 320 सीटों के आसपास सिमट जाएगी। सर्वेक्षण के निष्कर्ष एक चेतावनी मात्र हैं जिसका अर्थ है कि नारों के साथ-साथ काम के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता और 2019 में मोदी सरकार को उसके नारों की कसौटी पर नहीं, बल्कि ठोस उपलब्धियों की कसौटी पर परखा जाएगा। मोदी का जलवा अभी है, लेकिन यह ढलान पर हैज् 
समाचार-पत्र और टीवी चैनल अकसर जनता का मूड भांपने के लिए विभिन्न सर्वेक्षण करते रहते हैं। चुनावी सर्वेक्षण इन सबमें सर्वाधिक लोकप्रिय हैं और हर टीवी चैनल चुनावी सर्वेक्षण कराता है और उसका जोर-शोर से प्रचार करता है। इससे उनकी टीआरपी भी बढ़ती है। यह अलग बात है कि इन सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठते रहे हैं। इन सबसे अलग हटकर अब एक ऑनलाइन सर्वे सामने आया है, जिससे जनता के मूड का पता चलता है। चेन्नई में रह रहे मेरे मित्र भारतीय संस्कृति के सच्चे ध्वजवाहक हैं और वह बहुत कुछ अनूठा करते रहते हैं। उनकी ऑनलाइन पत्रिका (ई-जॉइन) ‘पीआर-ई-सेंस’ जनसंपर्क क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिका है। वह इंटरनेट आधारित ट्विटर, ब्लॉग, वेबसाइट आदि नवीनतम तकनीकों के प्रयोग में माहिर हैं और प्राइम प्वाइंट फाउंडेशन के माध्यम से भी कई अभिनव गतिविधियों का संचालन करते हैं। उनकी गहन दृष्टि, निष्पक्षता और विश्वसनीयता लाजवाब है। सन् 2009 में जब चौदहवीं लोकसभा समाप्ति पर थी, तो सारा देश संसद में सांसदों के असंयत-अभद्र व्यवहार के कारण उनकी आलोचना कर रहा था। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी इस पर क्षोभ और निराशा प्रकट की। लेकिन विपरीत लहरों के तैराक होने के कारण उन्होंने एक नई सोच को जन्म दिया और लोकसभा में चुपचाप बढिय़ा काम करने वाले सांसदों को सम्मानित करने का विचार बनाया। इस अभियान को उन्होंने ‘लोकतंत्र का उत्सव’ का नाम दिया। अच्छा काम करने वाले सांसदों के चुनाव के लिए उन्होंने पीआरएस इंडिया की वेबसाइट में उपलब्ध आंकड़ों का सहारा लिया। पीआरएस इंडिया देश में सांसदों के कामकाम के विश्लेषण की सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय संस्था है।
पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी इस पहल का स्वागत किया और सहर्ष अपना इंटरव्यू दिया। इस प्रकार से विशिष्ट काम करने वाले सांसदों के सम्मान की छोटी सी शुरुआत हुई, जिसे ‘संसद रत्न’ सम्मान का नाम दिया गया। अब बाकायदा एक पंजीकृत नाम है और इसका ‘लोगो’ ट्रेडमार्क के रूप में रजिस्टर्ड है। सर्वाधिक उपस्थिति दर्ज करवाने वाले, सर्वाधिक प्रश्न पूछने वाले, सर्वाधिक निजी बिल पेश करने वाले तथा वाद-विवाद में सबसे ज्यादा भागीदारी दर्ज करवाने वाले सांसदों को ‘संसद रत्न’ सम्मान से नवाजा जाता है। इन्हीं ने ऑनलाइन सर्वेक्षण द्वारा जनता का मूड भांपने का प्रयत्न किया है। इस सर्वेक्षण की खासियत इसकी निष्पक्षता है, क्योंकि यहां टीआरपी बढ़ाने का लालच साथ नहीं जुड़ा है। यह सर्वेक्षण देश भर में चला और हर आयु-वर्ग तथा आय-वर्ग के लोग इसमें शामिल थे। सर्वेक्षण का सार यह है कि मोदी के कई निर्णयों से असहमत होने के बावजूद लोग मोदी से नाराज नहीं हैं और एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर नजर नहीं आता है। नोटबंदी और जीएसटी को अच्छा कदम मानने वाले लोगों ने भी इसे लागू किए जाने के तरीके को गलत बताया। हमारे एनजीओ ‘बुलंदी’ ने भी नोटबंदी और जीएसटी को लेकर एक सीमित सर्वेक्षण किया। दोनों सर्वेक्षणों के नतीजे एक समान रहे और विश्लेषण से यह पता चलता है कि आम आदमी अभी भी यह मानता है कि नोटबंदी से देश में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगा है और आतंकवादियों के फंडिंग पर रोक लगी है। इसी तरह जीएसटी को लेकर भी आम आदमी यह मानता है कि इससे व्यापार में प्रचलन में काले धन पर रोक लगी है। यही कारण है कि व्यापारियों को हो रही सारी परेशानियों के बावजूद आम आदमी इसे सही कदम मानता है।
ऑनलाइन सर्वेक्षण के प्रतिभागियों का मानना था कि जीडीपी घटी है, रोजगार के अवसर घटे हैं, अर्थव्यवस्था में मजबूती की कमी है, छोटे और मझोले व्यापार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बिना पर्याप्त तैयारी के जीएसटी लागू करना और फिर गुजरात चुनावों के मद्देनजर जल्दबाजी में नियमों में परिवर्तन लोगों को रास नहीं आ रहा है। जिस प्रकार नोटबंदी के बाद बार-बार नियमों में परिवर्तन किए गए, उसी प्रकार जीएसटी के नियमों के हालिया परिवर्तन भी मोदी सरकार को हंसी का पात्र बना रहे हैं। जीसटी में कई उलझनें हैं, विशेषकर आयातकों और निर्यातकों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और सरकार ने इन मुश्किलों के समाधान के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है। इससे निर्यात पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। मोदी सरकार के खिलाफ लोगों की यह आम शिकायत है कि यह एक ‘स्लोगन सरकार’ बन कर रह गई है जो नए-नए नारे तो देती है, लेकिन अपनी घोषित योजनाओं के अमल को लेकर गंभीर नहीं है। ‘स्किल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्ट-अप इंडिया’, ‘स्मार्ट सिटी’ आदि घोषणाओं की जमीनी स्थिति से जनता में कोई उत्साह नहीं है। नकदी पर अंकुश ने छोटे और मझोले व्यवसायों को नुकसान पहुंचाया है। इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है, क्योंकि छोटे और मझोले व्यापार का अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान रहा है।
सरकारी घोषणाओं का हाल यह है कि खुद प्रधानमंत्री द्वारा घोषित मुद्रा ऋण योजना और स्टैंड-अप इंडिया ऋण योजना को बैंकों का सहयोग नहीं मिल रहा है। इसी तरह वित्त मंत्री ने सन् 2015 में विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए ऋण देने के लिए विद्यालक्ष्मी पोर्टल लांच किया था, लेकिन उस पर आगे क्या हुआ इसकी जानकारी शायद वित्त मंत्री को भी नहीं है। इस सबके बावजूद ज्यादातर लोगों का विश्वास अभी भी मोदी सरकार में बना हुआ है। लोग इसे अपेक्षाकृत मजबूत और काम करने वाली सरकार के साथ-साथ ऐसी सरकार मानते हैं, जिस पर घोटालों के वैसे आरोप नहीं हैं जैसे कांग्रेस पर हुआ करते थे।
उल्लेखनीय है कि ‘पीआर-ई-सेंस’ तथा ‘बुलंदी’ के सर्वेक्षण मध्य सितंबर में किए गए थे, तब तक अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी का विवाद सामने नहीं आया था। गुजरात मोदी का गृह राज्य है और यह पहली बार है कि गुजरात में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और वह गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी एक प्रखर वक्ता हैं। वे अपनी बात बड़े प्रभावी ढंग से रखते हैं। राहुल गांधी परिपक्वता की ओर बढ़ रहे हैं और उनके बयानों व भाषणों की चर्चा हो रही है तो भी अभी वे मोदी का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव अभी कुछ दूर हैं और तब तक स्थिति में कई गुणात्मक परिवर्तन आ सकते हैं लेकिन हालिया सर्वेक्षण का निष्कर्ष यह है कि यदि आज चुनाव हो जाएं, तो भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में तो उभरेगी, पर वह निर्धारित 360 सीटों का आंकड़ा नहीं छू पाएगी। वह 320 सीटों के आसपास सिमट जाएगी। सर्वेक्षण के निष्कर्ष एक चेतावनी मात्र हैं जिसका अर्थ है कि नारों के साथ-साथ काम के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता और 2019 में मोदी सरकार को उसके नारों की कसौटी पर नहीं, बल्कि ठोस उपलब्धियों की कसौटी पर परखा जाएगा। मोदी का जलवा अभी है, लेकिन यह ढलान पर है और इस स्थिति को बदलने के लिए मोदी को कुछ और यथार्थवादी होने की आवश्यकता है। देखना रुचिकर होगा कि मोदी इसके लिए क्या कदम उठाते हैं।

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