हिन्दू शक्ति के नायक के रूप में उभरे छत्रपति शिवाजी

शिवाजी नाम की महिमा
जब कभी भी भारतवर्ष के निष्पक्ष स्वातंत्र्य समर का इतिहास लिखा जाएगा तब भारत के महान सपूत छत्रपति शिवाजी महाराज को उस समर के महानायकों में अवश्य ही स्थान मिलेगा। छत्रपति शिवाजी भारत के इतिहास के उस महान नक्षत्र का नाम है, जिससे औरंगजेब सबसे अधिक भय खाता था। उसे रात में शिवाजी यदि सपने में भी दिखायी दे जाते थे तो वह अपने पलंग पर उछल पड़ता था।
लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ के पृष्ठ 15 पर लिखा है :-”हिंदुओं की अवन्नत दशा का इतिहास भी उनके धर्म, पवित्रता और शूरता का एक पर्याप्त प्रमाण है। इस बात में संदेह नही है कि इस जाति में समय-समय पर अनेक कायर, देशघातक, जातिद्रोही, अधर्मी, विश्वासघाती उत्पन्न हो गये हैं, जिन्होंने अनेक बार धर्म और जाति को शत्रुओं के हाथों बेच डाला, किंतु ऐसी दशा में ऐसी अधर्म आंधी के समय में, ऐसी विपत्तियों में भी यदि हमारी जाति मुसलमानी तलवार के नीचे हर प्रकार के शूरवीर उत्पन्न करती हुई अपने धर्म पर स्थिर रही है तो और क्या प्रमाण इसकी शूरवीरता का हो सकता है? क्या संसार में ऐसी उपमा किसी और जाति पर भी लागू हो सकती है? क्या कोई दूसरी जाति भी मुसलमानों के धार्मिक जोश वीरता तथा साहस की तलवार के सामने सिर ऊंचा कर सकी थी?”
हिंदुओं की दयनीय दशा
शिवाजी के जन्म के समय देश में हिंदुओं की दशा बड़ी दयनीय थी एक परिवार में एक ही छत के नीचे रहने वाले लोगों को भी पता नही होता था कि यदि किसी मुस्लिम शासक ने उनके गांव/शहर पर आक्रमण कर दिया और किन्हीं कारणोंवश यदि परिवार के दो सदस्य भी जीवित रह गये और उन्हें गुलाम बनाकर मुस्लिम आक्रांता ने कहीं बाहर भेजने का निर्णय ले लिया तो यह ज्ञात नही कि वे दोनों पुन: कभी मिल भी पावेंगे या नही।
माता-बहनों का सम्मान सुरक्षित नही था। इसलिए उन्होंने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए सतीप्रथा को स्थायी मान्यता ही प्रदान कर दी थी। साधारण हिंदू जजिया देने से आर्थिक रूप से दीवालिया हो चुका था। राजा लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए या तो संघर्षरत रहते या फिसलकर मुगल सत्ता की अधीनता स्वीकार कर लेते। जनता के दबाव से और कभी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंतर्मन की आवाज पर ये राजा लोग उठ खड़े होते और पुन: संघर्ष का मार्ग अपना लेते। इस प्रकार शिवाजी के जन्मकाल के समय हिंदुओं का सम्मान, संपत्ति और स्त्री जाति आदि कुछ भी सुरक्षित नही था।
शिवाजी की महानता
यह प्रकृति का नियम है कि गहन अंधकार के पश्चात ही प्रकाश आता है और यह भी सत्य है कि अंधकार के बाद ही प्रकाश आता हुआ अच्छा भी लगता है। अत: शिवाजी का आना तो उस काल में निश्चित ही था, पर वह अच्छे इसलिए लगते हैं कि वह भारत के पराभव के गहन अंधकार में उत्पन्न हुए और अपनी किशोरावस्था में आते-आते तो अपनी तेजस्वी नेतृत्व की आभा से समाज का मार्गदर्शन करने लगे-प्रकाश देने लगे, अन्यथा जिस देश में हजारों चक्रवर्ती सम्राटों ने दीर्घकाल तक संपूर्ण भूमंडल पर या उसके बड़े भाग (आर्यावत्र्त) पर शासन किया, जो देश उनके इतिहास को सुरक्षित नही रख पाया-उसे शिवाजी के इतिहास को यदि संचित करने की आवश्यकता पड़ी तो इसका कारण यही था कि भारत के वह चक्रवर्ती सम्राट साधारण परिस्थितियों की देन थे जबकि शिवाजी असाधारण परिस्थितियों की देन थे।
शिवाजी का राज्य निस्संदेह उन चक्रवर्ती सम्राटों के विशाल साम्राज्यों की अपेक्षा उतना ही छोटा था, जितना एक महानगर में एक छोटा सा मौहल्ला होता है, पर भारत में शिवाजी का सम्मान उनके पौरूष के प्रताप के कारण चक्रवर्ती सम्राटों से भी अधिक है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि शिवाजी महाराज ने अपने पुरूषार्थ और पराक्रम से, अपनी तलवार की नोंक से मिट्टी में से ताज उठाया और उसे हजारों तूफानों के रोकने के पश्चात भी अपने सिर पर रखकर दिखा दिया। उनके इस महान कार्य को रोकने के लिए न केवल उस समय की मुगल सत्ता ने हरसंभव प्रयास किये, अपितु उनके अपनों ने भी उन्हें हर प्रकार से नीचा दिखाने का प्रयास किया।
शिवाजी के इस दुस्साहस के लिए उस समय की क्रूर मुगल सत्ता भी शिवाजी की विरोधी हो गयी-पर उन पर कोई प्रभाव नही पड़ा। यह हमारे लिए प्रसन्नता और गौरव का विषय है कि शिवाजी महाराज इन सारी विषमताओं के बीच अकेले आगे बढ़ते गये और अनेकों हिंदू वीरों ने अपने महासम्राट को वामन से विराट बनाकर रख दिया।
माता जीजाबाई और शिवाजी का जन्म
1616 ई. में शिवनेरी दुर्ग में शाहजी भोंसले के परिवार में शिवाजी का जन्म हुआ था। शिवाजी का यह परिवार चित्तौड़ के महाराणा परिवार की ही एक शाखा थी। जिसका उल्लेख हम पूर्व में कर चुके हैं। शिवाजी को विपत्तियों से खेलने की शिक्षा माता जीजाबाई ने बचपन से ही देनी आरंभ कर दी थी। माता जीजाबाई भारत की महान वीरांगनाओं में से एक हैं। उनका साहस और बौद्घिक चातुर्य ही था, जिसने शिवाजी जैसे महाबुद्घिमान, नीतिनिपुण और महानायक का निर्माण किया। माता जीजाबाई इतनी निर्भीक थीं कि उन्हें उस समय की क्रूर मुगलसत्ता का भी कोई भय नही था, अपितु वह उस क्रूर मुगलसत्ता का सामना कराने के लिए अपने पुत्र को ही शिक्षा देने लगीं।
माता-पिता के मतभेद और शिवाजी
एक बार शिवाजी की माता जीजाबाई और पिता शाह जी भोंसले में परस्पर गंभीर मतभेद हो गये थे, तब माता जीजाबाई को अपना बच्चा शिवाजी मुगलों से इधर-उधर छिपाते रहना पड़ा था। ऐसी परिस्थितियों में 1636 ई. तक शिवाजी अपने पिता के दर्शन नही कर पाये थे। पर जब माता-पिता में पुन: संबंध मधुर हो गये तो पिता शाहजी भोंसले ने पुत्र शिवा को गाहस्थिक दायित्वों के बंधन में बांधने का निर्णय लिया।
शिवाजी की स्वाभिमानी जीवनशैली
कहा जाता है कि ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात।’ शिवाजी में देशभक्ति और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी थी, इसलिए शिवाजी बचपन से ही अपनी देशभक्ति और स्वाभिमानी जीवन शैली का परिचय देने लगे थे। एक बार बीजापुर दरबार में मुगल बादशाह गया हुआ था, जहां शिवाजी के पिता उच्च पद पर पदासीन थे। तब एक दिन मुरार पंत ने शिवाजी से दरबार में चलकर बादशाह को सलाम कराने के लिए तैयार करना चाहा। इस पर शिवाजी ने बादशाह के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट कह दिया था कि-”हम हिंदू हैं और बादशाह यवन है, और महायवन है और महानीच है, हम गौ और ब्राहमण के सेवक हैं, और वह उनका शत्रु है, हमारा और उसका मेल नही हो सकता। मैं ऐसे व्यक्ति से सलाम करना नही चाहता जो हमारे धर्म का शत्रु है।”
यह घटना लाला लाजपतराय ने अपनी उक्त पुस्तक में बड़े रोचक शब्दों में प्रस्तुत की है। शिवाजी ने यह भी कह दिया था कि-”मैं ऐसे व्यक्ति को कभी बादशाह नही मान सकता, और न कभी उसका अदब कर सकता हूं। सलाम तो एक ओर रहा मेरे मन में तो यह आता है कि उसका गला काट लूं।”
शिवाजी की इन बातों को सुनकर उनके माता-पिता ने भी उन्हें समझाया, परंतु शिवाजी पर उस समझाने का भी कोई प्रभाव नही पड़ा।
वास्तव में यह उनके मूल स्वाभिमानी स्वभाव का चिंतन था और मौलिक स्वभाव को कभी समझाने-बुझाने या मारने-पीटने से भी परिवर्तित नही किया जा सकता। शिवाजी को उनके पिता समझा-बुझाकर दरबार ले गये तो उसने वहां जाकर बादशाह को सलाम नही किया। इतना ही नही घर पर आकर स्नान किया और नवीन वस्त्र बदले।
शिवाजी और दादाजी कोंणदेव
शिवाजी के प्रारंभिक जीवन को प्रभावित करने वाले व्यक्तियों में दादाजी कोंणदेव का नाम प्रमुख है। उन पर शिवाजी पूर्ण विश्वास करते थे। दादाजी एक सुलझे हुए बुद्घिमान व्यक्ति थे, वह राज्य प्रबंधन में बहुत कुशल थे, यही कारण था कि उनसे ही शिवाजी ने राज्य प्रबंधन सहित कई गुणों की शिक्षा प्राप्त की थी।
दादाजी कोंणदेव स्वराज्य और स्वतंत्रता के विचारों के धनी थे, जिन्हें उन्होंने अपने शिष्य शिवाजी के भीतर डालने की पात्रता को पहचान लिया था। फलस्वरूप शिवाजी के स्वतंत्रता और स्वराज्य चिंतन को दादाजी कोंणदेव ने और भी अधिक प्रखरता प्रदान कर दी थी। दादाजी कोंणदेव के स्वराज्य और स्वतंत्रता संबंधी चिंतन से प्रेरित होकर शिवाजी अपना राज्य खड़ा करने की सोचने लगे।
नया भारत बनाने का संकल्प लिया
युवा शिवाजी एक नया भारत बनाने और बसाने का संकल्प ले रहे थे और उसके लिए चिंतन करने हेतु वह घंटों तक एकांत में या पहाड़ों के शांत स्थानों पर जाकर बैठ जाते। तब उनके मन में यह विचार आया कि तोरण नामक दुर्ग को किसी प्रकार प्राप्त किया जाए। उन्होंने अपने लक्ष्य की साधना के लिए तोरण दुर्ग के अध्यक्ष से अपना परिचय बढ़ाया। तोरण दुर्ग का अध्यक्ष शिवाजी से प्रभावित होता गया। उसने यह भली भांति समझ लिया कि शिवा कोई साधारण युवा नही है और उसका लक्ष्य महान है। इसलिए तोरण दुर्ग उसने यूं ही शिवाजी को सौंप दिया। इससे शिवाजी को अपनी लक्ष्य साधना का मार्ग मिल गया। यह घटना भी 1636 ई. की ही है। शिवाजी में बौद्घिक चातुर्य उत्कृष्ट कोटि का था। वह जानते थे कि तोरण दुर्ग को उसके द्वारा लेने से मुगल बादशाह निश्चय ही अप्रसन्न होगा। अत: उन्होंने बादशाह के पास संदेश पहुंचवाया कि इस किले को उन्होंने बादशाह की सेवा के लिए ही प्राप्त किया है। बादशाह को शिवाजी की बातों पर विश्वास हो गया। पर शिवाजी धीरे धीरे अपनी सेना बढ़ाने लगे। कहते हैं कि शिवाजी जब उस दुर्ग के खण्डहरों की खुदाई करा रहे थे तो खुदाई के समय एक पुराना कोष भी उन्हें मिल गया। जिससे उन्होंने एक और किला महोविदा की पहाड़ी पर तैयार कर लिया। इसी का नाम राजगढ़ रखा गया था।
शाहजी पुत्र से हो गये अप्रसन्न
मुगल बादशाह को चुनौती देने के संकल्प के साथ उठने वाले युवा शिवाजी की कार्यशैली को लेकर उनके पिता शाहजी भी अप्रसन्न हो गये। जिस कारण बीजापुर दरबार से शिवाजी के पिताश्री शाहजी ने भी दादाजी कोंणदेव के लिए पत्र लिखकर अपने पुत्र के कार्यों को लेकर अप्रसन्नता प्रकट की। इससे शिवाजी कुछ विचलित हुए, परंतु उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें सत्यपरामर्श देकर इस स्थिति से उबार लिया और शिवाजी अपनी स्वराज्य निर्माण योजना पर निरंतर कार्य करते रहे।
दादाजी कोंणदेव की मृत्यु और शिवाजी के बढ़ते कदम
उधर धर्मरक्षक शिवाजी के अभियान को दादाजी कोंणदेव भी प्रोत्साहित करते रहते थे। दादाजी ने तो अपनी मृत्यु से पूर्व भी शिवाजी को स्वतंत्रता की रक्षा करते रहने का अंतिम संदेश और उपदेश प्रदान किया था।
दादाजी की मृत्योपरांत शाहजी की जागीर का प्रबंध शिवाजी ने संभाल लिया और उसकी आय से अपनी सेना खड़ी करने लगे। जब पिता शाहजी भोंसले ने आय-व्यय का विवरण मांगा तो कह दिया कि इस निर्धन क्षेत्र में आय कहां से हो, यहां के निर्धन लोगों के लिए ही कुछ नही है। इसी समय शिवाजी को ‘गोन्दवाना’ का दुर्ग भी प्राप्त हो गया। इसका नाम शिवाजी ने ‘सिंहगढ़’ रखा था।
इसके पश्चात शिवाजी ने पुरंदर के दुर्ग को अपने बुद्घिकौशल से प्राप्त किया। वहां के मुस्लिम अधिकारियों ने बड़ी सहजता से शिवाजी की अधीनता स्वीकार कर ली। शिवाजी ने किले को अपने अधिकार में लेकर किले के पूर्व मृत मुस्लिम अधिकारी के तीन पुत्रों को बहुत सी जागीरें प्रदान कर उन्हें भी प्रसन्न कर लिया।
इस प्रकार शिवाजी का प्रारंभिक जीवन उनके शुभ नक्षत्रों की ओर स्पष्ट संकेत कर रहा था, उसे कोई चुनौती देने वाला नही था। शिवाजी के रूप में उभरते हुए एक नवयुवक को राजा बनने की ओर बढ़ता देखकर हर देशभक्त को प्रसन्नता होती थी और वे यही कामना करते थे कि किसी प्रकार शिवाजी एक बार राजा बन जायें तो उनके लिए स्वतंत्रता का मार्ग ही खुल जाएगा। बस, लोगों की इसी प्रकार की भावना से शिवाजी को बल मिलता चला गया। उनकी प्रशंसा में आनंद आदीस लिखते हैं :-”संसार के गुण संपन्न अनेकानेक महापुरूषों की शिवाजी से तुलना हो सकती है। सेना संचालन की दृष्टि से सिकंदर सीजर हानि बाल और नेपोलियन की दारूण निराशा की घडिय़ों में जनता का मनोधैर्य टिकाये रखने की क्षमता की दृष्टि से लिंकन और चर्चिल से प्रखर राष्ट्रभाव को जागृत और संगठित करने में मेजिनी, वाशिंगटन तथा बिस्मार्क से राष्ट्र निर्माण कार्य में आत्म विसर्जन की दृष्टि से कमालपाशा और लेनिन से आसक्ति रहित शासन करने में माक्र्स ऑरेलियस तथा चाल्र्स पंचम से।
किंतुगुण समुच्चय की दृष्टि से शिवाजी की तुलना किससे करें? कल्याण के सूबेदार की लावण्यमयी पुत्रवधू को मातृवत सम्मानित करने वाले छत्रपति से चरित्र की तुलना हम अन्य किस सत्ताधीश से करें।”
शिवाजी की महानता अतुलनीय है
विश्व इतिहास में ऐसे कितने सत्ताधीश मिलेंगे जिन्होंने मिट्टी में से खोजकर अपना साम्राज्य खड़ा किया और साम्राज्य को भी पूर्णत: न्याय पर आधारित रखा। साम्राज्य सामान्यतया सत्ताधीशों की हठधर्मिता से या साम्राज्य को बनाये रखने की उनकी भावना के कारण तानाशाही में परिवर्तित हो जाया करते हैं, परंतु शिवाजी का राज्य कभी भी तानाशाही की प्रवृत्ति के लिए नही जाना गया। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि शिवाजी के साथ उनकी प्रजा के लोकमत का बहुमत था। जिसे बहुमत न कहकर सर्वांश लोगों का समर्थन कहा जाए तो और भी अधिक उचित और उपयुक्त होगा। शिवाजी जनभावना का सम्मान करते थे और जनभावना शिवाजी के अनुकूल चलने में अपना गौरव समझती थी, यह अदभुत संयोग विश्व इतिहास में नव साम्राज्यों के कितने निर्माता शासकों के साथ जुड़ा है? यह बात बहुत ही विचारणीय है।
मुस्लिम प्रजा भी शिवाजी के साथ थी
शिवाजी के स्वराज्य चिंतन को उनकी मुस्लिम प्रजा ने भी पसंद किया था। उनके राज्य में मुस्लिमों की चाहे जितनी संख्या रही पर कभी शिवाजी के विरूद्घ उन लोगों ने मुखर विरोध करके विद्रोह का झण्डा नही उठाया। क्योंकि उन्होंने शिवाजी के वास्तविक पंथनिरपेक्ष शासन में रहकर उन्हें जिस स्वतंत्रता की अनुभूति हुई थी, उससे उन्हें ज्ञात हो गया था कि वास्तविक स्वतंत्रता किसे कहते हैं? इसके साथ-साथ हिंदू लोग जिस स्वतंत्रता के लिए सदियों से संघर्ष कर रहे थे उसे शिवाजी के शासन में प्राप्त करके उसके पुजारी वह मन से हो गये थे।
शिवाजी ने जब कल्याण के अध्यक्ष मुल्ला अहमद का कोष लूटा था तो उस समय तक उनके आधीन कंगोरी, टोगरकोन, भोरप, कादरी लोहगढ़ और राम मोची के दुर्ग भी आ चुके थे। कल्याण के अध्यक्ष को शिवाजी के बालसखा सोमदेव ने कैद किया था। जिससे शिवाजी ने अति प्रसन्न होकर उसे बहुत सा धन देकर पुरस्कृत किया था। सोमदेव को शिवाजी ने एक जागीर भी प्रदान की। जिसका प्रबंधन वह बड़ी कुशलता से करने लगा। शिवाजी ने मुल्ला अहमद को सोमदेव की कैद से मुक्त करा दिया।
पिता शाहजी की गिरफ्तारी और शिवाजी
मुल्ला अहमद ने आदिलशाह के दरबार में जब शिवाजी की वीरता का वृतांत सुनाया तो वहां मुस्लिम दरबारियों ने निर्णय लिया कि शाहजी भोंसले की सहमति से ही शिवाजी यह दुस्साहस करता जा रहा है। शाहजी उस समय राजस्थानी से दूर था। बाजी घारपुरे ने उन्हें अपने घर बुलाकर छल से कैद करा दिया। बादशाह के कहने पर शाहजी ने शिवाजी के लिए कई पत्र लिखे और उसे समझाया कि वह बादशाह के विरूद्घ कोई कार्य न करे, परंतु शिवाजी पर उन पत्रों का कोई प्रभाव नही पड़ा।
शाहजी ने बादशाह से भी बहुत बार अनुनय-विनय की कि उसका शिवाजी के कार्यों से कोई संबंध नही है, पर बादशाह ने उसकी बातों पर ध्यान न देकर उसे अंधेरे गड्ढ़े में कैद कर दिया गया, जिसमें एक सूराख छोडक़र दरवाजे बंद कर दिये गये। शाहजी से यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि यदि उसके पुत्र की बादशाह के विरूद्घ विद्रोहात्मक गतिविधियां इसी प्रकार जारी रहीं तो शाहजी को इसी गड्ढे में जीवित ही मर जाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
पिता को छुड़ाया कैद से
पिता को मिलने वाली इस प्रकार की यातनाओं के समाचार ने शिवाजी को हिलाकर रख दिया। उन्हें असीम कष्ट होता था। जिसके लिए उन्होंने बादशाह शाहजहां से पत्र व्यवहार करना आरंभ किया और उसे समझा-बुझाकर शाहजी के अपराध क्षमा करा लिये। शाहजहां ने शिवाजी को पांच हजारी मनसब बनाना भी स्वीकार कर लिया। शाहजी कैद से छूट गये। इसके पश्चात शाहजी चार वर्ष मुगलों के दरबार में रहे। इस काल में शिवाजी पिताजी के सम्मान की सुरक्षा के दृष्टिकोण से लगभग शांत रहे, और उन्होंने कोई ऐसी कार्यवाही नही की, जिसका उनके पिता के जीवन और स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था। बीजापुर का बादशाह भी शिवाजी के प्रति कोई ठोस कार्यवाही करने से बचता रहा। उसे भय था कि यदि उसने शिवाजी के विरूद्घ कोई कड़ी कार्यवाही की तो कहीं ऐसा ना हो कि वह जीते हुए राज्य को दिल्ली के बादशाह को न सौंप दे।
बीजापुर के बादशाह को भी दी चुनौती
आदिलशाह (बीजापुर का सुल्तान) का 5 जनवरी 1657 का एक आदेश है-”अब दरबार को पूरी तरह पता चला है कि शिवा बगावत कर रहा है। वह हमारी मातहती नही मानता। इसलिए उसे नियंत्रण में रखने के लिए मुहम्मद खां को कर्नाटक का सूबेदार बनाकर भेजा जाता है।”
ऐसी परिस्थितियों में शिवाजी दिल्ली के बादशाह के लिए तथा बीजापुर के बादशाह (सुल्तान) दोनों के लिए एक समस्या बनते दिख रहे थे। दिल्ली की मुगल सत्ता चाहे शिवाजी को प्रसन्न रखने के लिए ऊपरी आधार पर जो नीति अपना रही थी, पर उसे भीतर ही भीतर शिवाजी की भविष्य की योजना का भी पूरा ध्यान था। चारों ओर जब हिंदू स्वतंत्रता संघर्ष चल रहा हो, तब दक्षिण में नेतृत्वविहीन हिंदू समाज कहीं शिवाजी को अपना नेता मानकर मुगल सत्ता को चुनौती न देने लग जाए, इस बात से मुगल सत्ता और मुगल दरबार की चिंताएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती थीं। अपनी चिंताओं के निवारण के लिए मुगल सत्ता के सामने एक ही विकल्प था कि दक्षिण में उभरते हिंदू नेता शिवाजी को किसी भी प्रकार से कैद कर लिया जाए। मुगल शासक यह भली-भांति जानते थे कि शाहजी के कैद करने से केवल शिवाजी को तात्कालिक आधार पर शांत किया जा सका है और समस्या का कोई स्थायी समाधान नही मिल पाया है। स्थायी समाधान तभी मिल सकता है, जब शिवाजी किसी प्रकार उनकी कैद में आ जाए।
फलस्वरूप शिवाजी को कैद करने के लिए गुप्त षडय़ंत्र रचे जाने लगे। बीजापुर का सुल्तान भी शिवाजी से ऊपरी आधार पर तो मित्रता का ढोंग कर रहा था, पर भीतर ही भीतर वह भी शिवाजी के प्रति वैसे ही भाव रखता था जैसे कि दिल्ली की मुगल सत्ता रखती थी।
अपनों ने किया छल
जब शिवाजी अपनी आभा को बिखेरते हुए भारत के राजनीतिक गगनमंडल पर अपना स्थान बना रहे थे और अपनी दिव्य आभा से भारत के संपूर्ण हिंदू समाज का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होते जा रहे थे, तब भारत के इस धर्मरक्षक महानायक को मुगलों की जेल में डलवाने के लिए अपने मध्य से भी कुछ धर्मभक्षक निकलकर सामने आये। इन धर्मभक्षक छलियों में बाजी शामराजी नामक व्यक्ति प्रमुख था जिसे शिवाजी ने उसकी गुप्त योजना की भनक लगते ही आक्रमण कर जंगलों में खदेड़ दिया था, इस व्यक्ति को जावली के राजा चंद्रराव ने अपने राज्य से होकर जाने दिया। कहने का अभिप्राय है कि कहीं न कहीं चंद्रराव भी शिवाजी से घृणा करता था। शिवाजी राजा चंद्रराव से मित्रता बनाकर रखना चाहते थे। क्योंकि वह एक हिंदू राजा था और शिवाजी जानते थे कि हिंदू शक्ति को पारस्परिक मतभेदों के आधार पर यदि बिखेरने का प्रयास किया गया तो यह हिंदू हित में नही होगा। अत: शिवाजी हिंदू शक्ति का धु्रवीकरण कर देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को प्रबल करना चाहते थे। फलत: उन्होंने राजा को हिंदू शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए समझाने का कई बार प्रयास किया, पर राजा की धमनियों में प्रवाहित होने वाले रक्त में तनिक भी गरमी नही आयी। वह शिवाजी को पकडक़र मुगलों को सौंपने वाले लोगों को सहायता देने की ‘जयचंदी परंपरा’ पर उतर आया। शिवाजी को राजा की मानसिकता पर अत्यंत दुख हुआ पर वह तात्कालिक आधार पर मौन रहने का नाटक करते रहे।
(लेखक की पुस्तक प्राप्ति हेतु डायमण्ड पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटेड एक्स-30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस-द्वितीय नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100 पर संपर्क किया जा सकता है।
-साहित्य संपादक)

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