मोहन भागवत का बयान और भारत में जातिवाद

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शुद्र को लेकर हमारे देश में अक्सर चर्चा होती रहती है और उनकी दयनीय स्थिति के लिए मनु महाराज को दोषी बताया जाता रहता है। मनु को जातिवाद का जनक भी कहा जाता है। जबकि सच यह नहीं है मनु वर्ण व्यवस्था के समर्थक है। यह वर्ण व्यवस्था पूरे संसार में आज भी ज्यों की त्यों लागू है। वास्तव में वर्ण व्यवस्था बौद्धिक स्तर के आधार पर अपने आप बन जाती है। जो व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर उच्चतम स्थिति को प्राप्त होता है वह अपने आप ही ब्राह्मण हो जाता है। चाहे वह किसी भी जाति समाज या देश में पैदा क्यों न हुआ हो? इसी प्रकार जो व्यक्ति बाहुबल में श्रेष्ठ होता है वह क्षत्रिय और जो समाज की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में अपना योगदान दे सकने में सक्षम होता है वह वैश्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इन तीनों के योग्य नहीं होता वह सेवा भाव को अपना कर अपना जीवन यापन करता है। उसी को शूद्र कहते हैं। यह शूद्र वह व्यक्ति होता है जो पढ़ने लिखने के सारे अवसर उपलब्ध होते हुए भी बौद्धिक विकास नहीं कर पाता या बौद्धिक क्षेत्र में अपनी विशेष उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाता। मनु महाराज का चिंतन केवल यहीं तक है कि जो व्यक्ति अपने आप ही पढ़ने लिखने और उन्नति के अवसरों में पीछे रह जाता है वह शूद्र होता है । ध्यान रहे कि ऐसा व्यक्ति किसी दयनीय अवस्था में धकेला नहीं जाता बल्कि उसकी बुद्धि सुनीता उसे अपने आप पीछे कर देती है। इसका कारण यह है कि सबकी प्रतिभा और सबकी बौद्धिक क्षमताऐं एक जैसी नहीं होती। जब व्यक्ति को जानबूझकर पीछे धकेला जाता है या उसके आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति के सभी अवसर छीने जाते हैं या उन पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो ऐसी स्थिति में जो लोग किसी भी क्षेत्र में पीछे रह जाते हैं वे अन्याय का शिकार हुए कहे जाते हैं।
उन्हें सुधर नहीं कह सकते।
भारतवर्ष में सचमुच एक ऐसा दौर आया जब कुछ लोगों ने एक वर्ग को पीछे धकेलने का कार्य किया और अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए समाज के ऐसे वर्ग पर अत्याचार किए। महर्षि दयानंद जी महाराज ने ऐसे वर्ग की आलोचना की जो दूसरों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उनके अधिकारों को छीनता है। उन्होंने कहने का अभिप्राय है कि महर्षि दयानंद जी महाराज ने ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले लोगों के जाति अभिमान पर सबसे पहले प्रहार किया और उन्हें इस बात के लिए दोषी बताया कि तुम समाज में ऊंच नीच फैला रहे हो। जबकि समाज की प्रत्येक प्रकार की विषमता को समाप्त करना तुम्हारा धर्म था। वास्तव में स्वामी जी ने ब्राह्मण समाज को उसका श्रेष्ठ कर्तव्य याद दिलाया, जब उन्होंने यह कहा कि तुम समाज में प्रत्येक प्रकार की विषमता को समाप्त करने के लिए संसार में आए हो, इसलिए उसी काम को करो ।उसके विपरीत आचरण करके धर्म भ्रष्ट मत बनो। जब देश के प्रधानमंत्री स्वामी दयानंद जी महाराज जी की 200 वीं जयंती के अवसर पर उनके लिए होने वाले कार्यक्रमों का शुभारंभ कर रहे हैं, तब आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने भी महर्षि दयानंद जी महाराज के इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए ब्राह्मण समाज को केवल उनका श्रेष्ठ कर्तव्य कर्म अर्थात धर्म ही याद दिलाने का काम किया है। इसके पीछे उनके शुद्ध मनोभाव को देखने की आवश्यकता है। उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि भारतवर्ष में जाति व्यवस्था ऊंचे नीचे स्वच्छता का लाभ उठाकर दूसरे माता बलंबिया ने हिंदू को कमजोर किया है। हिंदू की समाज की इन कमजोरियों को पैदा करने में जिन लोगों ने किसी भी दृष्टिकोण से सहयोग दिया है उन्हें अब समय रहते अपनी कमियों को स्वीकार कर हिंदू समाज के हरिजन समाज को अपने साथ लगाना चाहिए, नहीं तो ईसाइयत और इस्लाम उन पर नजर लगाए बैठी है। यदि हिंदू समाज नहीं चेता तो इस्लाम और ईसाई समाज के लोग हिंदू समाज को कमजोर करने के लिए इन लोगों को अपने साथ मिला लेंगे।
हिंदू समाज को अपने कमजोरियों को स्वीकार करना चाहिए और मोहन भागवत के बयान को सही संदर्भ में लेना चाहिए। अपने संख्या बल के आधार पर ही हिंदू समाज देश में मजबूती से शासन कर सकता है और अपनी धार्मिक , सामाजिक परंपराओं को बनाए रख सकता है, अन्यथा सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
जो लोग यह मान रहे हैं कि मुसलमानों के भीतर जाति प्रथा नहीं होती, इसलिए मुसलमानों में समानता देखी जाती है और हमको इसीलिए मुस्लिम मत को स्वीकार कर लेना चाहिए तो उनको भी यह याद रखना चाहिए कि मुसलमानों में भी जाति प्रथा है । यद्यपि हमारे भीतर कुछ ऐसा भाव बैठाया गया है जैसे जाति प्रथा केवल हिन्दू समाज में है और इस जाति प्रथा को भी ब्राह्मणों ने अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बनाया है।
इस्लाम की फिरकापरस्ती ही इस मजहब के पतन का कारण बनेगी । इस विषय में स्वयं मुहम्मद साहब ने ही भविष्यवाणी की थी .-
“अबू हुरैरा ने कहा कि,रसूल ने कहा था कि यहूदी और ईसाई तो 72 फिरकों में बँट जायेंगे ,लेकिन मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जाएगी ,और सब आपस में युद्ध करेंगे “( अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4579)
  इस सम्बन्ध में बाबासाहेब ने भी अपने इस सम्बन्ध में बाबासाहेब ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा — ” इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब यह कानून समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैगम्बर ने कहा है कि गुलामों के साथ इस्लाम में ऐसा कुछ भी उचित नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन के समर्थन में हो। जैसा कि सर डब्ल्यू. म्यूर ने स्पष्ट कहा है-
”….गुलाम या दासप्रथा समाप्त हो जाने में मुसलमानों का कोई हाथ नहीं है, क्योंकि जब इस प्रथा के बंधन ढीले करने का अवसर था, तब मुसलमानों ने उसको मजबूती से पकड़ लिया….. किसी मुसलमान पर यह दायित्व नहीं है कि वह अपने गुलामों को मुक्त कर दे…..”
”परन्तु गुलामी भले विदा हो गई हो, जाति तो मुसलमानों में क़ायम है। उदाहरण के लिए बंगाल के मुसलमानों की स्थिति को लिया जा सकता है। 1901 के लिए बंगाल प्रान्त के जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किए हैं :–
”मुसलमानों का चार वर्गों- शेख, सैयद, मुग़ल और पठान-में परम्परागत विभाजन इस प्रान्त (बंगाल) में प्रायः लागू नहीं है। मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं- 1. अशरफ अथवा शरु और 2. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है ‘कुलीन’, और इसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊँची जाति के अधर्मांतरित हिन्दू शामिल हैं। शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन ( हिंदू समाज में नीची जातियों को ‘कमीन’ कहने की परंपरा मुसलमानों की इसी सोच की देन है ) या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, ‘बेकार’ कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग ‘अरज़ल’ भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।”
इस्लाम के भाईचारे से लालायित होकर उस ओर भागने वाले लोगों को इस्लाम के सच पर भी विचार करना चाहिए।

  • डॉ राकेश कुमार आर्य
    ( लेखक ‘भारत को समझो’ अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता और जाने-माने लेखक एवं इतिहासकार हैं)

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