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मुद्दा समाज

अंधेरा होते ही महिला स्वतंत्रता की बातें हो जाती हैं छू-मंतर

बाल मुकुन्द ओझा
भारत में 1975 से हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर महिलाओं के अधिकार, उनके सम्मान और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी की चर्चा होती है, महिलाओं को प्रोत्साहन देने की बात होती है। यह दिन महिलाओं को उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक तरक्की दिलाने व उन महिलाओं को याद करने का दिन है। महिला दिवस की शुरूआत महिलाओं को वोट देने के अधिकार के लिए हुई थी क्योंकि बहुत सारे देश ऐसे थे जहां महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं है। प्रतिवर्ष 8 मार्च को आयोजित यह दिवस मनाया जाता है। इस दिन हम महिला सुरक्षा, समानता, जागरूकता और सशक्तिकरण की जोर-शोर से चर्चा करते हैं और समारोह का आयोजन कर उन्हें सम्मानित करते हैं। देश और दुनिया को बताते हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में हमने महिला प्रगति और विकास का डंका बजाया है।
भारत में नारी पूजने का भी गर्व के साथ स्मरण करते हैं। मगर आज के दिन हमें इस दिखावे और वास्तविकता को समझना होगा। महिला दिवस पर आधी आबादी की वास्तविकता और धरातलीय चुनौतियों को समझने की जरूरत है। मु_ी भर महिलाओं के आगे बढऩे से सम्पूर्ण महिला समाज का उत्थान नहीं होगा। महिला समानता और सुरक्षा आज सबसे अहम मुद्दा है, जिसे किसी भी हालत में नकारा नहीं जा सकता। सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। ऐसे में जरूरी है कि हम नारी समानता और सुरक्षा की बात पर गहराई से मंथन करें। आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने के लायक है। आये दिन समाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है, स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को दोयम दर्जे की मार से जूझना पड़ रहा है। यूनीसेफ की रिपोर्ट यह बाताती है कि महिलाएं नागरिक प्रशासन में भागीदारी निभाने में सक्षम हैं। यही नहीं, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के बगैर किसी भी क्षेत्र में काम ठीक से और पूर्णता के साथ संपादित नहीं हो सकता। आजादी से पूर्व हमारा देश अनेक रूढिय़ों से ग्रसित था। बेटी को कोख में मारने, सती प्रथा जैसी कुप्रथा समाज में प्रचलित थी। नारी को पढ़ाना तक पाप समझा जाता था। नारी घूंघट में रहे, ऐसा हमारा सोचना और विचारना था। अंग्रेजों के आने के बाद हालांकि नारी स्वतंत्रता और समानता की बातें सुनने और पढऩे को मिलीं। धीरे-धीरे समाज और वातावरण में आये बदलाव ने महिला स्वतंत्रता को समझा और उनके अधिकारों और कत्र्तव्यों की बातें होने लगी। नारी को चूल्हे-चौकी से बाहर लाया गया। इस दौरान शिक्षा के विस्तार ने क्रांतिकारी बदलाव का मार्ग अख्तियार किया और शिक्षा रूपी ज्ञान की रोशनी से हमारा समाज जगमगाया। हमने महिला शिक्षा की अहमियत समझी और उन तक शिक्षा की ज्योति को पहुंचाया।
 इस दौरान प्रगति और विकास का नया दौर प्रारम्भ हुआ। हमने महिलाओं के आरक्षण की दिशा में कदम उठाये। केन्द्र और राज्य स्तर पर चुनावों में महिलाओं की सीटों का आरक्षण कर उन्हें आगे बढऩे का अवसर दिया। फलस्वरूप पंच, सरपंच, प्रधान और जिला प्रमुख तक महिलाएँ काबिज हुईं और ग्राम के विकास की बात आगे बढ़ी। यह भी कहा जाने लगा कि महिला राज में भ्रष्टाचार कम हुआ है। यह सत्य भी है कि जहाँ महिलायें विभिन्न पदों पर काबिज हुई। वहाँ अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं में कमी देखने को मिली। एक स्वयंसेवी संस्था की रिपोर्ट में जाहिर किया गया है कि महिला की दुश्मन महिला ही है। वह भूल जाती है कि वह भी महिला है। इसलिए सबसे पहले महिला ही अपनी सोच को बदले और अपनी संतान को आगे बढ़ाने का साहसी कदम उठाये। महिला विकास और महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ी बाधा भ्रूण हत्या है। भ्रूण हत्या हमारे पुरजोर प्रयासों के बावजूद पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। लड़कियों को शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में हमारे सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बाधाएँ सामने आती हैं। हम लडक़ों को आगे बढ़ाने में अपनी रूचि लेते हैं और लड़कियों को पीछे रखने में अपनी भलाई समझते हैं।
हमें अपनी इसी सोच को बदलना होगा। कहते हैं कि एक लडक़ी शिक्षित हुई तो पूरा परिवार शिक्षा की रौशनी से जगमगाने लगेगा। हम चाहते हैं कि लड़कियों को समान अधिकार मिले और देश खुशहाली की ओर कदम बढ़ाये तो हमें अपनी पुरानी सोच को बदलना होगा और लड़कियों को पर्दे के पीछे से बाहर लाकर संसार की प्रगति और विकास की सोच की ओर आगे बढ़ाना होगा। हमें इस बात पर गहनता से विचार करना होगा कि आज हमारा देश दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले पिछड़ा हुआ क्यों है? इसका एक बड़ा कारण यह है कि हम अपने बच्चों को समान रूप से आगे नहीं बढ़ाते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारा परिवार, समाज और देश प्रगति और विकास की दिशा में अनवरत आगे बढ़े तो हमें लडक़े और लडक़ी का भेद मिटाना होगा। संतुलित समाज के लिए पुरूष एवं महिला की समानता आवश्यक है। देश और समाज में बेटी-बेटे का भेदभाव समाज करने की यह शुरूआत हमें अपने घर से करनी होगी। बेटे-बेटी की समानता का संदेश जन जागरण के साथ घर-घर पहुंचाना होगा। इसी में हमारी, समाज की और देश की भलाई निहित है।

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