क्या गोवंशीय पशुओं के वध पर पूर्ण प्रतिबंध उचित है

भारत के संविधान निर्माताओं ने सवर्ण हिंदुओं की खातिर संविधान में एक अनुच्छेद (अनुच्छेद 48 डाला) जो कि भाग 14 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का हिस्सा है। सन् 1950 में भारतीय समाज मुख्यत: कृषि आधारित था। इसके अनुरूप यह अनुच्छेद ”कृषि और पशुपालन के संगठन”के संबंध में है। यह कहता है कि ”राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण व सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिशोध करने के लिए कदम उठायेगा”। इस अनुच्छेद में परस्पर विरोधाभास हैं। स्पष्टत: जब तक घटिया नस्ल के मवेशियों की संख्या कम नहीं की जायेगी और अच्छी नस्ल के मवेशियों की संख्या बढ़ाई नहीं जायेगी तब तक ”आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से नस्लों का सुधार संभव नहीं है। पालतू मवेशियों के मामले में हम नस्ल में सुधार के लिए प्राकृतिक चयन पर निर्भर नहीं रह सकते और न ही प्राकृतिक चयन के लिए भारत में पर्याप्त संख्या में शिकारी पशु उपलब्ध हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्वों में ”संविधान (42 वां संशोधन) अधिनियम 1976 के जरिये अनु. 48ए जोड़ा गया जो कि ”पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के संबंध में है। यह अनु. कहता है कि ”राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा”। जैसा कि नीचे दिये गये तथ्यों से स्पष्ट होगा, विभिन्न नस्लों के आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड, जो कि अनु. 48 के परिपालन का स्वाभाविक नतीजा हैं, भारत के ग्रामीण, शहरी व वन्य पर्यावरण के लिए खतरा हैं। इस खतरे के मूल में है अनु. 48 और अनु. 48ए में परस्पर विरोधाभास।  
गोवध पर देश के कई राज्यों में प्रतिबंध है परंतु महाराष्ट्र पशु संवर्धन (संशोधन) विधेयक 1995, जिसे मार्च 2015 में लागू किया गया व हरियाणा गौवंश संरक्षण व गौसंवर्धन विधेयक 2015 जिनमें गौवध के लिए दस हजार रूपये से लेकर एक लाख रूपये तक के जुर्माने और तीन साल से लेकर दस साल तक की कैद की सजा का प्रावधान है, न केवल अत्यंत कठोर है। महाराष्ट्र और हरियाणा की भाजपा सरकारों ने अनु. 48 को तोड़-मरोडक़र उसकी मनमानी व्याख्या की है और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राईटस द्वारा जारी एक वक्तव्य के अनुसार ये सरकारें बहुसंख्यकवादी एजेंडा लागू कर रही हैं। यह शायद अखिल भारतीय स्तर पर गौवध व बीफ पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रही हैं। जिसकी मांग हिंदुत्ववादी सिद्धांतकार व नेता करते आये हैं। महाराष्ट्र का अधिनियम, गाय की परिभाषा में सांडों और बैलों को भी शामिल करता है।
गौवध पर प्रतिबंध से अंतत: भारत के मवेशियों का ही नुकसान होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय मवेशी, मुख्यत: कृषि कर्म से जुड़े हैं। इस देश के अधिकांश मवेशियों को किसान ही पालते हैं। भारतीय कृषक सदियों से जानवरों का इस्तेमाल खेती में करते आये हैं और उन्होंने मवेशियों की नस्लों में शनै: शनै: सुधार किया है, जिसके नतीजे में आज देश में गायों और और बैलों की कई बहुत अच्छी नस्लें उपलब्ध हैं। किसान जानते हैं कि जब गाय, बैल और सांड बूढ़े हो जाते हैं तो वे गैर-कृषक समुदायों के लिए भोजन, चमड़े आदि का स्त्रोत बनते हैं। भारतीय किसान के पास नकदी की हमेशा कमी बनी रहती है और अनुत्पादक या अतिशेष मवेशियों को कसाइयों या मवेशियों का व्यापार करने वालों को बेचकर, उसे नकद धन प्राप्त होता है। अनुपयोगी जानवर खत्म करने से चारागाहों और मंहगे चारे का इस्तेमाल उपयोगी, ताकतवर और दुधारू जानवरों के लिए किया जा सकता है। अगर गौवंश वध पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया जायेगा तो देश के किसानों की इस पूरक आय पर सीधा असर पड़ेगा, देश के कुल मवेशियों में अनुपयोगी जानवरों का प्रतिशत बढ़ जायेगा और चारा महंगा हो जायेगा। इस तरह के कानून अतार्किक हैं और देश की आर्थिक प्रगति को बाधित करते हैं। जितने आवारा पशु भारत में हैं उतने दुनिया के किसी दूसरे देश में नहीं हैं। गौवंश निषेध कानूनों से आवारा जानवरों की संख्या में और वृद्धि होगी, जिससे खेती को नुकसान होगा। सरकार पहले ही बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की योजना बना चुकी है। इन दोनों कारकों के चलते देश में खेती योग्य जमीन में भारी कमी आने की आशंका है। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड खेती के लिए बड़ा खतरा बन गये हैं। जिस देश में वन क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा हो वहां आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड यदि जंगलों में निर्भय होकर घूमेंगे और चरेंगे तो यह पर्यावरण व स्वास्थ्य की दृष्टि से आत्मघाती होगा। यदि इन आवारा पशुओं को किसी स्थान पर रखना चाहें तो यह बहुत खर्चीला और मुश्किल काम होगा। जिस देश में लाखों गरीब और सामाजिक दृष्टि से वंचित लोग, ऐसी मूलभूत सुविधाओं के बगैर जीने को बाध्य हैं जिनके बिना आधुनिक जीवन की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती,वहां आवारा और अनुपयोगी पशुओं पर देश के सीमित संसाधन बर्बाद करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अनुत्पादक जानवर, जानवर मांस और चमड़े आदि का स्त्रोत होते हैं। गोवध संबंधी नये कानूनों के बाद मरे हुए जानवरों को ठिकाने लगाने का कार्य एक समस्या बन जायेगा। अधिकांश राज्यों में म्यूनिसिपल सेवाएं गांवों व अर्धशहरी क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं होतीं परंतु मवेशी वहां भी मरते हैं। इन कानूनों के कारण, मृत पशु की खाल उतारना एक खतरनाक पेशा बन जायेगा। क्योंकि जो लोग या समुदाय मृत गोवंशीय पशु की खाल उतारेंगे, उनपर यह आरोप आसानी से लगाया जा सकेगा कि उनके पास बीफ पाया गया होगा और यह कानून की दृष्टि में अपराध होगा। हो सकता है कि कुछ समय के लिए इन कानूनों से भाजपा और आरएसएस को लाभ हो सकता है किंतु गौमांस की इस नवउत्पादित राजनीति से उपजी हिंसा, अंतत: राज्य सरकारों के लिए सरदर्द बन जायेगी। वैसे भी हमारी राज्य सरकारें, कानून और व्यवस्था बनाये रखने के मामले में फिसड्डी ही साबित होती आई हैं। प्रतिबंध से बीफ का व्यापार चोरी-छुपे किया जाने लगेगा, ठीक उसी प्रकार जिस तरह शराबबंदी वाले राज्यों में शराब का व्यापार भूमिगत हो गया हैै। बीफ का एक बड़ा काला बाजार तैयार हो जायेगा जिसमें सरकारी तंत्र के पुर्जों की मिलीभगत होगी। आश्चर्य नहीं कि कुछ सालों बाद हमें शराब माफिया की तरह ”बीफ माफिया” के बारे में भी समाचार पढऩे को मिलने लगेंगे।
गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध के पैरोकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी सन् 2014 तक भारत, ब्राजील के बाद बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक था। भारत में चमड़े के जूते, जैकेट, बैग, पर्स आदि इतने महंगे हो जायेंगे कि भारतीय बाजार, चीन के सस्ते जहरीले प्लास्टिक से बने सामानों से पट जायेगा जो चमड़े जैसे दिखते हैं। अगर गौवंश के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जायेगा तो देश के किसानों की इस पूरक आय पर सीधा प्रभाव पड़ेगा, देश के कुल मवेशियों में अनुपयोगी जानवरों का प्रतिशत बढ़ जायेगा और चारा महंगा हो जायेगा। (यह लेख फारवर्ड प्रेस बुक की वेबसाइट से साभार लिया गया, इस लेख के लेखक अनिरूद्ध पांडेय हैं)

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