परोपकारिणी सभा, अजमेर के पाक्षिक मुखपत्र *परोपकारी* का सम्पादकीय- *महर्षि जन्मतिथि?*

images (15)

महर्षि जन्मतिथि?

उक्त शीर्षक से परोपकारिणी सभा के संरक्षक और सम्पादक डा. वेदपालजी ने अपनी सभा के पाक्षिक मुखपत्र परोपकारी के सितम्बर प्रथम और द्वितीय, २०२२ ई. के संयुक्तांक में अजमेर में आयोजित हुई संवाद गोष्ठी को हुए छः मास बीत जाने के बाद एक सम्पादकीय लेख लिखा है जिसको पढ़ने से पता चलता है कि उन्होंने मेरे द्वारा गत ३० मार्च को उन्हें सौंपे गए मेरे १४ फुलस्केप के पेपर पर टंकित वक्तव्य को न तो पढ़ा ही है और न समझा ही है।
अपने सम्पादकीय लेख में उन्होंने ऋषि की जन्मतिथि के रूप में उसी तिथि फाल्गुन कृष्ण १० संवत् १८८१ (चैत्रीय) तदनुसार १२ फरवरी, १८२५ ई. का प्रतिपादन किया है जिसे हम अनेक तथ्यों और तर्कों से सर्वथा गलत होना गत ३० मार्च को ही सिद्ध कर चुके हैं। यथा-

स्वामी दयानन्द ने पूना में 4 अगस्त, 1875 ई, को दिए गए अपने पूर्व-चरित्र सम्बन्धी व्याख्यान के आरम्भ में कहा था कि “इस समय मेरा वय 49/50 वर्ष का होगा। ”

यह वाक्य चूंकि स्वामीजी ने 4 अगस्त, 1875 ई, ( श्रावण शुक्ला 3) को कहा था, इसलिए उनका वय उस दिन ठीक-ठीक 49 वर्ष मानने से उनका जन्म 4 अगस्त, 1826 ई, (श्रावण शुक्ला प्रतिपदा) को हुआ होना मानना पड़ेगा। इसी प्रकार उनका वय ठीक-ठीक 50 वर्ष मानने पर उनका जन्म 4 अगस्त, 1825 ई, (अधिक श्रावण कृष्णा 5) को हुआ होना मानना पड़ेगा। लेकिन स्वामी जी ने तो अपनी वय 49/50 वर्ष की होना बताया था, जिससे उनका वास्तविक जन्म दिनांक-

(क) 4 अगस्त, 1825 ई. को उत्तर भारतीय चैत्री संवत् 1882 और गुजराती संवत् 1881 वि. तथा

(ख) 4 अगस्त, 1826 ई. को ( श्रावण शुक्ला प्रतिपदा) उत्तर भारतीय चैत्री संवत् 1883 और गुजराती संवत् 1882 वि. के मध्यवर्ती किसी दिनांक का ही हो सकता है।

आगे चलकर स्वामी दयानन्द ने अपना जन्म वर्ष अक्टूबर, 1879 ई. के थियोसोफिस्ट मासिक पत्र के अंक में लिखित रूप से संवत् 1881 वि. होना भी बता दिया था जो उक्त (क) और (ख) की दो जन्म तिथियों में से केवल प्रथम (क) में ही गुजराती संवत् के रूप में होना पाया जाता है, जिसका आरम्भ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से होता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि स्वामी जी का जन्म वर्ष 1881 वि. गुजराती संवत् ही है जो कि एक गुजरात में जन्म लिए हुए व्यक्ति का बताना स्वाभाविक ही था।

सार्वदेशिक सभा दिल्ली द्वारा जन्म तिथि का निर्धारण- स्वामी जी की जन्मतिथि के विषय में निर्णय लेते समय उसकी धर्मार्य सभा के सम्मुख 23 जुलाई, 1960 ई को जो विभिन्न जन्म तिथियाँ आईं थीं वे निम्न प्रकार थीं-

1- पं. भीमसेन शास्त्री, कोटा- फाल्गुन कृष्ण 10 शनिवार, संवत् 1881 वि. (12 फरवरी, 1825 ई.)

2-पं इन्द्रदेव, पीलीभीत- फाल्गुन शुक्ला 2, शनिवार संवत् 1881 वि. (19 फरवरी, 1825 ई.)

3- पं. अखिलानन्द शर्मा कविरत्न- भाद्रपद शुक्ल 9, गूरुवार संवत् 1881 वि (2 सितम्बर, 1824 ई.)

4- श्री जगदीश सिंह गहलोत – 10 फरवरी, 1825 ई.

5-पं भगवद्दत रिसर्च स्कॉलर- आश्विन कृष्ण 7, बुधवार, संवत् 1881 वि. ( 15 सितम्बर, 1824 ई.)

इनमें से सार्वदेशिक सभा की धर्मार्य सभा ने पं. भीमसेन शास्त्री वाली जन्म तिथि को ही मान्यता प्रदान की और इसे ही सभा की अन्तरंग सभा में 12 अप्रैल, 1967 ई. को स्वीकार कर लिया। पुनः 14 दिसम्बर, 1986 ई. को दुबारा इसकी पुष्टि भी कराके इसे आर्य जगत् में लागू करा दिया।

दर असल इनमें से कोई भी जन्म तिथि स्वामी दयानन्द द्वारा पूना में कहे गए पूर्वोक्त वाक्य के आधार पर जन्मतिथि के लिए निर्धारित दोनों छोरों के भीतर की नहीं थीं, इसलिए वे सभी जन्मतिथियां अस्वीकृत कर दी जानी चाहिए थीं, परन्तु उसने इनमें से पं. भीमसेन शास्त्री वाली जिस जन्म तिथि 12 फरवरी, 1825 ई. को स्वीकार कर लिया वह उत्तर भारतीय चैत्री संवत् 1881 वि. मानकर निर्धारित की गई होने से स्वामी दयानन्द की वय 4 अगस्त, 1875 ई. को 50 वर्ष 5 मास और 23 दिन बनती है जबकि स्वयं स्वामी जी द्वारा पूना में कहे गए पूर्वोक्त वाक्य के अनुसार वह 49 वर्ष से अधिक परन्तु 50 वर्ष से कुछ कम होनी चाहिए थी। अत: फालगुन कृष्ण 10 की जन्मतिथि तो सर्वथा ही अस्वीकारणीय है क्योंकि वह तो तब होती जब अपनी वय ५०/५१ वर्ष होना स्वामीजी द्वारा कहा गया होता।
इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जन्म तिथि निर्धारकों में से कोई भी विद्वान् ऋषि के पूर्वोक्त एक छोटे से वाक्य का भी ठीक-ठीक अभिप्राय पिछले 147 वर्षों में नहीं समझ पाया है केवल हमने ही इसे पहले पहल समझकर ऋषि की जन्म तिथि 20 सितम्बर, 1825 ई. ( भाद्रपद शुक्ल 9, गुजराती संवत् 1881 वि. के रूप में) 2018 ई. में एक पुस्तक लिखकर निर्धारित कर दी है जिसे आर्यजगत् के एकमात्र आर्ष पंचांगकार आचार्य दार्शनेय लोकेश (नोएडा) ने भी मान्य कर अपने प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाले वैदिक पंचांग में देना आरम्भ कर रखा है। फलस्वरूप ही वह उनके पंचांग के अनुसार इस वर्ष गत 5 सितम्बर, 2022 ई. को अनेक आर्यजनों और आर्यसमाजों द्वारा मनाई भी गई।
मेरे द्वारा निर्धारित इस जन्मतिथि भाद्रपद शुक्ल 9, संवत् 1881(कार्तिकीय) को मानने से न केवल २० सितम्बर, १८२५ ई. को मूल नक्षत्र आता है, अपितु उनकी २२वीं जन्मतिथि के ठीक ५१ दिनों के बाद ही कार्तिकी संवत् १९०३ का आरम्भ भी हो जाता है जिसमें ही ऋषि ने गृहत्याग किया था और कुछ ही दिनों की यात्रा के बाद वे कार्तिकी पूर्णिमा पर लगने वाले सिद्धपुर के मेले में ३ नवम्बर, १८४६ ई. तक पहुंच गए थे। इस यात्रा के दौरान सायला और कोटकांगड़ा में कहीं भी एक वा तीन मास तक रुके रहने का उल्लेख ऋषि ने हस्तलिखित और हस्ताक्षरित अपनी आत्मकथा में नहीं किया है। पं. लेखराम के अनुसार यह सम्पूर्ण यात्रा ही ५-७ दिन की है।
डा. वेदपाल और डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री ऋषि के अपने आत्मकथोक्त “इस प्रकार १४ चौदहवें वर्ष की अवस्था के आरम्भ तक सम्पूर्ण यजुर्वेद की संहिता सम्पूर्ण और कुछ अन्य वेदों का भी पाठ पूरा हो गया था। और शब्द रूपावली आदि छोटे-छोटे ग्रन्थ भी पूरे हो गए थे। पिताजी जहां-जहां शिवपुराणादि की कथा होती थी वहां-वहां मुझको पास बिठाकर सुनाया करते थे। और मेरे घर में भिक्षा की जीविका नहीं थी किन्तु जमींदारी और लेनदेन से जीविका के प्रबन्ध करके सब काम चलाते थे। और मेरे पिता ने माता के मने करने पर भी पार्थिव पूजन का आरम्भ करा दिया था। जब शिवरात्रि आई तब त्रयोदशी के दिन कथा का माहात्म्य सुना के शिवरात्रि के व्रत का निश्चय करा दिया ‌” का आशय भी ठीक से नहीं ले पाए हैं क्योंकि उनके द्वारा निर्धारित जन्मतिथि फाल्गुन कृष्ण १० और शिवरात्रि व्रत की त्रयोदशी के मध्य मात्र २ दिन का ही समय मिलता है जिसके लिए ऋषि का उक्त लेख सर्वथा असंगत हो जाता है। यदि वह संगत होता तो ऋषि इतना सब पढ़ने का उल्लेख उक्त प्रकार से न करके ऐसा करते कि १३वें वर्ष की समाप्ति पर्यन्त उक्त सब कुछ पढ़ और सुन लिया था।
महर्षि की जन्मतिथि भाद्रपद शुक्ल ९ उनके जीवनकाल में ही उनके तदनुरूप व्यवहार के कारण अनेक लोगों को ज्ञात थी, जैनी जियालाल ने १८८८ ई.में केवल उसके लिए किसी से एक कुंडली बनवाकर यह मानकर प्रचारित कर दी कि ऋषि का संवत् १८८१ का जन्म चैत्रीय संवत् १८८१ (१८२४ ई.) का है। परन्तु यह सही नहीं था जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि ऋषि जन्म संवत् तो कार्तिकीय है जो कार्तिक से आश्विन मास तक चलता है, चैत्र से फाल्गुन तक नहीं। इसी जानकारी से ऋषि के कतिपय अनुयायियों ने भी ऋषि के जीवन चरित्र लिखे थे। यथा पं. अखिलानंद शर्मा और पं. केशवराम विष्णु राम पाण्ड्या ने, पर इन लोगों ने भी वही गलती की जो जैनी जियालाल ने की थी। क्योंकि ऋषि का जन्म चैत्री संवत् के अन्तिम दिनों में न होकर कार्तिकीय संवत् के अन्तिम दिनों में अर्थात् भाद्रपद मास में ही हो सकता है जैसे चैत्री संवत् के अन्तिम दिनों में कुछ लोगों ने फाल्गुन कृष्ण १० (वा अमान्त माघ कृष्ण १० को) अब
मान रखा है।
पं. श्रीकृष्ण शर्मा ने तो ऋषि की जन्म कुंडली स्वयं नहीं बनाई थी, अपितु वह तो उन्हें ऋषि के उत्तराधिकारी परिवारी जनों से ही मिली थी जो चैत्रीय संवत् के अनुसार न होकर कार्तिकीय संवत् के अनुसार १८२४ ई. की न होकर १८२५ ई. की थी। इस अन्तर को समझ पाने में डा. वेदपाल जी भी असमर्थ रहे हैं।
हमारे पक्ष को मानने पर शिवरात्रि यदि जन्मतिथि से ५ मास बाद आती है तो इस हमारी बात को तो स्व. पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी तक ने अपनी वेदवाणी पत्रिका के एक अंक में इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि तब ही चौदहवें वर्ष के आरम्भ में” और जब शिवरात्रि आई तब के ऋषि के पूर्वोक्त कथन सार्थक हो पाते हैं।
चैत्रीय और कार्तिकी संवत् दोनों के ही आरम्भ और अन्त में उनका ईस्वी सन् से अन्तर क्रमशः ५७ और ५६ वर्ष ही रहता है। लेकिन पहले का आरम्भ यदि मार्च-अप्रैल में होता है तो दूसरे का अक्टूबर-नवम्बर में। इसीलिए इन दोनों में अन्तर केवल मार्च-अप्रैल से अक्टूबर-नवम्बर मासों के मध्य में ही परिलक्षित होता है। वर्ष के शेष दिनों वे एक समान रहते हैं। इस बात का ही लाभ लेकर डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री ने अजमेर में कह दिया था कि उनके द्वारा मान्य जन्म तिथि दोनों संवतों के अनुसार है, पर वे इस अन्तर का संज्ञान नहीं ले सके कि जन्मतिथि के एक-दो मास के बाद ही अगला संवत् १९०३ केवल एक ही संवत् में आ पाता है, दूसरे में नहीं। इस बात को डा. वेदपाल जी भी नहीं समझ पाए हैं जैसा कि उनके सम्पादकीय लेख से प्रकट है।
आर्यजगत् में पंचांग विधा के जानकार बहुत कम ही लोग हैं, इसलिए लोग पिछले १४७ वर्षों से गलत निर्णय लेकर उन्हें प्रचारित करने में चले आ रहे हैं। हमने अजमेर संवाद में इसीलिए आर्ष पंचांगकार आचार्य दार्शनेय लोकेश को बुलवाने का आग्रह किया था जो डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री की स्थापनाओं का खण्डन पत्र मुद्रित कराकर अपने साथ इस संवाद गोष्ठी में सुनाने के लिए लेकर आए थे , पर इसके लिए वहां उन्हें अवसर ही प्रदान न करने के कारण हमने अब उसे अपने आदित्यप्रकाश-१४ में प्रकाशित करके सबको भेज दिया है। उनका यह लेख बाद में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तरप्रदेश, लखनऊ के साप्ताहिक मुखपत्र आर्यमित्र के १५-२२ सितम्बर, २०२२ ई. के अंक में भी छप चुका है।
आशा है उसे पढ़कर समस्त आर्यजन सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में तत्पर हो सकेंगे।
टीप- परोपकारी के उक्त अंक में प्रकाशित सभी संवाद विकृत करके प्रकाशित किए गए हैं। मैंने तो अपना लिखित वक्तव्य दिया था जो मैं दोनों संवाद संचालकों तथा डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री को भी देकर आया था। परन्तु मेरा यह वक्तव्य भी तदनुरूप नहीं छापा गया। सम्पादक ने उनमें वे बातें भी अपनी ओर से मिला दीं हैं जो वहां वस्तुत: हुई ही नहीं थीं।
डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री गुजरानवाला में १८७८ ई. के फरवरी-मार्च में ऋषि की अपनी वय ५३ वर्ष होना बता रहे थे उसे पं. लेखराम आर्यपथिक ने अपने द्वारा लिखित जीवन चरित्र में वहां मात्र ५१ वर्ष होना ही बताया है।(देखें उसका पृष्ठ ३८०)
इं. आदित्यमुनि वानप्रस्थ

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nitrobahis giriş
sekabet giriş
sekabet giriş