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पूजनीय प्रभो हमारे……

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-79

नाथ करूणा रूप करूणा आपकी सब पर रहे

गतांक से आगे….
कहा गया है कि वह परमात्मा ‘अकाम:’ अर्थात कामनाओं से मुक्त कामना रहित है, वह किसी भी प्रकार की कामना के फेर में नहीं पड़ता। जैसे हम सांसारिक लोगों की कामनाएं होती हैं-वैसे उसकी कोई कामना नही होती। वह धीर है अर्थात असीम धैर्यवान है। प्रभु ‘अमृत:’ अमर है। जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त है, नित्य है, अविनाशी है। ‘रसेनतृप्त’ आनंद अथवा शांति से तृप्त है। उसे संसार के किसी प्रकार के रस की आवश्यकता नहीं है। वह सारे रसों से भरा हुआ है। उसमें कहीं से ऊनापन अर्थात कमी नहीं है। वह ‘कुतश्चनोन:’ अर्थात कमियों से मुक्त है। ऐसे गुणों से युक्त धीर, अजर और युवा परमात्मा को जानता हुआ मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता है।
जब मृत्यु से भय निकल जाए तभी समझना चाहिए कि हम भीतर से पापमुक्त हो गये हैं। पापकर्मों से हमारी निवृत्ति होकर पुण्यकर्मों में प्रवृत्ति हो गयी है। जो कर्मचारी या अधिकारी भ्रष्ट, कामचोर और निकम्मा होता है-वही अपने स्थानान्तरण से डरता है, पर जो कर्मचारी या अधिकारी ईमानदार, कत्र्तव्यशील, कर्मशील और पुरूषार्थी होता है-वह अपने स्थानांतरण से डरता नहीं है। वह अपने उच्चाधिकारियों से स्पष्ट कह देता है कि आप जहां चाहें मुझे भेज दें, मुझे कार्य करना है-और कार्य से मुझे डरना क्या?
इसी प्रकार जब करूणानिधान ईश्वर के इन गुणों का चिंतन करते-करते भक्त को अपने भीतर बैठे जीवात्मा का ज्ञान होने लगता है तो संसार की नाशवान वस्तुओं से और नाशवान संबंधों से उसका मन भरने लगता है, और वह अविनाशी ईश्वर को अपना सनातन मित्र बनाकर उसी के चिंतन और मनन में मगन रहने लगता है।
किसी मनीषी ने कहा है कि ईश्वर की दया बनी रहे-इसके लिए आवश्यक है कि दया का उल्टा कर दो-अर्थात ईश्वर को याद करो। उसे याद करोगे तो उसकी दया के पात्र बनोगे अर्थात आपकी बुद्घि सन्मार्गगामिनी बन जाएगी। आगे उनका कहना था कि यदि उसकी कृपा के पात्र बनना चाहते हो तो समझो की ‘कृ’ अर्थात करना और ‘पा’ अर्थात पाना के रहस्य को समझो। अभिप्राय है कि कृपा करके पाने का नाम है। शुभ कर्म करो और उसकी कृपा के पात्र बनो। बेड़ा पार हो जाएगा।
ईश्वर की समदृष्टि हमें कैसे उपलब्ध होती रहती है और कैसे उसे अपनाकर लोग यशस्वी कार्य करने लगते हैं?-इसके लिए एक दृष्टान्त प्रस्तुत करना प्रासंगिक है। गुरू गोविन्दसिंह का एक शिष्य था-जिसका नाम कन्हैया था। मुगलों से चल रहे युद्घ में अपने सैनिकों को पानी पिलाने का कार्य कन्हैया को दिया गया था। जिसके लिए उसने प्याऊ लगायी। जब कन्हैया सैनिकों को पानी पिलाता तो मुगल सैनिकों को भी वह पानी देता था।
इसकी शिकायत गुरू गोविन्द सिंह से कुछ सैनिकों ने की। उन्हें यह अच्छा नहीं लगता था कि कन्हैया मुगल सैनिकों को भी पानी पिलाये। शत्रु सैनिकों को पानी के लिए तड़पता हुआ छोड़ा जाए- हमारे सैनिकों की यही इच्छा थी। इसलिए उन्होंने गुरूजी से निवेदन किया कि वे कन्हैया को अपने आचरण में सुधार लाने को कहें। सैनिकों की इस शिकायत पर गुरूजी मुस्कराये। वे कन्हैया को भली प्रकार जानते थे। फिर भी उन्होंने कन्हैया को बुलाकर उससे पूछा-”क्यों भाई? शत्रुओं को पानी पिलाते हो? तुम्हें तो यही उचित है कि अपनी सेना को ही पानी पिलाओ?”
इस पर कन्हैया ने कहा-”गुरूजी, जब से आपकी कृपादृष्टि हुई है और उस प्यारे प्रभु की करूणा के रस को मैंने पीना आरंभ किया है-तब से मुझे तो सब में अपना ही रूप दिखायी देता है।”
कन्हैया का कथन सुनने के पश्चात गुरू गोविन्दसिंह ने कहा-”सैनिको! कन्हैया ने जितना मुझे समझा है उतना तुममें से किसी ने नहीं समझा। कन्हैया को अपना काम करने दो।”
ऐसी ही करूणा के प्रेमरस में तृप्त होकर जब वंदना की जाती है तो करूणा व्यक्ति के सिर चढक़र बोलती है। तब भक्त को सारा संसार अपना घर लगने लगता है और संसार के सभी जन अपने परिजन दीखने लगते हैं। संसार के प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में हिंसाभाव समाप्त हो जाता है और वह उनके जीवन को कष्ट न पहुंचाकर उनके जीने में सहायक बनने का प्रयास करने लगता है। सारी सृष्टि में नवजीवन का मधुर संगीत उसे गूंजता सा दीखने लगता है। इस प्रकार करूणा संसार का सार है, आधार है। करूणा एक वैश्विक संस्कार है, जो हमें सबका और सबको हमारा बनाती है और संपूर्ण वसुधा को एक परिवार मानने की शिक्षा हमें देती है।
कर्णवास में राव कर्णसिंह रास का खण्डन सुनकर स्वामी दयानंद के पास आये। उन्होंने स्वामी जी रास पर विस्तार से चर्चा की अंत में पराजित हो गये। पर पराजय को सहन नहीं कर सके। इसलिए क्रोधावेश में आ गये। उनकी आंखों में रक्त उतर आया स्वामीजी के प्रति राव साहब हिंसा से भर उठे थे। इसलिए उन्होंने क्रोध में पागल होकर स्वामीजी पर प्राणघातक हमला बोल दिया। स्वामी पर अपशब्दों की बौछार करते हए नंगी तलवार लेकर वह स्वामी जी की ओर लपके। स्वामी जी ने उन्हें-‘अरे धूत्र्त’ कहकर अपने हाथ से धकेल दिया। जिससे राव साहब गिर गये।
अब तो और भी अधिक क्रोध उन्हें चढ़ गया। अब की बार उन्होंने स्वामीजी की हत्या के उद्देश्य से उन पर तलवार चलाने का निर्णय ले लिया, पर वह तलवार चला पाते इससे पहले स्वामीजी ने उनके हाथ से तलवार छीन ली और भूमि के साथ टेककर ऊपर से दबाव देकर उसके टुकड़े कर दिये।
स्वामी जी ने राव साहब से कहा कि-‘मैं नहीं चाहता कि मैं भी तुम्हारे साथ पागलों वाला व्यवहार करूं। मैं संन्यासी हूं। तुम्हारे किसी अत्याचार से चिढक़र मुझे तुम्हारा अनिष्ट चिंतन नहीं करना चाहिए। जाओ, चले जाओ-ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे, तुम्हें सुमति प्रदान करे।’ महाराजश्री ने तलवार के दोनों खण्ड दूर फेंककर राव साहब को विदा किया।
करूणा जब व्यक्ति के रोम-रोम में बस जाती है तब वह व्यक्ति की कायरता का हरण कर वीरता के रूप में प्रकट होती है। हमें वेद ऐसी ही करूणा का स्वामी बनाना चाहते हैं। करूणा एक ईश्वरीय वरदान है। जिसे इसी रूप में हमें अपनाना चाहिए। ईश्वर स्वयं ऐसी ही करूणा के स्वामी हैं, उनके निरंतर नित्य चिंतन से हम भी ऐसी ही करूणा के स्वामी हों, ऐसी हमारी प्रार्थना है।
क्रमश:

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