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राजनीति

बिखरते अस्तित्व को समेटने की चुनौती

आर्थिक क्षेत्र में भी राहुल गांधी के पास फटे-पुराने समाजवादी एजेंडे के अलावा कुछ नया नहीं है। राहुल निश्चित रूप से चुनावी राजनीति के राजनीतिक चरण में दोबारा प्रविष्ट हो रहे हैं और वह कड़े प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनकी रणनीति चुनावी जुमलों तक सीमित है। उनकी न तो कोई नीति है, न कोई आदर्श और न कोई पुख्ता विचार। मोदी यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने राहुल की नीति में बदलाव लाया है, तभी तो वह बार-बार मंदिरों में जा रहे हैं तथा अहमदाबाद के आर्कबिशप से भी समर्थन मांगा है। 
राजनीति के जानकार लोगों व आलोचकों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस अपना जोश खो चुकी है। भ्रष्टाचार व घोटालों के बोझ के कारण अस्तित्व बनाए रखने की इसकी इच्छा खत्म हो चुकी है। यहां तक कि गुलाम नबी आजाद, जो अकसर कई मद्दों पर कांग्रेस का पक्ष रखते रहे हैं, ने भी कह दिया है कि पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में सत्ता वापसी की उम्मीद छोडक़र 2024 के चुनावों की तैयारी करनी चाहिए। इस मूल्यांकन से अधिक पर्यवेक्षक सहमत हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि पार्टी के पास धन व संवेदनशील संपर्कों के रूप में संसाधनों का एक बड़ा कोषागार रहा है। पार्टी के प्रति समर्पित मीडिया भी उसकी ताकत रही है और वह अपने पक्ष में प्रचार करवाने में भी आगे रही है। भारत जैसे विशाल देश में जो पार्टी 50 से अधिक वर्षों तक सत्ता में रही हो, उसके लिए यह जरूरी है कि उसका विशालकाय आकार होता और जमीनी जुड़ाव के कारण उसकी शक्ति भी अधिक होती। कठिनाई यह रही कि इसकी दिशा गलत रही। अब इसने लक्ष्य बदल लिए हैं, इसके बावजूद यह सही ढंग से आगे नहीं बढ़ पा रही है। पार्टी ने हालांकि गोवा, मणिपुर व अरुणाचल में बढ़त हासिल की, लेकिन वहां भी वह सरकार नहीं बना पाई। यह केवल पंजाब में जीती, जहां पर वह इसलिए अच्छा प्रदर्शन कर पाई क्योंकि लोग सत्तारूढ़ अकाली दल से नाराज हो गए थे। कुछ हद तक कैप्टन अमरेंद्र सिंह का व्यक्तिगत प्रभाव भी उसके काम आया। अब हिमाचल व गुजरात में चुनावों व परिणामों का इंतजार है। इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि कांग्रेस का प्रदर्शन किस स्तर का है और उसका भविष्य क्या होगा। इस चुनावी लड़ाई में कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदल ली लगती है। कांग्रेस को पता है कि वह भाषण अथवा नवाचार के मामले में मोदी का मुकाबला नहीं कर सकती है। उसकी रणनीति है कि सभी मामलों में दोषारोपण न किया जाए, बल्कि जनता के दिमाग में भ्रम की स्थिति पैदा की जाए। कोई तर्कसंगत वाद-विवाद के बजाय कांग्रेस ने जुमलों की रणनीति अपनाई है जो जनता के दिमाग में लंबे समय तक याद रहते हैं। कांग्रेस नेताओं ने मोदी को चायवाला, जादूगर, झूठा व हत्यारा कहा। उन्होंने अवसर विशेष के अनुकूल तथा मोदी की नकल करते जुमले निकालने की रणनीति अपनाई। मौसम का हाल, चुनाव से पहले होगी गुजरात में जुमलों की बरसात, इस तरह के जुमले इसी रणनीति का हिस्सा लगते हैं। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गले मिलने की कूटनीति का भी मजाक उड़ाया है। भारत को वांछित दुर्दांत आतंकवादी हाफिज सईद को पाकिस्तान ने जब जेल से रिहा कर दिया तो कांग्रेस ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ आलिंगनबद्ध होने की मोदी की नीति का मजाक उड़ाया और कहा कि यह नीति भारत के काम नहीं आई। इस प्रक्रिया में कांग्रेस नेता अपने उल्लास को नियंत्रित नहीं कर पाए और इससे भाजपा को यह आरोप लगाने का मौका मिल गया कि कांग्रेसी ऐसे समय में खुशी जता रहे हैं, जब भारत के एक बड़े दुश्मन को आजाद कर दिया गया है।
कांग्रेस उस स्तर तक गिर चुकी है जहां राष्ट्र हित की चिंता उसके लिए मायने नहीं रखती, जबकि पार्टी का अस्तित्व बचाना ही उसकी एकमात्र चिंता रही है। कांग्रेस ने पाटीदारों की आरक्षण की मांग का समर्थन करते हुए उनके साथ भी समझौता कर लिया। यह समझौता इस तथ्य के बावजूद हुआ कि ऐसा करने से यह मांग एक चुनौती बन जाएगी और देश के विभाजित हो जाने का खतरा बढ़ेगा। एक बड़ी पार्टी ने एक क्षेत्रीय संगठन से समझौता कर लिया और बिहार की तरह वह गौण भूमिका में आ गई। विघटनकारी मांग करने वालों से वह आलिंगन कर बैठी और ऐसा करते हुए उसने अपना स्तर भी घटा लिया। राहुल गांधी की नीति मोदी के विध्वंस पर आधारित है, जिसके कारण वह नई कारगर नीति अथवा दिशा तय नहीं कर पा रही है। इस कारण कांग्रेस पर दया आती है कि वह कितनी अयोग्य हो चुकी है। सबका साथ, सबका विकास का नारा देकर मोदी एक बड़ा बदलाव लाने में सफल रहे हैं। यह एक जुमला नहीं था, बल्कि उस नीति का उद्घोष है कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाएगा। इससे पहले यह होता रहा है कि संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों के साथ समान व्यवहार नहीं होता था। अब कोई भी व्यक्ति प्राथमिकता देने के लिए अपना दावा नहीं कर सकता। कांग्रेस की नीति अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की रही है, जिससे सामाजिक असमानता बढ़ी है। मोदी की ताकत यह है कि वह अपने इस नए दृष्टिकोण को लेकर पार्टी को समझाने में सफल रहे हैं। यहां तक कि अब योगी आदित्यनाथ भी इस दृष्टिकोण पर अल्पसंख्यकों में सहमति बनाने में सफल रहे हैं। इसके कारण सभी समुदायों के लोगों के साथ कानून के अनुसार व्यवहार करने को लेकर सरकार के दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आया है। विदेश नीति से संबंधित एक नया दृष्टिकोण भी मोदी लेकर आए हैं। उनका कहना है कि वह किसी के सामने झुकेंगे भी नहीं, किसी को हेय दृष्टि से भी नहीं देखेंगे। सभी राष्ट्रों के साथ संबंध बनाते समय आत्मसम्मान की नीति का अनुसरण किया जाएगा। अमरीका, जापान व दक्षिण कोरिया से संबंध बनाते हुए मोदी ने अपनी इस नीति का बखूबी परिचय दिया है और अब भारत एक शक्तिशाली समूह के निर्माण की ओर अग्रसर है। उधर, कांग्रेस ने कोई नई नीति प्रतिपादित नहीं की है। आर्थिक क्षेत्र में भी राहुल गांधी के पास फटे-पुराने समाजवादी एजेंडे के अलावा कुछ नया नहीं है। राहुल निश्चित रूप से चुनावी राजनीति के राजनीतिक चरण में दोबारा प्रविष्ट हो रहे हैं और वह कड़े प्रयास कर रहे हैं, इसके बावजूद उनकी रणनीति चुनावी जुमलों तक सीमित है। उनकी न तो कोई नीति है, न कोई आदर्श है, न कोई पुख्ता विचार। दूसरी ओर मोदी यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने राहुल गांधी की नीति में बदलाव लाया है, तभी तो वह बार-बार मंदिरों में जा रहे हैं तथा अहमदाबाद के आर्कबिशप का समर्थन भी मांगा है। कांग्रेस की आधारभूत शक्ति का स्तंभ अभी भी वंशवाद ही बना हुआ है। इस स्थिति में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। इस दिशा में कोई मंथन भी नहीं हो रहा है और पार्टी के लिए बड़ी उलझन का कारण बने वंशवाद को चुनौती देने वाला कोई नेता अभी पार्टी में है भी नहीं।

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