देश की पहली लोकसभा 13 मई 1952 को अस्तित्व में आयी थी। देश में स्वतन्त्रता के उपरान्त अपने संविधान के अनुसार तब पहली बार चुनाव सम्पन्न हुए थे। लोगों में चुनाव में मतदान के प्रति अतिउत्साह था। उन्हें लग रहा था कि मतदान के माध्यम से सही प्रतिनिधि चुनकर वह बहुत बड़ा कार्य करने के अधिकारी बन गये हैं। लोग सोच रहे थे कि अब हमारा राज है, हमारा देश है और हम अपने भाग्यविधाता स्वयं हंै। उस समय देश के प्रधानमन्त्री नेहरूजी थे, जिन्हें उनकी बेटी का पोता आजकल अपना परदादा बताता है। राहुल जी नहीं जानते कि परदादा कौन होता है और यह भी कि उनके वास्तविक परदादा तो फीरोज गांधी के पिता थे, जिन्हें राहुल गांधी या तो जानते नहीं या फिर जानकर अपना परदादा मानते नही। खैर……।
बात नेहरूजी की चल रही थी। नेहरूजी की एक विशेषता थी कि वे संसद के प्रति गम्भीर रहते थे। उस समय देश की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी। इतनी जनसंख्या की समस्याओं के समाधान के लिए नेहरूजी संसद के विधायी कार्यों को निपटाने के प्रति अत्यधिक सावधान रहते थे। उसी का परिणाम था कि जब देश की पहली लोकसभा ने अपना कार्य करना आरम्भ किया तो 13 मई 1952 से लेकर 4 अप्रैल 1957 तक अर्थात जब तक पहली लोकसभा भंग हुई-तब तक कुल 677 बैठकें की गयीं और संसद ने देश के लिए 3784 घंटे विधायी कार्य किया। तब सांसद भी अपने कार्य के प्रति निष्ठावान होते थे। वे जनता के बीच से संघर्ष करके निकलते थे और अपने दायित्व के निर्वाह के प्रति सावधान रहते थे। उनमें अहम का भाव नहीं के बराबर होता था, सेवाभाव से प्रेरित होकर वे सांसद बनते थे। यही कारण था कि उस समय के सांसद संसद की कार्यवाहियों में भाग लेने को अपना राष्ट्रीय कत्र्तव्य मानते थे। बाद में इस सोच में घुन लगने लगा और 14वीं लोकसभा के आने तक जहां देश की जनसंख्या 33 करोड़ से बढक़र एक अरब को पार कर गयी अर्थात तीन गुना बढ़ गयी-वहीं हमारे सांसदों ने संसद में अपनी उपस्थिति आधी से भी कम कर दी। कहने का अभिप्राय है कि देश की जनसमस्याएं तो बढ़ीं, पर संसद के प्रति जनप्रतिनिधियों की रूचि घटी। जिसका परिणाम यह हुआ कि 14वीं लोकसभा के कार्य काल में पहली लोकसभा की 677 बैठकों की अपेक्षा केवल 332 बैठकें अर्थात आधे से भी कम बैठकें हो पायीं। जहां पहली लोकसभा ने देश की 33 करोड़ की जनसंख्या के लिए 3784 घंटे काम किया था-वहीं 14वीं लोकसभा ने एक अरब से अधिक की जनसंख्या के लिए केवल 1736 घंटे काम किया। राहुल गांधी कुछ समय पहले संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। वह गुजरात चुनावों के समय जोर-शोर से चिल्ला रहे थे कि मोदी सरकार संसद का सत्र बुलाने से डर रही है। अब मोदी सरकार ने संसद का सत्र बुला लिया है, लेकिन देखने वाली बात ये है कि जो राहुल गांधी संसद के सत्र के प्रति गम्भीरता दिखा रहे हैं उन्हीं की पार्टी के शासनकाल में (जब उनकी मां सोनिया गांधी ‘सुपर पी.एम.’ थीं) देश की संसद ने 14वीं लोकसभा के चलते पहली लोकसभा के उपलब्ध आंकड़ों की अपेक्षा आधे से भी कम समय कार्य किया। कहने का अभिप्राय है कि संसद के प्रति गम्भीरता का भाव दिखाने में क्षरण की प्रक्रिया कांग्रेसीकाल में ही हो चुकी थी। उस समय उन्हें नेहरूजी की नीतियों के अनुसार संसदीय गरिमा का ध्यान रखना चाहिए था। उन्हें नेहरू जी से सीखना चाहिए था कि देश के लिए किस समर्पण से कार्य किया जाता है? इसलिए वह 14वीं लोकसभा के समय संसद को विधायी कार्यों के लिए कम समय 10000 घंटे काम करने की प्रेरणा देते, तब लगता कि वह स्वयं भी संसद के प्रति उतने ही गम्भीर हैं-जितने उनके परदादा (?) नेहरूजी थे।
प्रधानमंत्री मोदी देश के सुनहरे भविष्य के लिए सभी लोगों के चरित्र से तिनका-तिनका एकत्र कर घोंसला बनाने की कला में माहिर हैं। उन्होंने कांग्रेस के महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के ही उपेक्षित नेता सरदार पटेल को अपनाया है, लाल बहादुर शास्त्री को अपनाया है और कुछ सीमा तक पी.वी.नरसिंहाराव को भी सम्मान दिया है-यह उनके चरित्र का अच्छा गुण है-पर अच्छे गुण भी तब राजनीतिक पाखण्ड बनकर रह जाते हैं-जब अपने विरोधी से अच्छे गुण लेने को व्यक्ति अपना अपमान समझने लगता है। मोदी जी को रामचन्द्रजी का वह प्रसंग निश्चय ही स्मरण रखना होगा जब वे स्वयं मृत्यु शैया पर विराजमान अपने शत्रु रावण के पास जाते हैं और उससे करबद्घ होकर राजनीति का पाठ सीखते हैं। राम का संघर्ष रावण की दुष्टता से था, रावण के ज्ञान-विज्ञान को तो मर्यादा पुरूषोत्तम भी नमन करते हैं। राम का यह आदर्श और मर्यादित चरित्र इस देश के राजनीतिज्ञों को आज भी पाठ पढ़ाने के लिए पर्याप्त है। भारत चित्र (मूत्र्ति) का पुजारी न होकर चरित्र का पुजारी देश है-निश्चय ही श्रीराम का चरित्र हमारे लिए आज भी पूजनीय है।
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी चाहिए कि वे पंडित नेहरू जैसी गम्भीरता संसद के प्रति लाने का प्रयास करें। संसद का विधायी कार्य निपटाने के लिए आज 3784 घंटे कार्य करने की आवश्यकता न होकर कम से कम 10000 घंटे कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने संसद का शीतकालीन सत्र जिस प्रकार कम किया है-वह उचित नहीं है।
हम अपने लोकतंत्र को परिपक्व लोकतंत्र कहकर अपनी पीठ अपने आप थपथपाते रहते हैं। इससे ऐसा लगता है कि जैसे हमने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है और अब देश का लोकतंत्र सही दिशा में सही कार्य करने लगा है, पर वास्तव में यह हमारा मतिभ्रम ही है। आज भी इस देश के अधिकांश मतदाता ‘गन’ बल, धनबल और जनबल से खरीद लिये जाते हैं। जातीय और साम्प्रदायिक आधार पर मतदाता का धु्रवीकरण होता है, उन्हें लालच देकर राजनीतिक दल अपने साथ ‘वोट बैंक’ बनाकर रखते हैं। सारा लोकतंत्र बंधक है और हम कह रहे हैं कि हमारा लोकतंत्र परिपक्व है। परिपक्व लोकतंत्र तो उस दिन होगा जिस दिन देश का हर व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज पर मतदान करने लगेगा और देश का प्रशासन उस मतदान को केवल दृष्टाभाव से देखेगा, साथ ही देश का शासक वर्ग चुनावी प्रक्रिया में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा।
ऐसी अवस्था लाने के लिए प्रधानमंत्री मोदीजी को विशेष पहल करनी होगी। उन्हें जनप्रतिनिधियों को समझाना होगा कि वे अपने निकम्मेपन को त्यागें और देश के लिए आगे आयें। हमारे जनप्रतिनिधि इस समय कुछ भवनों, संस्थानों के या अन्य प्रतिष्ठानों के फीते काटने या उनका उद्घाटन करने के काम को ही सरकारी कार्य मान रहे हैं। इनमें से अधिकांश को नहीं पता कि संसद का सत्र तुम्हारी योग्यता और जनता के प्रति तुम्हारे दायित्वों की परीक्षा के लिए आहूत किये जाते हैं-जिनमें तुम्हें जनता के दु:ख दर्द को अधिक से अधिक उठाना चाहिए और उसका समाधान खोजना चाहिए। मटरगश्ती करते इन जनप्रतिनिधियों पर मोदी और राहुल गांधी लगाम लगायें और संसद के प्रति इन्हें गम्भीर बनाकर देश की जनसमस्याओं का मिल जुलकर समाधान खोजें, यह समय की आवश्यकता है। परिपक्व लोकतंत्र का तकाजा भी यही है। जनता को ‘वोटबैंक’ न बनाकर उसे खुला छोड़ें-उसके बौद्घिक विवेक को पूर्वाग्रही न बनायें-अपितु राष्ट्रहित में उसे निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र चिंतन करने दें। जिस दिन ऐसी स्थिति आ जाएगी-उसी दिन कहा जाएगा कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। पहली लोकसभा का आदर्श हमारे सामने है। अच्छा हो कि उस आदर्श को 16वीं लोकसभा अपने शेष कार्यकाल के लिए अपनाये और देश को सही दिशा देने का काम करे। राहुल गांधी के ‘परदादा’ से आज की राजनीति को शिक्षा लेनी चाहिए। वैसे राहुल गांधी को यह याद रखना चाहिए कि उनके ‘परदादा’ का राजनीति से कोई सम्बन्ध ही नहीं था। वह जिन्हें अपना ‘परदादा’ कह रहे हैं वे पंडित नेहरूजी तो उनके पिता राजीव गांधी के नाना हैं। जिनसे राहुल का कोई सम्बन्ध है तो केवल इतना है कि वह उनकी दादी के पिता हैं, और दादी का पिता परदादा नहीं होता-राहुल जी।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
meritking giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
meybet
meybet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meritbet giriş
meritbet giriş
vaycasino giriş
piabellacasino giriş
piabellacasino giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
pokerklas
pokerklas
norabahis giriş
vdcasino
vdcasino
pokerklas
pokerklas
hititbet giriş
Pokerklas giriş
pokerklas
pokerklas
hititbet
hititbet
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betorder
betorder
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
timebet
timebet
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
meybet
meybet
vdcasino
vdcasino
extrabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
meybet
meybet
betcio giriş
betcio giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
timebet
norabahis giriş
norabahis giriş
meybet
meybet
harbiwin giriş
harbiwin giriş
meybet
betnano giriş
interbahis giriş
interbahis giriş