लोकतन्त्र एक ऐसी शासन प्रणाली है-जो ‘सम्मोहन’ के जादुई खेल से चलायी जाती है। कोई भी ऐसा राजनीतिज्ञ जो इस ‘सम्मोहन’ की जादुई क्रिया को जानता हो-देर तक किसी देश पर शासन कर सकता है। भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पश्चात नेहरूजी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनका व्यक्तित्व तो जादुई नहीं था-पर वह ‘सम्मोहन’ पैदा करने के जादू को अवश्य जानते थे, जिससे लोग उनके प्रति आकर्षित हुए और मजबूती के साथ उनसे जुड़ गये। उनका जादू चल गया और उनके प्रति यह धारणा देश में बन गयी कि वे ‘जादुई व्यक्तित्व’ के धनी हैं। उनके पश्चात शास्त्रीजी ‘सम्मोहन’ क्रिया को नहीं जानते थे-पर वे गीता के ‘निष्काम कर्मयोग’ को अवश्य जानते थे और उनके इसी गुण ने उन्हें देश का महानायक बना दिया। भारत की राजनीति के लिए उनका यह ‘निष्काम कर्मयोग’ ही वह विशेष गुण था-जिसे वास्तविक अर्थों में ‘भारतीय राजधर्म’ कहा जा सकता था। ‘निष्काम कर्मयोग’ राजनीति का अभिन्न अंग है, इसे अपनाने की प्रक्रिया शास्त्री जी के लघुकाल में चली और उनकी संदेहास्पद मृत्यु के साथ ही हमसे अनंत में विलीन हो गयी।
इंदिरा गांधी आयीं तो वह भीतर से सदा भयभीत रहीं, प्रारम्भ में सिंडिकेट से तो बाद में पंजाब के आतंकियों से। सिंडिकेट से डरकर देश में आपातकाल लगा दिया और आतंकियों से डरकर ब्लू स्टार ऑप्रेशन, कर बैठीं। डरते-डरते कड़े निर्णय लेती रहीं और देश की ‘आयरन लेडी’ बन गयीं। फिर भी यह माना जा सकता है कि उनके पिता नेहरू और उनके स्वयं के शासनकाल में देश को सम्मान मिला और कई क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय उन्नति की। इंदिरा जी ने भी देश की जनता को सम्मोहन की क्रिया से बांध लिया था। लोगों ने उन्हें एक बार हराया भी पर फिर भी वह सत्ता में लौट आयीं और जीवन के अंतिम क्षणों तक तक देश की प्रधानमंत्री रहीं।
उनके पश्चात देशव्यापी छवि रखने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अटल जी बने। राजीव गांधी एक शरीफ व्यक्ति थे, वह ना तो देश की जनता में सम्मोहन पैदा कर पाये और ना ही देश की राजनीति में ‘निष्काम कर्मयोग’ की ओर कोई झुकाव कर पाये। अटल जी की भाजपा में एक उदार छवि रही और वह एक अच्छे वक्ता होने के कारण देश की जनता को अपने साथ जोडऩे में सफल रहे। उनके इन दो गुणों के कारण ही भाजपा सत्ता में आयी और वे देश के पी.एम. बन सके।
अब बारी आयी मनमोहन सिंह और श्री मोदी की। डा. मनमोहन सिंह गिरती हुई कांग्रेस की आपात पसंद थे, उनके पास कुछ भी नहीं था। वह केवल एक नौकरशाह थे और नौकरशाह होने के कारण वह अपने ‘बॉस’ को खुश रखना जानते थे। उन्होंने सोनिया गांधी को ही नहीं राहुल गांधी जैसे अति कनिष्ठ (अधिकारी) को भी अपना बॉस माना और अपने इसी गुण के कारण देश पर दस वर्ष शासन कर गये। शेष प्रधानमंत्री परिस्थितियों की पैदाइश थे, उन्होंने जितनी देर भी शासन किया उनके लिए वह पर्याप्त से भी अधिक था।
जहां तक प्रधानमंत्री श्री मोदी का प्रश्न है तो उन्होंने जनता में नेहरूकाल की सी सम्मोहन की क्रिया को उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही। नेहरूकाल में देश में 35 से 40 करोड़ नागरिक थे, जबकि मोदी के आने तक ये नागरिक तीन से चार गुणे बढ़ गये। लोगों की शिक्षा भी नेहरूकाल से कई गुणा बढ़ गयी। लोग अपना हित व अहित समझने लगे कि किस व्यक्ति के हाथ में देश को सौंपना उचित होगा? मोदी के लिए कोई ‘गांधी’ नहीं था-जो नेहरू को देश की अनिच्छा के उपरांत भी गद्दी दे देता। मोदी को स्वयं ही ‘गांधी’ बनना था और स्वयं ही ‘नेहरू’ बनना था और वह बन गये। उनके ‘गांधी’ अर्थात आडवाणी को गम्भीर सदमा लगा कि उनके ना चाहते हुए भी ‘भाजपा का नेहरू’ देश का पीएम क्यों बन गया? आडवाणी भूल गये कि 1947 में गांधी के नेहरू को देश नहीं चाहता था, पर वह स्वयं चाहते थे और 2014 के ‘भाजपा के नेहरू’ अर्थात मोदी को देश चाहता था पर ‘भाजपा का गांधी’ नहीं चाहता था। देश की जनता की जीत हुई और मोदी प्रधानमंत्री बन गये। उनको सम्मोहन और निष्काम कर्मयोग दोनों को निभाना आता है। उन्होंने अपना जादू चला रखा है-यह भी उन्होंने सिद्घ किया है और उन्होंने अथक परिश्रम करके यह भी दिखाया है कि यह ‘निष्काम कर्मयोगी’ हैं।
इस सबके उपरांत भी देश की जनता की समस्याएं जस की तस हैं। माना जा सकता है कि देश की जनता की समस्याओं का कभी भी पूर्ण समाधान नहीं हो सकता। कोई भी प्रधानमंत्री देश की समस्याओं का पूर्ण समाधान कभी दे भी नहीं पाएगा, परंतु मोदी से अपेक्षा थी कि वे अधिकतम समाधान देंगे। उन्होंने देश का वित्तमंत्री अरूण जेटली को बना दिया। यह वही अरूण जेटली हैं-जिन्हें देश की जनता ने 2014 में सांसद बनने के योग्य भी नहीं समझा था और उन्हें चुनावों में हरा दिया था।
अब इन जेटली साहब की नीतियों के चलते सारा जोर व्यक्ति से अधिक से अधिक टैक्स वसूलने पर दिया जा रहा है। जेटली देश के लोगों का रक्त चूस रहे हैं और मोदी शांत हैं। देश के तीन लाख कारखाने बंद हो गये हैं, यह जेटली की जीत नहीं, हार है। क्योंकि इन कारखानों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी भी घर बैठ गये हैं। कितनी ही गृहिणियों को घर का चूल्हा जलाने में समस्या होने लगी है। लोग अपनी ही कमाई को भी कहीं सही जगह लगाने से इस समय बच रहे हैं, किसान अपनी मुआवजा राशि को भी छुपा रहा है, उसे भी वह मन चाहे ढंग से व्यय नहीं कर सकता। यह स्थिति मोदी सरकार के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती।
माना जा सकता है कि मोदी 2019 में प्रधानमंत्री बन सकते हैं, और हमारा मानना है कि वह देश के प्रधानमंत्री पुन: बनने भी चाहिएं, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था को एक व्यक्ति को सौंपकर वह निश्चिंत होकर बैठ जाएं। 2019 से पहले राजस्थान व गुजरात के विधानसभा चुनाव हमें में बहुत कुछ बता सकते हैं कि हवा का रूख क्या है? छह माह पहले यूपी में लग रहा था कि कांग्रेस केे लिए इस बार राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी यहां से जिताना संभव नहीं होगा-पर अब ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस की स्थिति में सुधार है, और लगता है कि कांग्रेस अपनी वर्तमान 44 लोकसभाई सीटों को 88 भी कर सकती है। भारत कांग्रेस विहीन न होकर ‘कांग्रेस की ओर चलो’ की राह पर यदि चलता है तो इसमें अरूण जेटली की रक्त निचोडऩे वाली आर्थिक नीतियां अधिक जिम्मेदार होंगी।
आज देश के मतदाता को विपक्ष के पास राहुल जैसा अपरिपक्व नेता दिखायी दे रहा है-इसलिए वह भाजपा के साथ है। राहुल गांधी की उपस्थिति भाजपा को लाभ दे रही है, यदि कांग्रेस की ओर से कोई एक ‘मोदी’ रण के बीच आकर यह कह दे कि वह कांग्रेस की ओर से अब से मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं करेगा, धारा 370 को समाप्त कराने में वह देश की जनता की भावनाओं का सम्मान करेगा और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कराना उसका भी संकल्प होगा, साथ ही समान नागरिक संहिता लागू कराना और भारत को विश्वगुरू बनाने की दिशा में ठोस कार्य करना उसका उद्देश्य होगा-तो सारी स्थिति में व्यापक परिवर्तन आ जाएगा।
जेटली ने पूर्व वित्तमंत्री रहे यशवंत सिन्हा और पी. चिदंबरम को आंकड़ों के मकडज़ाल में फांसकर उनका मुंह बंद कर दिया है। उनका आंकड़ों का जादू चल गया है-पर जमीन का सच ये है कि देश में आम मतदाता की परेशानियां बढ़ी हैं-घटी नहीं हैं। देश में भ्रष्टाचार पूर्ववत है और नौकरशाही पूर्व की भांति ही मौज ले रही है। कांग्रेस के शासनकाल में काला धन बाजार में घूमता रहता था। जिससे लोग निर्माण आदि के कार्य कराते थे। उससे मजदूरों को काम मिलता था। अब यह सारी प्रक्रिया रूक गयी है। जेटली जी कोई ऐसा आंकड़ा दें-जिससे कालाधन तो रूके ही साथ ही आम आदमी को रोजगार भी मिले और बेरोजगार हुए लोगों को आत्महत्या करने से बचाया जा सके। समय तानाशाही का नहीं है-समय लोकतंत्र का है। अकेले मोदी के नाम से ही भाजपा की नैया पार नहीं लगेगी। अब जनता जेटली जैसे मंत्रियों के कार्यों का हिसाब भी मांगेगी। भाजपा को 2019 की नहीं 2024 की चिन्ता करनी चाहिए।

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