तीन तन उन्नीस मुख, दिये अंग जीव को सात

बिखरे मोती-भाग 210

गतांक से आगे….
सारांश यह है सृष्टि का संचालन कर्म से और कर्म का संचालन भाव से हो रहा है। भाव हमारे चित्त में उठते हैं, जो कर्म में परिणत होने से पूर्व ही पवित्र होने चाहिए। भावों पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि असली चीज कर्म नहीं भाव है। यह भाव ही कर्म की आत्मा है। कर्म के बंधन से छूटने का उपाय ‘भाव’ से छूट जाना, कामना को छोड़ देना है। इसी को गीता में ‘निष्काम’ भाव कहा है। कर्म जीव को तभी तक बांध सकता है जब तक उसमें भाव अथवा कामना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मस्तर यही तो भाव है। भावों के वशीभूत होकर जीव अंधा हो जाता है और जो जो कुछ नहीं करना चाहिए, कर डालता है। इन्हीं के आधार पर ज्ञान, कर्म, पूर्व प्रज्ञा (बुद्घि, वासना, स्मृति संस्कार) का निर्माण चित्त में होता है। इसलिए हे मनुष्य ! तू इनका शोधन कर, इन्हें परिष्कृत कर। तेरे जीवन काएक एक क्षण मूल्यवान है, प्रति क्षण तेरी आयु घट रही है। यह तुझे फैसला करना है कि जहर पीना है अथवा अमृत पीना है अर्थात आत्मा को पापात्मा बनाना है अथवा पुण्यात्मा बनाना है?
देह से इस जीव को,
लेकर चले उदान।
पापी जाये नरक में,
स्वर्ग में जाय सुजान ।। 1141 ।।
व्याख्या :-मृत्यु के समय आत्मा को ‘उदान’ नाम का प्राण लेकर चलता है। छान्दोग्य उपनिषद में जीवात्मा की तीन गति बतलाई गयी है-एक निष्काम कर्मियों की इसे मोक्ष कहते हैं, दूसरी सकाम कर्मियों की, इसे स्वर्ग कहते हैं, तीसरी मरने जीने वालों की, इसे आवागमन कहते हैं-यही पुनर्जन्म कहलाता है। सरल शब्दों में कहें तो ‘उदान’ नाम का प्राण पुण्य कार्य करने वाली पुण्यात्मा को पुण्यलोक में ले जाता है और पाप करने वाली पापात्मा को पाप-लोक में अर्थात नरक में ले जाता है। दोनों प्रकार के कर्म करने वाली आत्मा को ‘उदान’ मनुष्य लोक में ले जाता है। इसलिए हे मनुष्य! जीवन पर्यन्त सत्पुरूषों की तरह पुण्य कमा ताकि तू पुण्यलोक का गामी बने।
जगद्गुरू स्वामी शंकराचार्य कहते हैं-”समाधि संपन्न योगी सुषुम्ना-नाड़ी की राशियों के द्वारा ‘ब्रह्मरन्ध्र’ के द्वार से निकलकर अर्चि (सूर्य के प्रकाश की किरण) आदि पर्व वाले ‘देवयान’ मार्ग से सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मलोक में पहुंचकर ब्रह्म ही हो जाता है।” देखें, (छान्दोग्य उपनिषद 8-6-6) पाठकों की जानकारी के लिए यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि ”मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर एकत्रित होकर और पंचतन्मात्रिक मण्डल में बंधकर एक अण्डाकृति अथवा ज्योतिर्मय शिव-पिण्ड के समान रूप धारण करके इस शरीर को त्याग देते हैं।”
आत्मविज्ञान पृष्ठ 122
तीन तन उन्नीस मुख,
दिये अंग जीव को सात।
भाव से भी अति सूक्ष्म है,
जो रहता जीव के साथ ।। 1142।।
व्याख्या :-पाठकों की जानकारी के लिए यहां यह अवगत कराना प्रासंगिक रहेगा कि जीवात्मा तो शरीर में किसी भी भाग से आने-जाने की सामथ्र्य रखता है किंतु नूतन देह धारण की प्राकृतिक-प्रक्रिया के अनुसार जीवात्मा 24-25 तत्वों से बनी सेवक-मण्डली से वेष्टित हुआ गर्भ में प्रविष्ट होता है। इसमें प्रकृति, महान अहंकार पंचतन्मात्राएं-ये आठ प्रकृतियां हैं, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां, पांच भूत तथा एक मन ये सोलह विकाररूप चौबीस तत्तव होते हैं किंतु हम तो महान के दो विभाग ‘चित्त’ तथा बुद्घि मानते हैं। इसलिएये सब पच्चीस तत्तव बन जाते हैं। क्रमश:

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