गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज

श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन अब जो कुछ होने जा रहा है उससे क्यारियों में नये फूल खिलने वाले हैं। इन पौधों का समय पूर्ण हो गया है। ये अपने कर्मों का फल पाने के लिए अब अपने आप ही मृत्यु के ग्रास बनकर यहां आ खड़े हुए हैं। समझ कि अपने कर्मफल को पाने के लिए मनुष्य कैसे अपने आप ही मृत्यु के दरबार में पहुंच जाते हैं? ये सारे लोग-जो तुझे युद्घ के मैदान में दिखायी दे रहे हैं और तेरे शत्रु बने खड़े हैं-ये सभी अपने कर्मफल का परिणाम पाने के लिए यहां पहुंचे हैं। तू इन्हें इसी रूप में देख। कुछ देर की ही बात है जब इन सबका घमण्ड चूर-चूर होकर इस कुरूक्षेत्र के मैदान में सिरों के लुढक़ने के रूप में देखा जाएगा। इन्होंने जितनी अनीति, अघायी की थी-वह सब यहां इनकी चीत्कार के रूप में देखी जाएगी। श्रीकृष्णजी की इस बात को हमें आज के सन्दर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। जो लोग आज भी संसार को अनीति से दु:खी कर रहे हैं-उनकी गति भी एक दिन ऐसी ही होगी। यह सत्य है-गीता के इस स्थल का संदेश यही है।
श्रीकृष्णजी की ये बात सुनकर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया और रूंधे हुए कण्ठ से कहने लगा कि-आपका कीर्तन सुनकर सारे राक्षस भाग रहे हैं और सिद्घों का समूह आपको नमस्कार कर रहा है। ऐसा केवल इसलिए हो रहा है कि आप ब्रह्म से भी महान हैं। आप अविनाशी, अविनश्वर हैं, असत है, सत है, सत-असत से परे जो कुछ है-वह भी आप ही हैं। आपके अनन्त रूप हैं। आपके तेज स्वरूप के सामने शत्रु का टिकना असम्भव है। आप वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं-वरूण हैं, चंद्र हैं-आपको बारम्बार नमस्कार है। यहां पर अर्जुन को लगने लगा है कि तूने किसी भी कारण से अब तक श्रीकृष्ण का जो भी अपमान किया (उसे हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा कहकर या सखा के रूप में हंसी मजाक में किये गये किसी असत्कार के रूप में) वह सभी गलत था। इतने महानपुरूष के प्रति मुझे ऐसा अनजाने में भी नहीं करना चाहिए था। उसके लिए वह कहने लगा कि मैं अप्रमेय अनन्त रूप आप से क्षमा मांगता हूं। आप इस चराचर जगत के सर्वाधार हैं, पिता हैं, गुरू हैं और गुरू के भी गुरू हैं। आप जैसा कोई नहीं, आपके सामथ्र्य का जोड़ नहीं है-आप बेजोड़ हैं। अत: मैं साष्टांग होकर आप आराधनीय प्रभु से प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूं कि जैसे पिता अपने पुत्र के और एक मित्र अपने मित्र के व्यवहार को सहन करता है-वैसे ही आप मेरे प्रिय होने के कारण मेरे कल्याण के लिए मेरे व्यवहार को सहन करेंगे।
मैंने जो आपका यह अदृष्ट पूर्व रूप देखा है अर्थात ऐसा रूप देखा है जो कि अब से पूर्व नहीं देखा गया था-उससे मैं हर्ष विभोर हूं। अब आप मुझे अपना पहले जैसा ही रूप दिखाइये अर्थात आप जैसे पहले थे-वैसे ही हो जाओ। मैं आपको अपने निज रूप में चक्रधारी रूप में ही देखना चाहता हूं।
इस पर श्रीकृष्णजी ने अर्जुन से कहा कि मैंने प्रसन्न होकर अपने योग सामथ्र्य से अपना यह तेजोमय, विश्वव्यापी, अनंतमय आदि रूप तुझे दिखाया है। तेरे अतिरिक्त मेरा यह रूप किसी ने नहीं देखा। न वेदों के द्वारा अभ्यास द्वारा, न यज्ञों द्वारा, न शास्त्रों के अध्ययन द्वारा, न दान के द्वारा, न कर्मकाण्ड की क्रियाओं द्वारा, न उग्र तपों द्वारा, न किसी भी व्यक्ति द्वारा, मैं इस रूप में देखा गया हूं। तू मेरे इस रूप को देखकर भयभीत मत हो, अपितु भय को त्यागकर प्रेम से मन को भरपूर करके तू फिर मेरे उसी रूप को देख।
मेरे रूप को देखकर मत होवे भयभीत।
निज धर्म को पहचान ले चाहे मेरी प्रीत।।
श्रीकृष्णजी ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर से अपना सौम्य स्वरूप धारण कर लिया। तब अर्जुन ने कहा कि हे जनार्दन! आपके इस सौम्य और मानवीय रूप को देखकर अब मेरे मन को चैन मिला है। अब मैं अपनी स्वाभाविक मनोदशा में लौट आया हूं, अर्थात अब मुझे तुमसे किसी प्रकार का भय नहीं रहा है, और मैं अपने आपको बहुत ही सहज और हल्का अनुभव कर रहा हूं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति से ही मेरे ऐसे रूप को कोई भक्त देख पाता है। अनन्य भक्ति से ही मुझ में प्रवेश पाना सम्भव है। जो व्यक्ति निर्वैर हो आसक्ति रहित मनोदशा से सारे कार्य मेरे लिए करता है-सब प्राणियों के प्रति दयाभाव रखता है, वह मुझ तक पहुंच जाता है।
इस प्रकरण में आये विशेष शब्द ‘मत्परम:’ का अभिप्राय है कि जो परमेश्वर को परम मानता है। उसके लिए श्रीकृष्णजी कहते हैं कि ‘माम एति’ अर्थात वह मुझको पा जाता है। मदभक्त का अर्थ है मेरी सेवा करने वाला। संग वर्जित का अर्थ है-वह कर्म तो करता है परन्तु कर्म के फल का संग नहीं करता।
इस अध्याय में श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को स्पष्ट किया कि ये जो हमारे चर्मचक्षु हैं ना-ये हमें इस भौतिक संसार को ही दिखाते हैं और हम ये मान बैठते हैं कि वह दिव्य शक्ति परमात्मा कोई और है, और यह संसार कुछ और है। जबकि इस संसार के रूप में ही उस परमात्मा के दर्शन करने का अभ्यास हमें करना चाहिए। ऐसा ही मानना चाहिए। तब प्रत्येक साधक को उस परमात्मा के दर्शन करने की दिव्य दृष्टि अपने आप ही प्राप्त हो जाएगी। जब अर्जुन की चर्म चक्षुओं से अज्ञान का पर्दा हटा तो उसे पता चला कि यह संसार परमात्मा का ही विराट स्वरूप है। उसे पता चल गया कि संसार का जो भी तामझाम उसे दिखायी दे रहा है-वह परमात्मा की दिव्य सत्ता के सहारे चल रहा है उसी पर टिका है।
ऋग्वेद (3 -38-4) में ‘विश्वरूपो अमृतानि तस्यौ’- कहकर और ऋग्वेद (3 -55-19) में ‘देवस्त्वष्टा विश्वरूप: पुयोष’- कहकर उस परमात्मा को विश्वरूप कहा गया है।
अब आते हैं श्रीकृष्णजी द्वारा अर्जुन को विश्वरूप दिखाने की उनकी कला पर। वास्तव में यह उनकी संकल्पशक्ति ही थी-जिससे वह अर्जुन को अपने साथ बांध पाये। जब अर्जुन किसी भी युक्ति से युद्घ के लिए तैयार नहीं हुआ तब श्रीकृष्णजी को कुरूक्षेत्र का रणांगन ही विशाल श्मशान के रूप में उसे दिखाना अनिवार्य हो गया था। संसार में साधारण लोग जब किसी के हांकने से भी उसके साथ नही चलते तो उस समय विवेकशील लोग अपनी कोई विशेष प्रतिभा या संकल्पशक्ति का प्रदर्शन करते हैं। कोई वक्ता जब देखता है कि उसके वक्तव्य के दौरान लोग शोर कर रहे हैं या उसे ध्यान से सुन नहीं रहे हैं-तब वह उन्हें अपने साथ बांधने के लिए अपने भीतर ओज पैदा करता है और अपनी ओजस्वी वाणी के माध्यम से जब वह तर्कपूर्ण वक्तव्य की झड़ी लगाता है तो सभा शान्त हो जाती है। तब सारी सभा का ध्यान उस वक्ता की ओर लग जाता है सभा के लोग अर्जुन की भांति सारी युक्तियां भूल जाते हैं और सारी छक्कड़ी भूल जाते हैं-वे उस वक्ता को मंत्रमुग्ध हो सुनने लगते हैं। तब वह जैसे चाहे उन्हें नचा सकता है, जिन लोगों के भीतर ऐसी कला होती है-वे बिगड़े हुए ‘अर्जुन’ को सीधा कर लेते हैं। सारा देश उनके साथ हो लेता है और कभी-कभी तो सारा संसार ऐसी महान विभूति के पीछे लग लेता है।
क्रमश:

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