गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज

श्रीकृष्णजी को यह स्पष्ट हो गया था कि अब युद्घ अनिवार्य है और अर्जुन ने गांडीव की डींगें हांकते हुए कौरवों को समाप्त करने का संकल्प भी ले लिया पर जब युद्घ की घड़ी आयी तो अर्जुन की मति मारी गयी। अब वह ‘किंकत्र्तव्यविमूढ़’ हो गया। श्रीकृष्णजी नहीं चाहते थे कि देश का राज्य चोर- उचक्कों, छली छदमी लोगों के हाथ लगे। वह चाहते थे कि देश का शासन अच्छे धर्मप्रिय लोगों के हाथ में आये। इसलिए उन्हें अर्जुन को युद्घ के लिए तो तैयार करना ही था। उसके लिए श्रीकृष्ण जी ने बहुतेरा शांत भाषण दे लिया पर अर्जुन का बिगड़ा हुआ घोड़ा सीधा नहीं हुआ। इससे पता चल रहा था कि अर्जुन के बिगड़े हुए घोड़े को सीधा करने के लिए कृष्णजी को अभी कुछ भी पुरूषार्थ करना पड़ेगा।
राजस्थानी में कहावत है कि ऊंट को साधने के लिए तब तक पीटना चाहिए जब तक गैला ना जाए अर्थात चिंघाड़ न भर जाए। बस, यही श्रीकृष्णजी ने किया। उन्होंने ‘विश्व रूप’ दिखाकर अर्जुन को चिंघाड़ भरने के लिए विवश कर दिया। अब अर्जुन सीधा हो गया और कहने लगा कि आप जो चाहेंगे वही करूंगा, पर अपना यह डण्डा विश्वरूप प्रदर्शन का चमत्कार हटा लो।
श्रीकृष्णजी अर्जुन को यही कहलवाना चाहते थे। अब उनका काम बन गया, उनका ओज और तेज अर्जुन पर गहरा प्रभाव डाल गया और उसने शत्रुओं के विनाश के लिए कमर कस ली। अर्जुन समझ गया कि उसका धर्म क्या है और उसे वर्तमान परिस्थितियों में कौन सा और कैसा कार्य करना चाहिए?
गीता का बारहवां अध्याय
जब कोई व्यक्ति किसी की लाख अनुनय विनय पर भी सही बात को न माने और अपनी हठ पर ही अड़ा रहे तो उस समय ऐसी अनुनय विनय करने वाला व्यक्ति उस हठ करने वाले को जिस अंतिम भाषा में बात करता है-उसे ‘धरनी उठावनी’ भाषा कहा जाता है। इसे साहित्यिक शैली में उसका ‘ओजपूर्ण वक्तव्य’ कहा जाता है। यह जो ‘धरनी उठावनी भाषा’ है ना-ये भी ऐसे ओज से भरी होती है कि ‘धरनी’ को ही उठा लेती है अर्थात श्रोता को धरती उलटती पलटती दिखने लगती है। वह भयभीत हो उठता है और जो व्यक्ति अभी उसके सामने अनुनय-विनय कर रहा था, उसके सामने ही वह याचना के स्वर निकालने लगता है। रामचन्द्रजी ने जैसे ही अनुनय-विनय की भाषा त्यागकर ‘धरनी उठावनी भाषा’ का प्रयोग करते हुए समुद्र का विनाश करने का आदेश लक्ष्मण को देते हुए कहा कि लक्ष्मण बाण संभाल और इस समुद्र (एक व्यक्ति जो उस समय उनके सामने खड़ा होकर समुद्र से रास्ता न देने की हठ कर रहा था) को समाप्त कर। अब वही समुद्र उल्टा रामचंद्र जी के सामने याचना करने लगा।
अब अर्जुन भी सही रास्ते पर आ गया। क्योंकि उसे भी श्रीकृष्ण जी ने ‘धरनी उठावनी भाषा’ सुना दी थी। सारी धरनी उठती हुई जब अर्जुन ने देखी तो उसे पसीना आ गया। पिछले अध्याय में हमने ऐसा ही कुछ देेखा था। ‘धरनी उठावनी भाषा’ से अच्छे-अच्छे लोग सही रास्ते पर आ जाते हैं। अर्जुन भी अब सही रास्ते पर था। यहां से आगे यदि गीता के सात अध्याय और रह जाते हैं पर अब अर्जुन के प्रश्न कुछ दूसरे किस्म के बनकर आते है, वह युद्घ से भागने की बात छोड़ देता है।
अब गीता के बारहवें अध्याय पर आते हैं। हर अध्याय की भांति यह अध्याय भी अर्जुन के प्रश्न से ही प्रारंभ होता है।
अर्जुन कहने लगा-‘हे कृष्ण! जो भक्त आपके इस व्यक्त विश्वरूप का निरन्तर ध्यान करते हैं, आपकी उपासना करते हैं और दूसरी ओर जो भक्त आपके अविनाशी अव्यक्त रूप का ध्यान करते हैं-उन दोनों से श्रेष्ठतर किसे माना जाए?’
इस पर श्रीकृष्ण जी ने कहा कि-”जो भक्त लोग अपने मन को मेरे व्यक्त विश्वरूप में स्थिर करके सदा निष्ठापूर्वक मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ योगी मानता हूं।”
व्यक्त विश्वरूप की उपासना का अभिप्राय सगुण या साकार परमेश्वर की विभूतियों की उपासना से है। ईश्वर निराकार है, पर वह अपनी विभूतियों के माध्यम से हमें सगुण दिखायी पड़ता है। सूर्य चन्द्रादि चमकते पदार्थ और पर्वत समुद्र आदि अपौरूषेय निर्माण ईश्वर की विभूति है, इन विभूतियों की उपासना करने का अभिप्राय इन्हें ईश्वर मानना नहीं है अपितु उसकी उत्कृष्ट रचना मानर- इनमें उसका विश्वरूप देखना है और इनकी रचना को मानवता और प्राणिमात्र पर ईश्वर का भारी उपकार मानना है। ऐसी उपासना से सर्वत्र ईश्वर भासने लगता है।
इस उपासना से माता-पिता भी ईश्वर की विभूति ही माने जाते हैं। जो लोग माता-पिता आदि विभूतियों की उपासना को छोडक़र किसी पाषाण की उपासना में लगे रहते हैं-वे श्रीकृष्ण की भावना का अपमान करते हैं। इस प्रकार का उपासक संसार के दीन-हीन मतिहीन लोगों के कल्याण को ही ईश्वर की उपासना समझते हैं। राजा अपनी प्रजा का कल्याण करना अपनी भक्ति मान लेता है, कर्मचारी अपना कार्य निष्ठा से करना अपनी भक्ति मान लेते हैं और अध्यापक आदि अपने-अपने स्थान पर रहते हुए अपने कार्य को पूरी ईमानदारी से करने को अपनी उपासना मान लेते हैं। लोगों की सोच बन जाती है कि मुझे जो कार्य मिला है-उसको सही ढंग से करने से ही ईश्वर मुझे प्रसन्न होंगे। ऐसे उपासक पशु-पक्षी, कीटादि के जीवन का भी सम्मान करते हैं क्योंकि उन्हें इन सबमें भी ईश्वर की सत्ता बोध होता है।
कुल मिलाकर ईश्वर के सगुणोपासक उसके विश्वरूप की उपासना करने वाले लोग दूसरों के जीवन का सम्मान करने के लिए अपने ऊपर अनुशासन बनाकर चलने के अभ्यासी होते हैं। दूसरों का सम्मान करने से व्यक्ति आत्मानुशासित होता है ऐसे लोगों के लिए ही श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि मैं उन्हें श्रेष्ठ योगी मानता हूं।
जो लोग अव्यक्त की उपासना करते हैं उनके विषय में भी श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि वे जितेन्द्रिय और समबुद्घि वाले होने के कारण मुझे ही पाते हैं। इनका मार्ग कठिन साधना का मार्ग है।
अव्यक्त की उपासना करने वालों को श्रीकृष्णजी ने निर्गुण की उपासना करने वाला कहा है। ये लोग भी मन से इस बात को समझते हैं कि इस सृष्टि में प्राण संचार उस परमात्मा के कारण ही हो रहा है। वह प्राणों का भी प्राण है इसलिए उसके भक्त उसमें अपना ध्यान लगाते है और इन्द्रिय संयम व समबुद्घि वाले होकर सब प्राणियों की हितचिंतन में लगे रहते हैं। उन्हें सर्वत्र ब्रह्म की ही अनुभूति होती रहती है। भक्ति में सर्वस्व समर्पण का भाव होता है-अनुभूति जब बढ़ जाती है अर्थात जब सर्वत्र ईश्वर दिखायी देने लगता है तो समर्पण का भाव प्रबल से प्रबलतर होता जाता है। अव्यक्त के उपासक ईश्वर के तेज के धारक हो जाते हैं। प्रभु का तेज सुख वर्षक होता है, क्योंकि वह ऐसी सभी शक्तियों का विनाश करता है जो संसार के प्राणियों को कष्ट पहुंचाने वाली होती हैं। इसीलिए ईश्वर के तेज को सुखवर्षक कहा गया है। अव्यक्त के उपासक को ये तेज एक हथियार के रूप में मिल जाता है और उसका रक्षा कवच बनकर उसकी सदा रक्षा करता है।

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