स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज और गांधीजी

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स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज का नाम आते ही एक अजेय वीर और आर्य योद्धा संन्यासी का चित्र अनायास ही आंखों के सामने आ जाता है। अपनी पराक्रम शक्ति के कारण स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज अंग्रेजों के लिए उस समय सचमुच अजेय हो गए थे। जिन्होंने दिल्ली के चांदनी चौक में एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते हुए अपना सीना अंग्रेजों की संगीनों के सामने तान दिया था और जोरदार शब्दों में अंग्रेजों के पौरुष को ललकारते हुए कहा था कि यदि आपके भीतर साहस है तो चलाओ गोली।
आर्य समाज ने यूं तो अनेक क्रांतिकारी योद्धा भारतीय स्वाधीनता संग्राम को दिए थे पर उन सबमें स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज का नाम सर्वोपरि है। स्वामी जी महाराज ने भारतीय संस्कृति की रक्षा और अपने आदर्शों के सम्मान के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। वह शत्रु के समक्ष झुके नहीं और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर रहे। स्वामी जी महाराज ने हिंदू समाज को जगाने के लिए अनथक प्रयास किया। उन्होंने शुद्धि सभा की स्थापना कर अनेक हिंदू से मुस्लिम बने लोगों की घर वापसी कराई। उनके इस प्रकार के शुद्धि अभियान को गांधी जी और उनकी कांग्रेस ने कभी अपना समर्थन नहीं दिया। मुसलमानों ने उन्हें अपने निशाने पर लिया और अंग्रेजों ने इस ओर से पूर्णतया अपने आपको तटस्थ कर लिया। इसी प्रकार की परिस्थितियों के चलते स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या एक धर्मांध मुसलमान के द्वारा कर दी गई थी। इस प्रकार स्वामी जी की हत्या के लिए गांधी और उनकी कांग्रेस की उपेक्षावृत्ति, मुसलमानों द्वारा उन्हें अपने निशाने पर लिए जाने की धर्मांधता पूर्ण सोच और अंग्रेजों द्वारा उनके लिए व्यापक खतरा होते हुए भी अपने आपको उस खतरे से तटस्थ कर लेने की आपराधिक सोच जिम्मेदार थी।
स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज क्रांतिकारी मार्ग और क्रांतिकारी उपायों के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्ति के समर्थक थे, इसलिए गांधीजी के अहिंसावादी आंदोलन से उनकी अधिक देर तक निभ नहीं पाई। वैसे भी गांधीजी दोगली विचारधारा के व्यक्ति थे और एक आर्य संन्यासी को किसी भी प्रकार का दोगलापन सहन नहीं होता। स्वामी जी महाराज का स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्त्री शिक्षा, दलितोद्धार और गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के प्रति चिंतन गांधी जी के चिंतन के सर्वथा विपरीत था। स्वामी जी महाराज देश व धर्म के बारे में वहां तक सोचते थे जहां तक गांधीजी कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

गांधीजी करते थे आर्य समाज से घृणा

इतिहासकार डॉ. मंगाराम की पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ में इस बात पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है कि गांधीजी को आर्य समाज और आर्य समाज के संन्यासियों व इसके क्रांतिकारियों से बेहद घृणा थी। जिस व्यक्ति को महात्मा कहा जाता हो उसके यहां पर भी घृणा जैसा शब्द यदि स्थान प्राप्त किए हुए रहता है तो निश्चित रूप से उसके महात्मापन पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग ही जाता है। आर्य समाज और आर्य समाजी संन्यासियों के प्रति अपनी घृणा को व्यक्त करते हुए गांधी जी ने एक बार नहीं अनेक बार आर्य समाज की आलोचना की थी।

गांधीजी ने कहा था -‘‘स्वामी श्रद्धानंद पर भी लोग विश्वास नहीं करते हैं। मैं जानता हूँ कि उनकी तकरीरें ऐसी होती हैं जिनसे कई बार बहुतों को गुस्सा आता है। दयानंद सरस्वती को मैं बड़े आदर की दृष्टि से देखता हूँ, पर उन्होंने अपने हिन्दू-धर्म को संकुचित और तंग बना दिया है। आर्य समाज की बाइबिल ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को मैंने दो बार पढ़ा है। यह निराशा और मायूसी प्रदान करने वाली किताब है।’’

स्वामी जी के हत्यारे को कहा ‘भाई’

इससे पता चलता है कि महात्मा गांधी का अपने वैदिक साहित्य के प्रति ज्ञान लगभग शून्य था। राजभक्त गांधी आर्य समाज की राष्ट्रभक्ति को कभी समझ नहीं पाए। यही कारण था कि स्वामी श्रद्धानंद जी जैसे राष्ट्रभक्त के प्रति भी उनके विचार बहुत ही निम्न स्तर के थे। डॉ. मंगाराम इस संबंध में हमें बताते हैं -‘‘स्वामी श्रद्धानंद को 23 दिसम्बर 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने उस समय गोली से मार दिया, जब वे रुग्ण शैया पर पड़े हुए थे। गांधीजी ने स्वामीजी के हत्यारे को ‘प्यारे भाई रशीद’ कहकर सम्बोधित किया। उसके द्वारा की गयी जघन्य हत्या की निन्दा करने के स्थान पर उस हत्यारे के प्रति बरती गयी उदारता क्या गांधी जी की नैतिकता गिरावट को प्रकट नहीं करती? भले ही ब्रिटिश सरकार ने अब्दुल रशीद को फाँसी पर लटका दिया किन्तु उसको बचाने का प्रत्यत्न करने वाले वकील आसफअली गांधीजी के भक्त और कांग्रेस के नेता थे।”
जिस समय स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या की गई थी उस समय गांधी जी कांग्रेस के गुवाहाटी महाधिवेशन में भाग ले रहे थे। ज्ञात रहे कि अपनी मृत्यु से लगभग 4 वर्ष पहले स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज गांधी जी को उनके दोगलेपन के कारण खरी-खोटी सुनाकर छोड़ चुके थे। जिद्दी और लोगों से प्रतिशोध की भावना में जलते रहने वाले गांधी के लिए वह घटना कभी भुलाई नहीं गई थी। वह स्वामी श्रद्धानंद जी के क्रांतिकारी मार्ग के विरोधी थे। यही कारण था कि उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान की घटना पर तपाक से यह कह दिया था कि -‘‘ऐसा तो होना ही था। अब आप शायद समझ गये होंगे कि किस कारण मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा है और मैं पुनः उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी का हत्या का दोषी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी।’’

मुस्लिमों के पक्ष पोषक थे गांधीजी

इस प्रकार गांधीजी ने राष्ट्र द्रोही व्यक्ति का साथ देकर यह सिद्ध किया कि उनके लिए राष्ट्र राष्ट्रवादी लोग और भारतीयता की बातें कोई मायने नहीं रखती हैं। गांधीजी की वैदिक सिद्धांतों में अनास्था थी और वह कई मामलों में कुरान और बाइबिल को भारत के वेदों से उत्तम मानते थे।
गोपाल गोडसे ने गांधी के बारे में अपनी पुस्तक में लिखा है कि मुस्लिम समुदाय को प्रसन्न रखने के लिए गांधीजी किसी भी सीमा तक जा सकते थे। ऐसे गांधी जी की यह विशेषता थी कि जो व्यक्ति या संगठन उनकी हिंदू विरोधी नीतियों में विश्वास नहीं रखता था या उनसे असहमति व्यक्त करता था, उसे वह उपेक्षित करना आरंभ कर देते थे । उसके विनाश के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते थे। आर्य समाज जैसी संस्था पहले दिन से राष्ट्रवादी कार्यों के लिए जानी व समझी जाती थी। आर्य समाज की सोने सी खरी पवित्र विचारधारा और गांधी की विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर था। ऐसे में गांधीजी का आर्य समाज की विचारधारा से पूर्णतया असहमत होना स्वाभाविक था। आर्य समाज के प्रति अपने द्वेष भाव को प्रकट करते हुए उन्होंने सिंध में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगवाने में भी मौन और षड्यंत्र पूर्ण भूमिका निभाई थी। गांधी जी की हिंदू विरोध की नीतियों में स्वामी श्रद्धानंद जी की तनिक भी आस्था नहीं थी। गांधी जी की इस प्रकार की नीतियों को स्वामी जी की ओर से चुनौती दी गई।
उस समय के आर्य समाजियों की यह विशेषता होती थी कि वे अपने आपको हिंदू समाज के सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत करते थे। आर्य को अपनी पहचान रखने के उपरांत भी वे हिंदू समाज से और हिंदू शब्द से घृणा नहीं करते थे। ना ही इस प्रकार की छोटी सोच को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते थे। उस समय तक स्वामी श्रद्धानंद जी जैसे आर्य सन्यासियों पर महर्षि दयानंद जी का हिंदू समाज के प्रति कल्याणकारी चिंतन पूर्ण प्रभाव के साथ हावी प्रभावी था।

ब्रिटिश शासक और कॉन्ग्रेस

ब्रिटिश शासकों ने अपनी सुरक्षा के लिए कांग्रेस की स्थापना अपने एक सेवानिवृत्त अधिकारी ए0 ओ0 ह्यूम के माध्यम से कराई थी। कांग्रेस के जन्म के पीछे ब्रिटिश लोगों को सुरक्षित रखने का भाव कार्य कर रहा था, इसीलिए कांग्रेस के नेता वही बोलते थे जिससे ब्रिटिश नेताओं का हितवर्धन भारतवर्ष में होता रहे। कांग्रेस के नेताओं को वह व्यक्ति संस्था या संगठन बुरा लगता था जो अंग्रेजों को बुरा लगता था। कॉन्ग्रेस ब्रिटिश सत्ताधीशों की मानस पुत्र थी । यही कारण था कि वह अंग्रेजों के अनुसार ही सोचती थी और अंग्रेजों के अनुसार ही कुछ करने का प्रयास करती थी।
यदि बात आर्य समाज की करें तो आर्य समाज के बारे में अंग्रेजों का प्रारंभ से ही कड़ा दृष्टिकोण था । वे इसे एक राजद्रोही संस्था के रूप में जानते थे और इसी रूप में पुकारते थे। 17 दिसंबर 1909 को मि. ग्रे नामक एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपना एक भाषण न्यायालय के समक्ष दिया था। उस समय आर्य समाज को इस ब्रिटिश अधिकारी ने अपने विशेष निशाने पर लिया था। उसने उस समय न्यायालय के समक्ष बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था कि आर्य समाज एक राजद्रोही संस्था है। क्योंकि महर्षि दयानंद ने भी राजद्रोह की शिक्षा अपने आर्य समाजी जनों को दी है। उनका राजद्रोह से अभिप्राय ब्रिटिश हितों के विरुद्ध काम करने से था। आर्य समाज प्रारंभ से ही ब्रिटिश हितों के विरुद्ध काम करने वाली संस्था रही थी। इसलिए इस संस्था को ब्रिटिश अधिकारी और ब्रिटिश शासक अपने लिए सबसे बड़ा शत्रु मानते थे। उपरोक्त ब्रिटिश अधिकारी ने न्यायालय के समक्ष यह भी कहा था कि लाला लाजपत राय इसीलिए राजद्रोही हैं कि वे आर्य समाजी हैं।
यह घटना उस समय की है जब पटियाला रियासत के महाराजा के यहां एक बुड्ढा अंग्रेज अधिकारी रहता था । जिसका नाम बार्बर्टन था। उसने 11 अक्टूबर 1909 को 85 प्रमुख आर्य समाजी जनों के विरुद्ध एक साथ राजद्रोह का अभियोग लगाकर वारंट निकलवा दिए थे। यद्यपि जांच-पड़ताल से ज्ञात हुआ कि इन सभी आर्य समाजियों के पास से ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके।

गांधीजी का आर्य समाज के बारे में दृष्टिकोण

जिस संस्था के प्रति गांधी और उनकी कांग्रेस के आका अंग्रेजों का ऐसा दृष्टिकोण था, उसके नेताओं के प्रति वैसा ही दृष्टिकोण गांधी और उनकी कांग्रेस का होना अनिवार्य था। इसका कारण केवल एक था कि स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज जहां अपने आप में एक राष्ट्रभक्त थे वहीं गांधीजी अपने आप में एक राज भक्त थे। कहने का अभिप्राय है कि गांधी जी और स्वामी श्रद्धानंद जी के बीच राष्ट्रभक्ति और राज भक्ति का विरोध था। स्वामी श्रद्धानंद जी अपने आपमें जो भी कुछ थे , वह अपनी राष्ट्रभक्ति के करण थे और गांधीजी अपने आप में जो भी कुछ थे वह अपनी राजभक्ति के कारण थे। राष्ट्रभक्ति और राज भक्ति दोनों में ३६ का आंकड़ा होता है। यही कारण था कि स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज और महात्मा गांधी के बीच में ३६ का आंकड़ा बन गया था।
स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज कांग्रेस में देश सेवा के लिए गए थे पर जब उन्होंने वहां जाकर देखा कि गांधीजी हिंदू मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करते हुए उनकी चाटुकारिता कर रहे हैं और हिंदू हितों का बलिदान कर रहे हैं तो उनसे यह सहन नहीं हुआ । खिलाफत आंदोलन पर भी वह गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे। गांधीजी ने खिलाफत को देश के लिए अनावश्यक ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। खिलाफत से भारत का कोई लेना-देना नहीं था। यहां तक कि कांग्रेस के मुस्लिम नेता भी इसे बेतुकी बात कहते थे। इसके उपरांत भी गांधीजी ने जिद करके खिलाफत के नाम पर आंदोलन चलाना आरंभ किया। मोपला कांड होने पर जब वहां पर बड़ी संख्या में हिंदुओं का नरसंहार किया गया तो उस पर भी गांधीजी मौन साध गए थे। जबकि उनसे अपेक्षा की जाती थी कि हिंदुओं की रक्षा के संदर्भ में वह मुस्लिम आतंकियों की आलोचना करेंगे।

8 करोड़ दलित और स्वामी जी

उस समय देश के लगभग 8 करोड़ दलितों को मुसलमानों और हिंदुओं में आधा-आधा बांट लेने का प्रस्ताव मुस्लिमों की ओर से आया था । उस पर भी गांधी जी ने कोई कठोर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसके विपरीत वह इस बात पर लगभग सहमत हो गए थे। स्वामी श्रद्धानंद जी जैसे देशभक्त के लिए यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति थी कि देश के दलितों को मुसलमान थोक के भाव में आधा अर्थात 4 करोड़ ले जाएं और बाद में इन्हीं चार करोड़ को अपने ही हिंदू भाइयों के विरुद्ध उकसाकर मारने काटने के लिए प्रेरित करें। गांधीजी उस सच को या तो देखते नहीं थे या उसे देखने का प्रयास नहीं करते थे, जिसे स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज की पारखी नजरें बहुत पहले पहचान लेती थीं। ऐसे प्रस्ताव का क्रियान्वयन होना देश के लिए बहुत बड़ा घाटे का सौदा था। जिसे स्वामी श्रद्धानंद जी कभी भी सहन नहीं कर सकते थे।
स्वामी श्रद्धानंद जी और उन जैसे अन्य आर्य क्रांतिकारी गांधी जी की ऐसी नीतियों का विरोध करते थे जिनसे मुस्लिमों का पक्ष पोषण होता हो और देश के बहुसंख्यक समाज के हितों की हानि होती हो। स्पष्ट है कि गांधीजी की इस प्रकार की मुस्लिम परस्त नीतियों का लाभ मुस्लिम लीग और अंग्रेजों को होता था। यही कारण है कि अंग्रेजों और मुसलमानों का समर्थन आर्य समाज बनाम गांधी के किसी भी प्रकरण में अपने सबसे महान राजभक्त गांधी जी के साथ होता था। अपने लक्ष्य की साधना के लिए और अंग्रेजों को प्रसन्न करने के लिए गांधीजी ने उस समय अनेक आर्य समाजियों पर हमले भी करवाए थे।
जिस कांग्रेस के सबसे बड़े नेता गांधीजी की आर्य समाज के प्रति इस प्रकार की नीति और सोच रही हो, उस कांग्रेस के इतिहासकारों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती थी कि वह आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद जी और उन जैसे अन्य क्रांतिकारियों को इतिहास में उचित स्थान देते?
पर आज हमें अपने इतिहास के पुनर्लेखन के माध्यम से स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज को उचित श्रद्धांजलि देते हुए इतिहास में उनका सम्मानपूर्ण स्थान सुरक्षित करना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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