वैश्विक फलक पर नई पहचान बनाता भारत

नरेंद्र मोदी ने हाल में एक करिश्मा कर दिखाया कि गणतंत्र दिवस पर आसियान समूह में शामिल दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष बुलाकर भारत की क्षमता व सांस्कृतिक विविधता से उन्हें अवगत कराया। यह इस बात का प्रमाण है कि लुक ईस्ट वाली नीति अब एक्ट ईस्ट के रूप में उनके नेतृत्व में परिवर्तित होती जा रही है। चीन, पाकिस्तान व उत्तरी कोरिया का जो त्रिकोण बन रहा है, उस कूटनीति के सामने दक्षिण पूर्व एशिया के दस देशों को बुलाकर खड़े कर देना भी एक कूटनीतिक सफलता है।
विश्व नेतृत्व का परिदृश्य इन दिनों नया आकार व स्वरूप ले रहा है। विश्व को अब केवल पश्चिम ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि पूर्व भी विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा है। चीन, दक्षिण कोरिया व भारत तेजी से विकास कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा व उपलब्धियों के कारण विश्व एक नया स्वरूप अख्तियार कर रहा है। स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक में मोदी के संबोधन के बाद वह चीन व कई अन्य देशों जैसे अनापेक्षित राष्ट्रों से भी सराहना प्राप्त कर रहे हैं। विश्व स्तर पर करवाए गए एक ऑनलाइन सर्वे से पता चलता है कि नरेंद्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी पीछे छोड़ते हुए नंबर एक का दर्जा हासिल कर लिया है। पुतिन व ट्रंप लोकप्रियता में नीचे की ओर चले गए हैं और मोदी विश्व के नंबर एक नेता बन गए हैं। टाइम मैगजीन ने उनकी रेटिंग में इजाफा करते हुए टॉप पोजीशन दी है। ट्विटर ने भी दिखाया है कि विश्व में नरेंद्र मोदी द्वारा प्राप्त ट्वीट्स की संख्या सर्वाधिक है।
यह पहली बार हुआ है कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने विश्व भर में अमरीका, यूरोप व रूस के नेताओं को पछाड़ते हुए इतनी सराहना हासिल की है। कई पत्रकारों व कारपोरेट कंपनियों के मुखिया, जिन्होंने इस कान्फें्रस में भाग लिया, ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों व उनके संबोधन का स्तुतिगान किया। नरेंद्र मोदी ने हिंदी में भाषण दिया और यह विश्व में भारत की उभरती छवि के नए विश्वास का प्रतीक है। स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन जैसे अपने दबंग सुधारों व परिवर्तनकारी मापदंडों को अभिव्यक्त करती यह छवि निश्चय ही नई है। विश्व स्तर पर हाल के दिनों में भारत की ओर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। यह पहली बार है जब उस तरह की भावना पैदा हुई है जैसी कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में पोखरण में परमाणु विस्फोट से पैदा हुई थी।
मुझे अभी भी याद है कि मैं उस समय संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) परियोजनाओं के सिलसिले में पेरिस, ब्रसेल्स व एमस्टर्डम के मध्य यात्रा कर रहा था। मेरी यात्रा के दौरान कई उत्सुक यूरोपीय लोग मेरे पास आए थे और उन्होंने मुझसे देश के इरादों के बारे में जानना चाहा था। वे भारत की बढ़ती क्षमता से प्रभावित हुए लग रहे थे। मुझे याद है कि इससे पहले भारतीयों की कोई परवाह नहीं करता था। जब मैं संयुक्त राष्ट्र व अन्य एजेंसियों के साथ काम करते हुए लंबी-लंबी व निरंतर यात्राएं करता था, तो मैंने इस बात को महसूस किया था। भारत को उस समय अविकसित व परंपरागत समाज के रूप में हेय दृष्टि से देखा जाता था। अटल बिहारी वाजपेयी के मास्टर स्ट्रोक के बाद विश्व ने भारत को देखने के नजरिए में बदलाव किया। अब मोदी के आगमन के बाद यह नजरिया पुख्ता होता जा रहा है और पूरे विश्व में भारत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है। निश्चय ही विश्व के समग्र नजरिए में बड़ा बदलाव आ रहा है।
मैं यह नहीं भूल सकता कि जब नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे, तो मीडिया के अधिकतर लोगों ने उन्हें हल्के ढंग से लिया था और कहा था कि विश्व उन्हें स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि वह अच्छी तरह अंगे्रजी बोलने में भी सक्षम नहीं हैं। इन खामियों के चलते उन्हें दूसरे देशों का वीजा भी नहीं मिलेगा तथा कूटनीति को वह कैसे संचालित करेंगे? मोदी ने बहुत कुछ सीखा और इस बार दावोस में उन्होंने भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिकतावाद पर प्रखर भाषण दिया तथा भविष्य के विश्व की रूपरेखा भी बयां की। उन्होंने विश्व भर के देशों के मुखिया को आमंत्रण देते हुए कहा कि वे भारत में स्वास्थ्य के लिए आएं, धन के लिए आएं और शांति के लिए आएं। विश्व को उनका यह आमंत्रण सचमुच ही विलक्षण है। उन्होंने विश्व को याद दिलाया कि वसुधैव कुटुंबकम की व्याख्या उपनिषदों में हुई है, जिसके अनुसार पूरा विश्व ही एक परिवार है।
दावोस से स्वदेश लौटने के बाद विपक्ष ने न केवल उनकी यत्र-तत्र आलोचना की, बल्कि पे्रस के एक वर्ग में उन्हें गालियां तक दी गईं। विपक्ष के कुछ नेताओं ने प्रेस में उन पर अभद्र टिप्पणियां कीं। इससे पहले कभी भी किसी भारतीय राजनेता ने प्रधानमंत्री के प्रति ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया था, जैसा कि पिछले दिनों किया गया। इसके बावजूद भारत में हुए सभी पब्लिक सर्वेक्षणों व ओपिनियन बताते हैं कि मोदी अभी भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। अब सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र बहुमत से चलता है अथवा कुछ पत्रकारों व राजनेताओं के मतों के अनुसार?
आश्चर्यजनक रूप से जिम्मेदार नेता भी यह विश्वास करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं कि सब कुछ अव्यवस्थित है और अर्थव्यवस्था बड़े संकट में है, जबकि विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने देश का भविष्य उज्ज्वल होने के संकेत दिए हैं। अंशत: नरेंद्र मोदी ने स्वयं एक स्थिति पैदा की है कि पत्रकार देश की काली तस्वीर चित्रित कर रहे हैं।
नरेंद्र मोदी ने पहले ही अभिजात्य वर्ग के मीडिया कर्मियों को अपने साथ विदेश ले जाने और उन्हें ऐश्वर्य की सभी सुविधाएं देने पर पाबंदी लगा दी है। इसके अलावा वह लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क में विश्वास रखते हैं और इस अवधारणा के अनुरूप काम भी कर रहे हैं।
इससे यह आम संदेश गया है कि जो लोग जनता से संपर्क के लिए होते हैं, उन्हें किनारे किया जा रहा है। वह निरंतर रूप से लोगों से प्रत्यक्ष रूप से मिलते हैं और रेडियो को एक प्रभावकारी हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने हाल में एक और करिश्मा कर दिखाया कि गणतंत्र दिवस पर आसियान समूह में शामिल दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष बुलाकर भारत की क्षमता व सांस्कृतिक विविधता से उन्हें अवगत कराया। यह इस बात का प्रमाण है कि लुक ईस्ट वाली नीति अब एक्ट ईस्ट के रूप में उनके नेतृत्व में परिवर्तित होती जा रही है। चीन, पाकिस्तान व उत्तरी कोरिया का जो त्रिकोण बन रहा है, उस कूटनीति के सामने दक्षिण पूर्व एशिया के दस देशों को बुलाकर खड़े कर देना भी एक कूटनीतिक सफलता है। अब पद्मावत का विवाद खत्म हो गया है, बजट सत्र शुरू हो चुका है। कई कारणों से छाए सन्नाटे को चीरने व विपक्ष से निपटने के लिए उनके पास अब सही मौका है।

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