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अच्छे जीवन की चाहत से धोखा

मनीषा सिंह
हमारे समाज में यह ग्रंथि लंबे समय से बनी हुई है कि विदेश का मतलब जीवन से लेकर हर चीज में गुणवत्ता की गारंटी है। हजारों परिवारों में यह चाहत दिखाई देती है कि काश, उनकी लडक़ी की शादी विदेश में बसे किसी भारतीय से हो जाए। लेकिन इस सपने की सच्चाई यह है कि हर साल सैकड़ों की संख्या में एनआरआइ दूल्हे धोखाधड़ी करते हैं। एनआरआइ दूल्हे के नाम पर बेमेल और झूठ की बुनियाद पर टिकी शादियां कराई जाती रही हैं। पिछले तीन साल के आंकड़े देखें तो दिल्ली की लड़कियों को एनआरआइ दूल्हों ने सबसे अधिक धोखे दिए हैं। शादी करके दुल्हनों को अपने साथ विदेश न ले जाना, विदेश ले जाकर उनसे घरेलू आया यानी मेड आदि के काम कराना या फिर शादी के बाद पता लगना कि एनआरआइ दूल्हे ने तो पहले से ही विदेश में शादी कर रखी है, जैसे मामले सामने आते रहे हैं। हाल में राष्ट्रीय महिला आयोग को विभिन्न राज्यों की पुलिस से जो आंकड़े मिले हैं, उनमें यह तथ्य उजागर हुआ है कि दिल्ली में पिछले तीन वर्षों में एनआरआइ दूल्हों द्वारा की गई धोखाधडिय़ों की संख्या में अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा इजाफा हुआ है।
यह भी उल्लेखनीय है कि धोखाधड़ी करने वाले एनआरआइ दूल्हों में से उनकी संख्या ज्यादा है जो अमेरिका में बसे हुए हैं। पता लगा है कि अमेरिका-वासी एनआरआइ दूल्हों ने पिछली अवधि में दिल्ली व अन्य राज्यों में आकर भारतीय लड़कियों से शादी की, उन्हें अमेरिका ले गए लेकिन वहां ले जाकर उनके साथ दुव्र्यवहार किया। कई मामलों में भारतीय दुल्हनों को घरेलू नौकरानी बना कर रख लिया गया तो कुछ लड़कियों से सिर्फ इसलिए शादी की गई, ताकि पहली शादी से हुए बच्चों का लालन-पालन करने में सहूलियत हो सके। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए जब लड़कियों को एनआरआइ लडक़े शादी करने के बाद अपने साथ लेकर नहीं गए। अमेरिकी एनआरआइ दूल्हों के बाद ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के दूल्हों का नंबर आता है, जिन्होंने भारतीय लड़कियों से शादी के मामले में कई दिक्कतें पैदा कीं। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि भारतीय महिलाएं अच्छे जीवन की चाह में विदेशी जमीन पर बसे या काम कर रहे दूल्हे से शादी के बाद होने वाली धोखाधड़ी की घटनाओं से बुरी तरह त्रस्त रही हैं।
ऐसे मामलों की व्यापक पड़ताल के लिए गठित गोयल समिति ने एनआरआइ दूल्हों को ब्याही हिंदुस्तानी लड़कियों की तकलीफों का अध्ययन कर वर्ष 2016 में अपनी रिपोर्ट सरकार को दी थी, जिसमें पत्नी के साथ ज्यादती करने वाले एनआरआइ दूल्हों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के प्रावधान की सिफारिश की गई थी। ध्यान रखना होगा कि ऐसी ज्यादातर शादियों में विदेश में बसे एनआरआइ दूल्हे इस बात को लेकर आश्वस्त रहते हैं कि वे अपनी भारतीय पत्नी के साथ कैसा भी सलूक करें, भारत सरकार उनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकती। सामाजिक दबावों के चलते ऐसे ज्यादातर मामलों को आपसी सहमति से दबा दिया जाता है, फिर भी राष्ट्रीय महिला आयोग को मिल रही शिकायतों से स्पष्ट है कि बढ़ती जागरूकता महिलाओं को मुंह सिल कर और अपनी नियति मान कर खामोश नहीं रहने दे रही है।
गोयल समिति ने सुझाव दिया था कि भारत से ब्याह कर पत्नी को विदेश ले जाने के बाद उससे बदसलूकी करने वाले एनआरआइ दूल्हे का पासपोर्ट रद््द कर उसे भारत वापस भेजा जाना चाहिए। इसके लिए कानूनी प्रावधान किए जाएं। वैसे तो पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) में पहले से ही यह व्यवस्था है कि किसी भी मामले में एफआइआर दर्ज होने पर या अदालत से निर्देश मिलने पर एनआरआइ दूल्हे का पासपोर्ट जब्त किया जा सकता है, लेकिन इस कानूनी प्रावधान का शायद ही कभी इस्तेमाल हुआ हो। इसकी वजह यह है कि कई बार न तो आरोपी के पासपोर्ट के पर्याप्त विवरण उपलब्ध होते हैं और न ही पता सही तरह से मालूम चलता है।
यही वजह है कि गोयल समिति ने एनआरआइ शादी के मामलों में हर विवाह का अनिवार्य पंजीकरण करने और पासपोर्ट, कार्यस्थल, आवास का पूरा पता दिए बगैर शादी ही पंजीकृत नहीं करने की सलाह दी थी।
गोयल समिति के सुझावों से पहले इस मामले में खुद सरकार ने भी कुछ पहलकदमी की थी। जैसे, वर्ष 2015 में हमारी सरकार ने आप्रवासी भारतीय दूल्हों की धोखाधड़ी की शिकार भारतीय दुल्हनों की मदद के लिए एक उच्चस्तरीय संयुक्तसमिति गठित की थी, जिसे इस संबंध में एक ऐसी मानक व्यवस्था बनाने का काम दिया गया था जो विदेशी जमीन पर प्रताडि़त हो रही भारतीय महिलाओं को राहत दिलाए। इस तंत्र में उन बिचौलियों और ऑनलाइन वेबसाइटों पर भी अंकुश रखने का प्रबंध किया गया था, जो विदेश में शादी कराने के नाम पर खुद तो चांदी कूटती हैं, लेकिन धोखाधड़ी होने की सूरत में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं।
इसके अलावा सरकार ने विदेश मामलों, गृह, विधि और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों को साथ रखते हुए एक प्रचालन व्यवस्था बनाने की पहल की थी जो ऐसी महिलाओं को न्याय दिला सकती है।
इसके लिए सरकार ने सैंतालीस साल पुराने विदेशी विवाह अधिनियम 1969 के संदर्भ टटोले थे, जिसमें आप्रवासी दूल्हों को ब्याही गई महिलाओं को होने वाली मुश्किलों की स्थिति में सरकार की ओर से सहायता का प्रावधान है। इस अधिनियम की धारा 14 के तहत विवाह प्रमाण रजिस्टर में बाकायदा दंपति के साथ तीन गवाहों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, जिन्हें विवाह अधिकारी द्वारा सत्यापित किए जाने का प्रावधान है।
चूंकि पहले ज्यादातर शादियां पारिवारिक मित्रों, पंडितों और जान-पहचान के दायरे में काम करने वाले बिचौलियों के जरिये संपन्न कराई जाती थीं, ऐसे में धोखाधड़ी प्राय: नहीं होती थी। लेकिन इधर जब से शादी कराना एक कारोबार हो गया है और लड़कियों में विदेश में बसने की चाह बढ़ी है, विज्ञापनों के माध्यम से होने वाले वैवाहिक संबंध बढ़े हैं। अकसर ऐसे रिश्तों में पर्याप्त छानबीन नहीं हो पाती है। चूंकि सारा मामला पैसे, विदेश में ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी और एनआरआइ दूल्हे की ख्वाहिश से जुड़ा होता है, ऐसे में धोखाधड़ी की भरपूर आशंकाएं रहती हैं।
एनआरआइ शादी के मामले में कड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत क्यों पड़ रही है, इसके लिए ज्यादा गहरी पड़ताल करने की जरूरत नहीं है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि एशियाई देशों से वहां जाकर बसे लोगों ने भौतिकता के मामले में तो काफी तरक्की कर ली है, लेकिन वे यहां से ले जाए गए बुरे रिवाजों और सामाजिक कुरातियों की मानसिकता से पिंड नहीं छुड़ा पा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका या किसी और विकसित मुल्क में रहते हुए भी वे न तो शादी-ब्याह जैसे मामलों में जाति-गोत्र देखने की जिद में पीछे हैं और न ही परिवारों में पीढिय़ों से चली आ रही दूषित परंपराओं का पालन करने के मामले में। एक ओर ये परिवार अपने बच्चों पर जबरन शादी थोपते हैं, तो दूसरी ओर यदि कोई नौजवान अपनी मर्जी से शादी करने की गुस्ताखी करता या करती है, तो उस पर जुल्म ढाए जाते हैं। ब्रिटेन में कई युवाओं, खासतौर से लड़कियों की हत्या परिवार वालों ने की है और इन मामलों को वहां के मीडिया ने पिछले कुछ वर्षों में खूब उछाला है। जरूरी है कि भारत खुद भी विदेश में शादी रचा रही महिलाओं की समस्याओं को सुलझाने के लिए कठोर कायदे-कानून बनाए और उन्हें सख्ती से लागू कर।

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