ब्रांड मोदी का नहीं है कोई विकल्प, समझिये गुजरात चुनाव से मिले कुछ बड़े संदेशों को

India's Prime Minister Narendra Modi

गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल कर 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अपना दावा तो मजबूत किया ही है साथ ही यह भी साबित किया है कि किसी भी अन्य पार्टी के पास ब्रांड मोदी का कोई विकल्प नहीं है। इन चुनावों ने यह भी दर्शाया कि प्रधानमंत्री मोदी जैसी मेहनत और अमित शाह जैसी रणनीति कामयाब भी होती है और नये नये रिकॉर्ड भी बनाती है। गुजरात में प्रचंड जीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने बिल्कुल सही कहा कि गुजरात की जनता ने रिकॉर्डों को तोड़ने का भी रिकॉर्ड बना दिया है। बहरहाल, गुजरात चुनाव परिणाम के विश्लेषण के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आये जोकि इस प्रकार हैं-

भाजपा के पाले में क्यों लौटे पाटीदार?

गुजरात में आरक्षण आंदोलन की पृष्ठभूमि में 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ मतदान करने वाला पाटीदार समुदाय 2022 के चुनावों में सत्ताधारी दल के साथ लौट आया और इस समुदाय के प्रभुत्व वाली अधिकांश सीटों को जीतने में मदद की। भाजपा ने राज्य के पाटीदार बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, लगभग हर सीट पर जीत हासिल की है जहां पटेलों की अच्छी खासी आबादी है। सौराष्ट्र क्षेत्र में कांग्रेस ने 2017 में मोरबी, टंकरा, धोराजी और अमरेली की पाटीदार बहुल सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, ये सभी विधानसभा क्षेत्र इस बार भाजपा की झोली में गए। पाटीदार बहुल सूरत में, जहां आम आदमी पार्टी कुछ सीटों को हासिल करने के लिए समुदाय पर निर्भर थी, वहां इस समुदाय ने बड़े पैमाने पर सत्ताधारी दल का समर्थन किया। पार्टी ने वराछा रोड, कटारगाम और ओलपाड की पाटीदार सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की। उत्तर गुजरात में, कांग्रेस ने पांच साल पहले पाटीदार बहुल उंझा सीट जीती थी, लेकिन इस बार वह भाजपा से हार गई।

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2022 के चुनाव से पहले पटेल समुदाय तक पहुंच बनाई। सितंबर 2021 में पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री विजय रूपानी की जगह भूपेंद्र पटेल को नियुक्त किया। सत्तारुढ़ दल पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेस से अपने पाले में ले आया और उन्हें वीरमगाम विधानसभा सीट से मैदान में उतारा, जहां से उन्होंने भारी अंतर से जीत हासिल की। राज्य और केंद्रीय स्तर पर भाजपा का सबसे बड़ा कदम जिसने समुदाय को खुश किया, वह ‘‘उच्च जातियों’’ के बीच गरीबों (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग या ईडब्ल्यूएस) को नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत कोटा देना रहा। 2017 के चुनाव समुदाय के लिए ओबीसी का दर्जा हासिल करने के लिए शुरू किए गए हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाले कोटा आंदोलन की छाया में लड़े गए थे।

समुदाय के अनुमान के अनुसार, गुजरात में लगभग 40 सीटें ऐसी हैं जहां पाटीदार मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ये सीटें राज्य के ग्रामीण और शहरी इलाकों में फैली हुई हैं। हालांकि पटेल समुदाय गुजरात की आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा है लेकिन 2017 में 44 पाटीदार विधायक चुने गए जो गुजरात में चुनावी राजनीति पर उनके प्रभाव को दिखाता है। सौराष्ट्र क्षेत्र में पाटीदार मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या वाली कुछ सीटों में मोरबी, टंकारा, गोंडल, धोराजी, अमरेली, सावरकुंडला, जेतपुर, राजकोट पूर्व, राजकोट पश्चिम और राजकोट दक्षिण शामिल हैं। जबकि उत्तरी गुजरात में विजापुर, विसनगर, मेहसाणा और उंझा सीटों में पाटीदार मतदाताओं की काफी संख्या है, अहमदाबाद शहर की कम से कम पांच सीटों- घाटलोडिया, साबरमती, मणिनगर, निकोल और नरोदा- को भी पटेल बहुल क्षेत्र माना जाता है।

दक्षिण गुजरात में, सूरत जिले की कई सीटों को पाटीदारों का गढ़ माना जाता है, जिनमें वराछा, कामरेज, कटारगाम और सूरत उत्तर शामिल हैं। 2022 के चुनावों के लिए भाजपा ने 41 पाटीदारों को टिकट दिया था, जो कांग्रेस की संख्या से एक अधिक था। आप ने भी समुदाय से बड़ी संख्या में सदस्यों को टिकट दिया था। समुदाय को खुश रखने के लिए, भगवा संगठन ने यह भी घोषणा की थी कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को इस पद पर बनाए रखा जाएगा।

गुजरात में आप ने कांग्रेस को पहुंचाया नुकसान

आम आदमी पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में पांच सीट पर जीत हासिल की और 13 फीसदी मत हासिल किये। उसका यह प्रदर्शन उसके द्वारा किये गये जोरदार चुनाव प्रचार एवं उसके दावों के बिल्कुल अनुकूल नहीं है, लेकिन उसके लिए राष्ट्रीय पार्टी बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया। अभियान के दौरान आप ने अपने और पार्टी संयोजक केजरीवाल को क्रमश: भाजपा एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एकमात्र चुनौती देने वाले के रूप मे पेश किया था। लेकिन मतगणना में सामने आया कि पार्टी विपक्षी मतों को बांटने एवं भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाने में ही कामयाब रही। वह राज्य में कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका से हटाने में भी विफल रही। हालांकि, पार्टी की गुजरात इकाई के अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने अपनी पार्टी के प्रदर्शन को ‘भाजपा के गुजरात गढ़ में शानदार प्रवेश’ बताया।

कांग्रेस का अल्पसंख्यक वोट विभाजित

आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की अगुआई वाली ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने गुजरात विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों के वोट में सेंध लगाते हुए राज्य की विभिन्न सीट पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मतों के अंतर को काफी कम कर दिया। अल्पसंख्यक, मुख्य रूप से मुस्लिम पिछले कई दशकों से खासकर 2002 के गोधरा दंगों के बाद से कांग्रेस के वफादार मतदाता रहे हैं।

बिलकीस बानो फैक्टर काम नहीं आया

भाजपा ने गुजरात के दाहोद जिले की लिमखेड़ा विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की, जहां कभी 2002 के दंगों की पीड़िता बिलकीस बानो रहा करती थीं। बिलकीस बानो सामूहिक दुष्कर्म मामले में भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा 11 दोषियों की सजा माफी को रद्द करने का वादा करने वाली विपक्षी कांग्रेस के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। बिलकीस बानो आदिवासी बहुल दाहोद जिले के रंधिकपुर गांव में रहा करती थीं। भाजपा विधायक शैलेश भाभोर ने अपने करीबी प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी के नरेश बारिया को लगभग 4,000 मतों के अंतर से हराया। कांग्रेस उम्मीदवार 8,000 से थोड़े अधिक मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

मंत्री समेत भाजपा के सात विधायकों को शिकस्त

गुजरात के एक मंत्री समेत पार्टी के सात मौजूदा विधायकों को शिकस्त का सामना करना पड़ा है। बनासकांठा जिले की कांकरेज सीट से विधायक और प्राथमिक, माध्यमिक एवं प्रौढ़ शिक्षा राज्य मंत्री कीर्तिसिंह वाघेला कांग्रेस की गुजरात इकाई के अध्यक्ष जगदीश ठाकोर के भाई और कांग्रेस के अमृतजी ठाकोर से हार गए। भाजपा ने इस चुनाव में अपने लगभग 40 मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया था। पूर्व कैबिनेट मंत्री और पाटन जिले की चानस्मा सीट से मौजूदा विधायक दिलीप ठाकोर कांग्रेस के दिनेश ठाकोर से करीब 1,300 मतों के मामूली अंतर से हार गए। एक अन्य पूर्व कैबिनेट स्तर के मंत्री बाबू बोखिरिया पोरबंदर सीट पर कांग्रेस के अर्जुन मोधवाडिया से हार गए। विजापुर के विधायक रमन पटेल और खंभात के मौजूदा विधायक महेश रावल भी कांग्रेस प्रतिद्वंद्वियों से हार गए। आश्चर्यजनक परिणाम में भावनगर जिले की गरियाधर सीट से छह बार के विधायक केशु नाकरानी आम आदमी पार्टी के सुधीर वघानी से हार गए। वाघोडिया सीट से भाजपा विधायक मधु श्रीवास्तव पार्टी के टिकट से वंचित होने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार थीं, वह भी हार गईं और तीसरे स्थान पर रहीं। एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार धर्मेंद्रसिंह वाघेला, जो भाजपा के बागी भी हैं, वाघोडिया सीट पर जीत गए, जबकि भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार अश्विन पटेल दूसरे स्थान पर रहे।

‘नोटा’ के तहत पड़े वोट हिस्सेदारी घटी

गुजरात विधानसभा चुनाव में ‘नोटा’ के तहत पड़े वोट की हिस्सेदारी 2017 की तुलना में नौ प्रतिशत से अधिक घट गई है, इस बार खेड़ब्रह्मा सीट पर सबसे अधिक 7,331 वोट ‘नोटा’ पर पड़े हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में इस चुनाव में 5,01,202 यानी 1.5 प्रतिशत वोट ‘नोटा’ के थे, जो 2017 के विधानसभा चुनाव में 5,51,594 से कम हैं। खेड़ब्रह्मा सीट पर सबसे ज्यादा 7,331 वोट ‘नोटा’ पर पड़े, उसके बाद दांता में 5,213 और छोटा उदयपुर में 5,093 वोट पड़े। देवगढ़ बारिया सीट पर 4,821, शेहरा पर 4,708, निझर पर 4,465, बारडोली पर 4,211, दस्करोई पर 4,189, धरमपुर पर 4,189, चोर्यासी पर 4,169, संखेड़ा पर 4,143, वडोदरा सिटी पर 4,022 और कपराडा पर 4,020 वोट ‘नोटा’ पर पड़े।

25 सीट पर बड़े अंतर से जीत हासिल की

भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव में 156 सीट पर विजेता घोषित होकर न सिर्फ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, बल्कि बड़े अंतर से अच्छी-खासी संख्या में सीट हासिल कर कुछ और रिकॉर्ड भी तोड़े। घाटलोडिया और चोरयासी दो सीट पर जीत का अंतर दो लाख के करीब रहा। घाटलोडिया से लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए जीतने वाले मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 1.92 लाख से अधिक मतों से हराया। आठ सीट पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत का अंतर एक लाख से डेढ़ लाख वोट के बीच रहा। गुजरात में आरक्षण आंदोलन की पृष्ठभूमि में 2017 के विधानसभा चुनाव में पाटीदार समुदाय के एक वर्ग ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया था। लेकिन अब इस समूह का मतदाता इस चुनाव में सत्तारुढ़ पार्टी की ओर लौट आया है।

सौराष्ट्र क्षेत्र में कांग्रेस ने 2017 में मोरबी, टंकारा, धोराजी और अमरेली की पाटीदार बहुल सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, ये सभी विधानसभा क्षेत्र इस बार भाजपा की झोली में गए। पाटीदार बहुल सूरत में जहां आम आदमी पार्टी (आप) कुछ सीट हासिल करने के लिए समुदाय पर निर्भर थी, लेकिन समूह ने बड़े पैमाने पर सत्ताधारी दल का समर्थन किया। सत्तारुढ़ पार्टी पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेस से अपने पाले में लाई और उन्हें वीरमगाम विधानसभा सीट से मैदान में उतारा, जहां से उन्होंने भारी मतों के अंतर से जीत हासिल की।

बहरहाल, यह भी कहा जा सकता है कि गुजरात में बिखरे विपक्षी खेमे के खिलाफ हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास की बुनियाद पर भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड जीत हासिल की है। गुजरात के नतीजे भाजपा के लिए बहुत सकारात्मक माने जा रहे हैं और पार्टी नेताओं का मानना है कि राज्य में उसके ‘राष्ट्रीय’ एजेंडे ने काम किया। यह नतीजे दर्शाते हैं कि शासन और विचारधारा के व्यापक मुद्दों पर लोग मोदी और भाजपा पर किसी अन्य पार्टी के मुकाबले ज्यादा विश्वास करते हैं।

–गौतम मोरारका

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