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कमजोरों की अनदेखी करते रहने से समाज का कभी भला नहीं हो सकता

हर रिश्ते को संवेदना से जीने के लिये जरूरी है प्रेम एवं विश्वास। प्यार एवं विश्वास दिलों को जोड़ता है। इससे कड़वे जख्म भर जाते हैं। प्यार की ठंडक से भीतर का उबाल शांत होता है। हम दूसरों को माफ करना सीखते हैं। इनकी छत्रछाया में हम समूह और समुदाय में रहकर शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। लेखिका रोंडा बायन कहती हैं कि जितना ज्यादा हो सके हर चीज, हर व्यक्ति से प्यार करें। ध्यान केवल प्यार पर रखें। पाएंगे कि जो प्यार आप दे रहे हैं, वह कई गुणा बढ़कर आप तक लौट रहा है। हम समाज में एक साथ तभी रह पाते हैं जब वास्तविक प्रेम एवं संवेदना को जीने का अभ्यास करते हैं। उसका अभ्यास सूत्र है-साथ-साथ रहो, तुम भी रहो और मैं भी रहूं। या ‘तुम’ या ‘मैं’ यह बिखराव एवं विघटन का विकल्प है। ‘हम दोनों साथ नहीं रह सकते’ यह नफरत एवं द्वेष का प्रयोग है। विरोध में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। जो व्यक्ति दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करना नहीं जानता, वह परिवार एवं समाज में रह कर शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता।

दूसरों के साथ हमारे रिश्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है अहंकार। यह बड़ी चतुराई से अपनी जगह बनाता है। अहंकारी अपने फायदे के लिए ही दूसरों के पीछे भागता है। बड़ों से संबंध जोड़ता है और छोटों एवं कमजोर की अनदेखी कर देता है। प्रेम हंसाता है तो अहंकार चोट पहुंचाता रहता है। अहंकार गले लगाकर भी दूसरे को छोटा ही बनाए रखता है। यह केवल दूसरों से पाने की चाह रखता है। जब हम अपने हिस्से में से दूसरों को भी देना सीख जाते हैं और अपनी खुशियां दूसरों के साथ बांटना सीख जाते हैं तो जीवन एक प्रेरणा बन जाता है। पारिवारिक एवं सामाजिक शांति के लिए सहिष्णुता के साथ विनय और वात्सल्य भी आवश्यक है। आज का पढ़ा लिखा आदमी विनम्रता को गुलामी समझता है। उसका यह चिंतन अहंकार को बढ़ा रहा है। विनय भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व रहा है। जिस परिवार एवं समाज में विनय की परंपरा नहीं होती, उसमें शांतिपूर्ण जीवन नहीं हो सकता। एक विनय करे और दूसरा वात्सल्य न दे तो विनय भी रूठ जाता है। वात्सल्य मिलता रहे और विनय बढ़ता रहे तो पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में शांति का संचार बना रहता है। सामंजस्य, समझौता, व्यवस्था, सहिष्णुता, विनय और वात्सल्य इन्हें जीवन में उतारें तभी पारिवारिक एवं सामाजिक शांति बनी रहेगी।

यह बड़ा सत्य है कि स्वार्थी एवं संकीर्ण समाज कभी सुखी नहीं बन सकता। इसलिए दूसरों का हित चिंतन करना भी आवश्यक होता है और उदार दृष्टिकोण भी जरूरी है। इसके लिए चेतना को बहुत उन्नत बनाना होता है। अपने हित के लिए तो चेतना स्वतः जागरूक बन जाती है, किन्तु दूसरों के हित चिंतन के लिए चेतना को उन्नत और प्रशस्त बनाना पड़ता है। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसका कारण है मनुष्य की स्वार्थ चेतना। स्वार्थ की भावना बड़ी तीव्र गति से संक्रान्त होती है और जब संक्रान्त होती है तो समाज में भ्रष्टाचार, गैरजिम्मेदारी एवं लापरवाही बढ़ती है। हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है। संसार में किसी के लिए भेदभाव नहीं है। जिस प्रगति में सहजता होती है, उसका परिणाम सुखद होता है। किसी को गिराकर या काटकर आगे बढ़ने का विचार कभी सुखद नहीं होता, काटने का प्रयास करने वाला स्वयं कट जाता है।

प्रगतिशील समाज के लिये प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धा के साथ ईर्ष्या जुड़ जाती है तो वह अनर्थ का कारण बन जाती है। संस्कृत कोश में भी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा में थोड़ा भेद किया गया है, पर वर्तमान जीवन में प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या का पर्यायवाची बन गई है। उसके पीछे विभिन्न भाषाओं में होने वाला गलाकाट विशेषण का प्रयोग इसी तथ्य की ओर संकेत करता है। ईर्ष्यालु मनुष्य में सुख का भाव दुर्बल होता है। उसकी इस वृत्ति के कारण वह निरंतर मानसिक तनाव में जीता है। उसके संकीर्ण विचार और व्यवहार से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में टकराव और बिखराव की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। आचार्य श्री तुलसी ने ईर्ष्या को असाध्य मानसिक व्याधि के रूप में प्ररूपित किया है, जिसका किसी भी मंत्र-तंत्र, जड़ी-बूटी व औषधि से चिकित्सा संभव नहीं है। ईर्ष्यालु मनुष्य स्वयं तो जलता ही है, दूसरों को जलाने का प्रयास भी करता है।

स्वामी रामतीर्थ ने ब्लैकबोर्ड पर एक लकीर खींची तथा कक्षा में उपस्थित छात्रों से बिना स्पर्श किए उसे छोटी करने का निर्देश दिया अधिकतर विद्यार्थी उस निर्देश का मर्म नहीं समझ सके। एक विद्यार्थी की बुद्धि प्रखर थी। उसने तत्काल खड़े होकर उस लकीर के पास एक बड़ी लकीर खींच दी। स्वामी रामतीर्थ बहुत प्रसन्न हुए। उनके प्रश्न का सही समाधान हो गया। दूसरी लकीर अपने आप छोटी हो गई। उन्होंने उस विद्यार्थी की पीठ थपथपायी और उसे आशीर्वाद दिया। रहस्य समझाते हुए उन्होंने कहा- अपनी योग्यता और सकारात्मक सोच से विकास करते हुए बड़ा बनना चाहिए। किसी को काटकर आगे बढ़ने का विचार अनुचित और घातक है।

तरक्की की यात्रा अकेले नहीं हो सकती। जरूरी है कि आप अपने साथ दूसरों को भी आगे ले जाएं। उनके जीवन पर अच्छा असर डालें। इसके लिए बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं होती। कितनी ही बार आपकी एक हंसी, एक हामी, छोटी-सी मदद दूसरे का दिन अच्छा बना देती है। अमेरिकी लेखिका माया एंजेलो कहती हैं, ‘जब हम खुशी से देते हैं और प्रसाद की तरह लेते हैं तो सब कुछ वरदान ही है।’ सामुदायिक चेतना और सकारात्मकता का विकास हो, सबका प्रशस्त चिंतन हो, स्वयं और समाज के संदर्भ में तब कहीं जाकर समाज का वास्तविक विकास होता है। आज राष्ट्र का और पूरे विश्व का निरीक्षण करें, स्थिति पर दृष्टिपात करें तो साफ पता चल जाएगा कि लोगों में स्वार्थ की भावना बलवती हो रही है।

जब तक आप दिमाग से संचालित होते हैं, आपको सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का एहसास हो सकता है, लेकिन वह सच्चा प्रेम नहीं होता। मसलन- हममें से ज्यादातर लोगों ने अपने जीवन में महसूस किया होगा कि उन्हें प्यार हो गया है। लेकिन वास्तव में एक-दो लोग ही होते हैं, जो सचमुच प्यार में होते हैं। ज्यादातर लोगों में कुछ समय बाद ही प्यार का एहसास समाप्त हो जाता है। जरूरी है हम पहले अपनी मदद करना सीखें। दूसरों की मदद तभी कर पाएंगे। खुद को थामे रखे बिना दूसरों को पकड़ने की कोशिश निराशा ही देती है। यहां तक कि आप अपने लोगों पर ही बोझ बन जाते हैं। इसलिए दूसरों को बदलने से पहले हम खुद को भी बदलना सीख लें। हमारे दुश्मन दूसरे कम होते हैं, हम खुद ज्यादा होते हैं। और लेखिका आयरीन बटर कहती हैं, ‘दुश्मन वो है, जिसके बारे में हमें पता नहीं।’

-ललित गर्ग
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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