सत्यार्थ प्रकाश ‘एक अनुपम ग्रन्थ’ भाग-3

राकेश आर्य (बागपत)
    देवियों और सज्जऩों ! आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ नामक ग्रन्थ की रचना करके मानव जाति का अवर्णनीय उपकार किया है। सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करना ही इस ग्रन्थ का मुख्य उद्देश्य है। जिसने भी इस ग्रन्थ को पूरा पढ़ा उसी का जीवन बदल गया मैं इस पुस्तक को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ उसका कारण है कि महर्षि ने लगभग सभी धर्मो का निचौड़ इसमे दिया है जो आम आदमी के लिए अन्यथा सम्भव ही नहीं है मैनें इस ग्रन्थ को थोड़ा-थोड़ा करके प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है जिससे प्रत्येक पाठक इसे पढक़र समझ सके। आशा है कि पाठको को यह पसन्द आएगा।
महर्षि दयानन्द ने अपने प्रथम समुल्लास में परमात्मा के नामों की व्याख्या की है। तथा ओउम् को परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम बताया है। क्योंकि इसमें अ, उ और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओउम्) समुदाय हुआ है, इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत नाम आते हैं जैसे—अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि
              महर्षि दयानन्द ने अपने प्रथम समुल्लास में परमात्मा के नामों की व्याख्या की है। तथा ओउम् को परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम बताया है। क्योंकि इसमें अ, उ और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओउम्) समुदाय हुआ है, इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत नाम आते हैं जैसे—अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि । उकार से हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक है। उसका ऐसा ही वेदादि सत्यशास्त्रो में स्पष्ट व्याख्यान किया है कि प्रकरणानुकूल ये सब नाम परमेश्वर ही के हैं।
       अब प्रश्न यह उठता है कि परमेश्वर से भिन्न अर्थो के वाचक विराट् आदि नाम क्यों नहीं है? ब्रम्हाण्ड, पृथिवी आदि भूत, इन्द्रादि देवता और वैद्मकशास्त्र में शुण्ठच्यादि ओषधियों के भी ये नाम है, या नहीं ?
       इसका उत्तर यह हैं, कि ये इन सबके नामों के साथ साथ परमात्मा के भी हैं । यदि यह कहें कि केवल देवों का ग्रहण इन नामों से करते हो या नहीं ? क्योंकि देव सब प्रसिद्ध और वे उत्तम भी हैं, इससे मैं उनका ग्रहण करता हूँ। तब महर्षि दयान्नद कहते है कि परमेश्वर ना तो अप्रसिद्ध है और न ही उससे कोई उत्तम भी है? अत: ये नाम परमेश्वर के भी क्यों नहीं मानते? जब परमेश्वर अप्रसिद्ध और उसके तुल्य भी कोई नहीं तो उससे उत्तम कोई क्योंकर हो सकेगा। इससे आपका यह कहना सत्य नहीं । क्योंकि आपके इस कहने में बहुत से दोष भी आते है, जैसे—’उपस्थितं परित्यज्याअनुपस्थितं याचत इति बाधितन्याय:’ किसी ने किसी के लिए भोजन का पदार्थ रख के कहा कि आप भोजन कीजिए और वह जो उसको छोड़ के अप्राप्त भोजन के लिए जहाँ-तहाँ भ्रमण करे उसको बुद्धिमान् नही मानना चाहिए, क्योंकि वह उपस्थित नाम समीप प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ के अनुपस्थित अर्थात् अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति के लिए श्रम करता है। इसलिए जैसा वह बुद्धिमान् नहीं वैसा ही आपका कथन हुआ। यहाँ महर्षि यह भी कहना चाहते है कि जब परमात्मा कण-कण में विराजमान है अत: मनुष्य के अन्दर भी है फिर भी मनुष्य उसको जहाँ-तहाँ ढ़ूढ़ता है यह उसकी मुर्खता ही है। इसी प्रकार आप उन विराट् आदि नामों के जो प्रसिद्ध प्रमाणसिद्ध परमेश्वर और ब्रम्हाण्डादि उपस्थित अर्थो का परित्याग करके असम्भव और अनुपस्थित देवादि के ग्रहण में श्रम करते हैं, इसमें कोई भी प्रमाण या युक्ति नहीं। जो आप ऐसा कहें कि जहाँ जिस का प्रकरण है वहाँ उसी का ग्रहण करना योग्य है जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘हे भृत्य ! त्वं सैन्धवमानय’ अर्थात तू सैन्धव को ले आ। तब उस को समय अर्थात प्रकरण का विचार करना आवश्यक है, क्योंकि सैन्धव नाम दो पदार्थो का है; एक घोड़े और दूसरा लवण का। जो स्वस्वामी का गमन समय हो तो घोड़े और भोजन का काल हो तो लवण को ले आना उचित है और जो गमन समय में लवण और भोजन-समय में घोड़े को ले आवे तो उसका स्वामी उस पर क्रुद्ध होकर कहेगा कि तू निर्बुद्धि पुरूष है। गमन समय में लवण और भोजनकाल में घोड़े के लाने का क्या प्रयोजन था ? तू प्रकरणवित् नहीं है, नहीं तो जिस समय में जिसको लाना चाहिए था उसी को लाता। जो तुझ को प्रकरण का विचार करना आवश्यक था वह तूने नहीं किया, इस से तू मुर्ख है, मेरे पास से चला जा। इससे क्या सिद्ध हुआ कि जहाँ जिसका ग्रहण करना उचित हो वहाँ उसी अर्थ का ग्रहण करना चाहिए तो ऐसा ही हम और आप सब लोगों को मानना और करना भी चाहिए।
      महर्षि दयानन्द वेदों के प्रमाण देकर बताते है जैसे ओं खम्ब्रह्म (यजु: अ0 40 । मं0 17)
इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर का कोई नाम ऐसा नहीं है जिसका कोई अर्थ न हो जैसे संसार में दरिद्री धनपति आदि नाम होते हैं जो कही गौणिक, कही कार्मिक और कही स्वभाविक अर्थो को बताते है। ओम्(रक्षा करने वाला), खम्(आकाशवत व्यापक), ब्रह्म(सबसे बड़ा) ओउम्(ओउम् नाम उसको कहते है जो कभी नष्ट नहीं होता उसी की उपासना करनी योग्य है अन्य नश्वर चीजो की नहीं। अत: यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नष्ट होने वाली चीजे कभी भी परमात्मा नहीं हो सकती। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सभी दृश्य़ वस्तुए कभी न कभी नष्ट हो ही जाती है। अत: परमात्मा अदृश्य है। और उसके अन्य गौणिक नाम जैसे—अग्नि(स्वप्रकाश होने के कारण), मनु(विज्ञान स्वरूप होने के कारण), प्रजापति(सबका पालन करने के कारण), इन्द्र(परम् एश्वर्यवान होने के कारण), प्राण(सबका जीवन मूल होने के कारण) तथा ब्रह्म(निरन्तर व्यापक होने के कारण) परमात्मा के नाम है। क्रमश:

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