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भारतीय संस्कृति

भारतीय शाक्त विचार और आधुनिक विज्ञान

आप जब इस लेख को पढ़ रहे होंगे, तब स्क्रीन को स्क्रॉल करने के लिए भी आपको शक्ति की आवश्यकता होगी। आश्चर्य नहीं कि हम भारतीय सदैव से ही शक्ति के प्रति आकर्षित होते रहे हैं। छान्दोग्य के ऋषि नारद को संकेत करते हुए अष्टम खंड में कहते हैं “बलं वाव विज्ञानाद्भूयोपि ह शतं..”।

हे नारद! बल की उपासना करो। [छांदोग्य] ।

सम्भव है कि ‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहते निराला भी कहीं यही पाठ दुहरा गये हों।

भारतवर्ष में शक्ति को ईश्वर और मातृ ब्रह्म की तरह उपासना करने का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितनी कि स्वयं मानवता। एक समय मातृ-पूजक सभ्यता नील नदी से बर्मा तक फैली हुई थी।
भारतीय शाक्त जिस शक्ति के समक्ष नत है वह अपने अधिष्ठाता देवता की अधिष्ठात्री या उनकी आह्लादिनी शक्ति ही भर नहीं है बल्कि वह स्वतंत्र सर्वशक्तिमती, स्ववशविहारिणि सर्वेश्वरी चेतना है

१-स्वतंत्राहं सदा देवाः स्वेच्छाचारविहारिणि।
२-स्वतंत्रं ते तन्त्रं क्षितितल अवतीतरदिदम्।

वहीं पाश्चात्य परम्पराओं से प्रेरित वर्तमान विज्ञानी केवल शक्ति के जड़ स्वरूप को ही सर्वस्व समझ कर अनुसंधान करता है। इस विडम्बना के स्पष्ट कारण भी हैं। पहला कि आधुनिक विज्ञान केवल द्रव्य और ऊर्जा के अन्योन्याश्रय के ही चक्कर लगाता रहता है।

ऐसे सभी महानुभाव जिन्होंने सिद्धान्तकौमुदी का संज्ञाप्रकरण भी पढा होगा उन्हें मालूम होगा कि यह अन्योन्याश्रयदोष क्या है ? माने जैसे किसी ने किसी से पूछा कि यह कार किसकी है ? उत्तर दिया गया कि वह घर जिसका है । घर किसका है ? तो उत्तर मिला कि कार जिसकी है । तो कुछ भी नही मालूम पडा कि घर किसका है और कार किसकी है अन्योन्याश्रित हो गया घर और कार के स्वामी का ज्ञान —- स्वज्ञप्त्यधीनज्ञ्यप्तिकत्वमन्योन्याश्रयत्वम् ।

दूसरा कारण, विज्ञान के अदूरदर्शी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चेतना की आवश्यकता ही नहीं। वास्तव में चेतना की उपस्थिति तो विज्ञान के साध्यों में बाधा ही सिद्ध होती। कल्पना करें कि अचानक से किसी यंत्र में चेतनता उत्पन्न हो गई और उसने अपने वैज्ञानिक के निर्देशों को मानने में अनिच्छा प्रदर्शित की। हम स्थिति की विस्फोटक भयावहता की कल्पना कर सकते हैं।

अस्तु, प्रकृति का सार चेतन शक्ति है। आधुनिक विज्ञान परमाणु से भी सूक्ष्म इलेक्ट्रॉन, प्रोटान और न्यूट्रान को भी बनाने वाले अति सूक्ष्मतर क्वार्क कणों तक पहुंच गया है। तब क्वार्क को चलायमान करने वाली शक्ति कौन है?

सृष्टि के पूर्व अखिल चराचर विश्व जिस अनंत अन्धकार से आच्छन्न था वह घोर अन्धकार एटर्नल डार्कनेस ही काली का यथार्थ रूप है। जैसा कि बांग्ला कवि कहते हैं “संसार छिल ना यखन मुण्डमाला कोथाय पेलि?

हम ‘ईकार’ को शक्ति-रूप समझते आए हैं और यह भी कि शक्ति के बिना ‘शिव’ ‘शव’ रह जाते हैं। परन्तु जगद्धात्री स्तवन कहता है-
” शवाकारे शक्तिरुपे शक्तिस्थे शक्तिविग्रहे”
यह श्लोक तो वस्तुतः यही कहता है कि शिव और शिवा एक ही हैं। माँ का एक रूप अपरिणामी शवाकार है जिसके उपर स्थित हो माँ अपने दूसरे परिणामीस्वरूप से लीला कर रही हैं।

सांख्य आदि दर्शन विशेष और आधुनिक ऊष्मागतिकीय भौतिकविद् परमाण्विक और तरंगीय नित्यता में विश्वास करते हैं जबकि हम भारतीय आदिशक्ति को “परमाणुस्वरूपे च द्वयणुकादिस्वरूपिणि” कहते आए हैं।

हमने शक्ति को “सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूपे च प्राणापानादिरूपिणी ” कहा, जहां स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा भौतिक व रसायन प्रभृति वैज्ञानिक विषय-वस्तु है जबकि प्राणापानादि शब्द द्वारा प्राण, मन बुद्धि विषय जीवन विज्ञान आदि विषय परिलक्षित होते हैं।

संपूर्ण ब्रह्मांड ही आदिशक्ति का स्वरूप है। “भावाभावस्वरूपे जगद्धात्री”। भाव और अभाव इन्हीं दो तत्वों से तो ब्रह्मांड बना है। चैतन्य शक्ति पर्यंत जगत मे जितनी भी क्रियाशील या निष्क्रिय शक्तियां हैं सब उस एक महाशक्ति के ही स्वरूप हैं I
“एकैव सा महाशक्तिः तया सर्वमिदं ततम्।”

तो सबसे स्मार्ट तो वह हुए जिनकी माँ ही ब्रह्म है सकलशब्दमयी।
✍🏻मधुसूदन उपाध्याय

भारत ने सन 1998 की शुरुआत में जब पोखरण में पांच परमाणु विस्फोट किये तो कई अख़बारों ने पोखरण का जिक्र “शक्ति पीठ” के रूप में किया। विश्व के लिए ये कई कारणों से घबराने वाली घटना थी। एक तो उनके अनुसार जिसके पास परमाणु शोध की क्षमता ही नहीं होनी चाहिए थी, उसके पास भला परमाणु बम क्यों थे? दूसरा कि शक्ति के इस रूप में उपासना की कोई पद्दति होगी, ऐसा वो सोच ही नहीं पाए थे। उनकी ओर जो व्यवस्था संस्कृति या मजहबी तौर पर चलती थी, उसमें “स्त्री” उपास्य नहीं थी। देवी तो क्या, उनके पास कोई देवदूत भी स्त्री नहीं थी!

शाक्त परम्पराओं के लिए देवी की शक्ति के रूप में उपासना एक आम पद्दति थी। शक्ति का अर्थ किसी का बल हो सकता है, किसी कार्य को करने की क्षमता भी हो सकती है। ये प्रकृति की सृजन और विनाश के रूप में स्वयं को जब दर्शाती है, तब ये शक्ति केवल शब्द नहीं देवी है। सामान्यतः दक्षिण भारत में ये श्री (लक्ष्मी) के रूप में और उत्तर भारत में चंडी (काली) के रूप में पूजित हैं। अपने अपने क्षेत्र की परम्पराओं के अनुसार इनकी उपासना के दो मुख्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं। ललिता सहस्त्रनाम जहाँ दक्षिण में अधिक पाया जाता है, उतर में दुर्गा सप्तशती (या चंडी पाठ) ज्यादा दिखता है।

शाक्त परम्पराएं वर्ष के 360 दिनों को नौ-नौ रात्रियों के चालीस हिस्सों में बाँट देती हैं। फिर करीब हर ऋतुसन्धी पर एक नवरात्र ज्यादा महत्व का हो जाता है। जैसे अश्विन या शारदीय नवरात्री की ही तरह कई लोग चैत्र में चैती दुर्गा पूजा (नवरात्रि) मनाते भी दिख जायेंगे। चैत्र ठीक फसल काटने के बाद का समय भी होता है इसलिए कृषि प्रधान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। असाढ़ यानि बरसात के समय पड़ने वाली नवरात्रि का त्यौहार हिमाचल के नैना देवी और चिंतपूर्णी मंदिरों में काफी धूम-धाम से मनाया जाता है। माघ नवरात्री का पांचवा दिन हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।

सरस्वती के रूप में उपासना के लिए दक्षिण में कई जगहों पर अष्टमी-नवमी तिथियों को किताबों की भी पूजा होती है। शस्त्र पूजा में भी उनका आह्वान होता है। बच्चों को लिखना-पढ़ना शुरू करवाने के लिए विजयदशमी का दिन शुभ माना जाता है और हमारी पीढ़ी तक के कई लोगों का इसी तिथि को विद्यारम्भ करवाया गया होगा। देवी जितनी वैदिक परम्पराओं की हैं, उतनी ही तांत्रिक पद्दतियों की भी हैं। डामर तंत्र में इस विषय में कहा गया है कि जैसे यज्ञों में अश्वमेघ है और देवों में हरी, वैसे ही स्तोत्रों में सप्तशती है।

तीन रूपों में सरस्वती, काली और लक्ष्मी देवियों की ही तरह सप्तशती भी तीन भागों में विभक्त है। प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र इसके तीन हिस्से हैं। मार्कंडेय पुराण के 81 वें से 93 वें अध्याय में दुर्गा सप्तशती होती है। इसके प्रथम चरित्र में मधु-कैटभ, मध्यम में महिषासुर और उत्तम में शुम्भ-निशुम्भ नाम के राक्षसों से संसार की मुक्ति का वर्णन है (ललिता सहस्त्रनाम में भंडासुर नाम के राक्षस से मुक्ति का वर्णन है)। तांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े होने के कारण इसकी प्रक्रियाएं गुप्त भी रखी जाती थीं। श्री भास्कराचार्य ने तो सप्तशती पर अपनी टीका का नाम ही ‘गुप्तवती’ रखा था।

पुराणों को जहाँ वेदों का केवल एक उपअंग माना जाता है वहीँ सप्तशती को सीधा श्रुति का स्थान मिला हुआ है। जैसे वेदमंत्रों के ऋषि, छंद, देवता और विनियोग होते हैं वैसे ही प्रथम, मध्यम और उत्तम तीनों चरित्रों में ऋषि, छंद, देवता और विनियोग मिल जायेंगे। इस पूरे ग्रन्थ में 537 पूर्ण श्लोक, 38 अर्ध श्लोक, 66 खंड श्लोक, 57 उवाच और 2 पुनरुक्त यानी कुल 700 मन्त्र होते हैं। अफ़सोस की बात है कि इनके पीछे के दर्शन पर लिखे गए अधिकांश संस्कृत ग्रन्थ लुप्त हो रहे हैं। अंग्रेजी में अभी भी कुछ उपलब्ध हो जाता है, लेकिन भारतीय भाषाओँ में कुछ भी ढूंढ निकालना मुश्किल होगा।

ये एक मुख्य कारण है कि इसे पढ़कर, खुद ही समझना पड़ता है। तांत्रिक सिद्धांतों के शिव और शक्ति, सांख्य के पुरुष-प्रकृति या फिर अद्वैत के ब्रह्म और माया में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। जैसा कि पहले लिखा है, इसमें 700 ही मन्त्र हैं (सिर्फ पूरे श्लोक गिनें तो 513) यानी बहुत ज्यादा नहीं होता। पाठ कर के देखिये। आखिर आपके ग्रन्थ आपकी संस्कृति, आपकी ही तो जिम्मेदारी हैं!

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोsधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूतिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

यहाँ देवी के नाम अर्थ में सरल ही हैं। विंध्यवासिनी और महिषासुरमर्दिनी जैसे नामों से आमतौर पर बुलाया ही जाता है। गिरिनान्दिनी में वही पर्वत की पुत्री हैं। विष्णुविलासिनी नाम में वही लक्ष्मी हो जाती हैं। रम्य का अर्थ सुन्दर होता है और कपर्दिनी का अर्थ लम्बे केश या जटाओं वाली हुआ।

शिति हिमालय के क्षेत्र में मिलने वाला एक पेड़ होता है जिसकी छाल से गाढ़ा नीला-काला रंग बनता है। पुराने जमाने में लिखने के लिए इससे स्याही बनती थी। इसलिए शितिकण्ठ का मतलब यहाँ नीलकण्ठ – शिव हुए और उनकी कुटुम्बिनी पार्वती को कहा जा रहा है। नन्दितमेदिनी नाम के पीछे थोड़ी सी लम्बी कहानी हो जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती का पहला अध्याय मधु-कैटभ नाम के राक्षसों के उत्पन्न होने और उनके वध पर है।

जब ये उत्पन्न हुए थे तो प्रलय का काल था और सारा विश्व जल से डूबा हुआ था। मधु-कैटभ ने हर ओर जल देखकर संभवतः ये मान लिया होगा कि जल के अलावा कुछ है ही नहीं। जल वाले स्थान, गीले स्थान पर उनकी मृत्यु न हो, उन्होंने यही वर माँगा था। प्रथम चरित्र यानि श्री दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में हमें ये पता चलता है कि भगवान विष्णु ने जल हीन स्थान पर उनका वध करने के लिए अपनी जाँघों पर रखकर उनका सर काट लिया था। मगर कथा यहीं समाप्त नहीं होती।

राक्षसों के सर काटे जाने से बहुत सी वसा-चर्बी निकली। वसा-चर्बी को मेद कहा जाता है, मेद से युक्त होने के कारण सागर भरा और पृथ्वी फिर से उभर आई। मेद (वसा) से युक्त होने के कारण पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ा और वो अभक्ष्य मानी जाने लगी। पूरी पृथ्वी को सुख प्रदान करने के कारण देवी का एक नाम नन्दितमेदिनी कहा गया है। महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के पहले श्लोक का दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय, प्रथम चरित्र से सम्बन्ध के रूप में भी नन्दितमेदिनी नाम को देखा जा सकता है।

मार्कंडेय पुराण का एक हिस्सा जिसे श्री दुर्गा सप्तशती कहा जाता है, उसे देखें तो पुनः यही बात स्थापित होती है। श्री दुर्गा सप्तशती का पहला ही अध्याय सुरथ नाम के एक राजा और समाधी नाम के एक वैश्य की कथा पर आरंभ होता है। ये दोनों ही लोग किन्हीं कारणों से दुखी हैं और वन में एक आश्रम में हैं।

ये भाग और इसमें दिया गया वर्णन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ऐसे दुःख मनुष्यों को अवसाद में धकेलने का एक कारण होते हैं। ये मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन करने वालों के लिए एक मुख्य बिंदु होता है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ने 10 अक्टूबर 2021 को मनाये जाने वाले “विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस” का आधार बिंदु ही असमानता को रखा है।
महाभारत के वर्णन के हिसाब से देखें तो चौथा, पांचवां, आठवां और दसवां कारण इसी असमानता के व्यवहार की बात कर रहा होता है। हाल ही में यूनिसेफ ने भी मानसिक स्वास्थ्य पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट भी जारी की है।

कोरोना काल में लम्बे लॉक-डाउन, आर्थिक संकट आदि झेल चुके विश्व के लिए दुःख और उसके कारण समझना एक महत्वपूर्ण पहलु होता है।

महाभारत में गिनाये दुखों का पहला कारण, परिवार से दूर होना राजा सुरथ और समाधी दोनों पर लागू होता है। दूसरा कारण – सम्बन्धियों द्वारा त्याग दिया जाना तो समाधि नामक ये व्यापारी स्पष्ट रूप से झेल ही रहा था। श्री दुर्गा सप्तशती के राजा सुरथ को देखें तो अकारण ही उससे कुछ लोगों ने शत्रुता मोल ले ली थी। संख्या में कम होने पर भी राजा अपने शत्रुओं से हार गया था। इसलिए कहा जा सकता है कि उसपर आठवां दुःख का कारण यानी कम योग्यता वालों द्वारा अपमानित होना लागू होता था। नौवां मित्रों-स्वजनों का छल भी राजा पर लागू था क्योंकि उसका कोष हारने पर उसके मंत्रियों ने ही अपहृत कर लिया था। वो अपने प्रिय जन ही नहीं बल्कि हाथी किस स्थिति में होगा, इसकी चिंता भी करता दिखता है इसलिए चौदहवां कारण भी उसपर लागू होता दिखाई देता है। तेरहवां कारण यानी संचित धन की बर्बादी की चिंता भी राजा को हो रही होती है।

कहा जा सकता है कि जो सैद्धांतिक रूप से महाभारत में बताया गया है वही इस कथा में दिखता है। इससे आपको वो प्रसिद्ध उक्ति भी याद आ सकती है जिसमें कहा जाता है कि जो कहीं भी लिखा है वो महाभारत, में मिल जाएगा। पूरी कथा के समाप्त होने पर अंतिम अध्याय में आपको राजा के पुनः अपना राज्य प्राप्त करने और समाधि के मोक्ष की प्राप्ति भी दिखती है। इस तरह से ये कहानी अवसाद ग्रस्त (डिप्रेशन के शिकार) लोगों के ठीक होने और फिर से सामान्य जीवन जीने की कथा भी है। ऐसे में जो कुछ लोग ये समझ लेते हैं कि धार्मिक कथा होने के कारण ये केवल सन्यासियों के लिये होगी, वो भी उचित नहीं लगता। ऐसा होता तो राजा के फिर से अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने, मंत्रियों और राज्य का कोष दोबारा पाने या फिर आगे कभी एक पूरे मन्वंतर के उसके नाम पर हो जाने की कथाएँ क्यों होतीं?

इस हिसाब से देखा जाए तो न्यूनतम योग्यता की कसौटी पर भी श्री दुर्गा सप्तशती या फिर महाभारत जैसे ग्रन्थ काफी ऊपर आ जाते हैं। केवल अध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टिकोण को छोड़कर, सीधे-सादे से मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी इन्हें पढ़ा जा सकता है। पहले ही अध्याय में देखें तो श्री दुर्गा सप्तशती का 52वां श्लोक देखने लायक होता है

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।

मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ (अध्याय 1 श्लोक 52)

यहाँ कहा गया है कि मनुष्य भी प्रत्युपकार की आशा से ही संतति के प्रति प्रेम दर्शाते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। यानी दुखों के कारण और उनके निवारण से पहले एक स्वीकार्यता बनाने का प्रयास किया गया है। किसी और पर गलती थोपकर, किसी और को दोष देकर आप दुखों के कारण मिटा नहीं सकते। अपनी स्थिति से उबर नहीं सकते, ये भी पहले ही स्पष्ट बता दिया गया है।

बाकी ऐसे ग्रंथों को पहले अनुवाद के साथ और फिर उनके मूल स्वरुप (संस्कृत श्लोकों में) पढ़ने का प्रयास करके देखिये। संभव है हर पाठ आपके दृष्टिकोण को एक नया विस्तार देता जाए। नवरात्रि की शुभकामनाएं!
✍🏻आनन्द कुमार

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