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राजस्थान में कांग्रेस की कमजोरियों का फायदा नहीं उठा पा रही है भाजपा

रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान में आगामी पांच दिसंबर को सरदारशहर विधानसभा उपचुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। उपचुनाव जीतने के लिए जहां प्रदेश में सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी के नेता अपनी पूरी ताकत लगाए हुए हैं। वहीं मतदान से पूर्व ही भाजपा नेताओं ने हार मान ली है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां ने पिछले दिनों बयान दिया था कि उपचुनाव में कांग्रेस जीतती है और मुख्य चुनाव में भाजपा जीतती है। पूनियां का कहने का आशय था कि राजस्थान में विधानसभा के जो उपचुनाव हुए हैं उनमें अधिकांश में कांग्रेस पार्टी जीती है। भाजपा सिर्फ राजसमंद विधानसभा सीट का ही उपचुनाव जीत पाई है।

राजसमंद में भाजपा विधायक किरण माहेश्वरी के निधन होने से उनकी बेटी दीप्ति माहेश्वरी को टिकट देकर भाजपा ने उपचुनाव लड़वाया था और दीप्ति माहेश्वरी चुनाव में जीत गई थीं। इसके अलावा अन्य सभी सात विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा की हार हुई थी। इतना ही नहीं भाजपा ने धरियावद से पार्टी विधायक गौतम लाल मीणा के निधन से हुए उपचुनाव में उनके बेटे कन्हैया लाल मीणा का टिकट काटकर खेत सिंह को चुनाव लड़वाया था। जहां भाजपा प्रत्याशी को कांग्रेस के पूर्व विधायक नगराज मीणा के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा था। कांग्रेस ने जितने भी विधानसभा उपचुनाव जीते, उन सभी सीटों पर मृतक विधायकों के परिवारजनों को ही प्रत्याशी बनाकर सहानुभूति फैक्टर का फायदा उठाया था। जबकि भाजपा ऐसा करने में विफल रही।

चूरू जिले की सरदारशहर सीट पर भाजपा ने पूर्व में चार बार चुनाव लड़ चुके अशोक पिंचा को अपना प्रत्याशी बनाया है। अशोक पिंचा एक बार 2008 में जीतने में सफल भी रहे थे। मगर उसके बाद लगातार हारते रहे हैं। हालांकि पिंचा ने उपचुनाव लड़ने के लिए मना कर दिया था। मगर पार्टी नेतृत्व ने उन्हीं पर भरोसा जताते हुए उन्हें चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया। सरदारशहर विधानसभा सीट भाजपा के लिए ज्यादा अच्छी नहीं मानी जाती है। भाजपा प्रत्याशी यहां सिर्फ दो बार जीते हैं। 1980 में मोहनलाल चुनाव जीते थे। मगर उनके निधन पर 1982 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के केसरी चंद बोहरा जीतने में सफल रहे थे। 2008 में भाजपा के अशोक पिंचा चुनाव जीते थे। इसके अलावा सरदार शहर में भाजपा कभी कोई चमत्कार नहीं दिखा पाई थी।

कांग्रेस ने जहां सात बार जीते हुए विधायक भंवरलाल शर्मा की मृत्यु होने पर उनके बेटे अनिल शर्मा को मैदान में उतारा है। वहीं राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने लालचंद मुंड को प्रत्याशी बनाया है। नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का प्रत्याशी आने से सरदार शहर में मुकाबला तिकोना माना जा रहा है। लालचंद मुंड जाट समाज से आते हैं तथा एक बार पूर्व में बसपा से चुनाव लड़ चुके हैं। वह पिछले पांच साल से डेयरी चेयरमैन हैं तथा पूर्व में सरपंच भी रह चुके हैं। अभी उनकी पत्नी सरपंच हैं। सरदारशहर विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक जाट मतदाताओं की संख्या है। ऐसे में यदि जाट मतदाता लालचंद मुंड के पक्ष में एकजुट हो जाते हैं तो चुनावी संघर्ष काफी कड़ा हो सकता है।

कांग्रेस प्रत्याशी अनिल शर्मा ब्राह्मण समाज से हैं। अनिल शर्मा को गहलोत सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा मिला हुआ था। उनके पिता भंवरलाल शर्मा राजस्थान ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष थे तथा राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत की सरकार में नहर मंत्री रह चुके थे। सरदारशहर से सात बार जीतकर भंवरलाल शर्मा राजस्थान के बड़े नेता माने जाते थे। कांग्रेस प्रत्याशी अनिल शर्मा को जहां सहानुभूति के वोट मिलने की पूरी संभावना है। वहीं वह स्वयं भी अपने पिता के साथ राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय रहे हैं। क्षेत्र के मतदाताओं से उनकी सीधी पहचान है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार होने का भी उनको पूरा फायदा मिलेगा। अशोक शर्मा के नामांकन के वक्त स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मौजूद रहे थे। राजस्थान सरकार के कई मंत्री और विधायक सरदारशहर उपचुनाव जीतने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।

भाजपा प्रत्याशी अशोक पिंचा की स्वयं की छवि काफी साफ-सुथरी है। मगर उन्हें पार्टी की तरफ से भरपूर सहयोग नहीं मिल पा रहा है। केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को भाजपा प्रत्याशी अशोक पिंचा के चुनाव प्रभारी बनाए जाने के कारण वसुंधरा गुट के नेता ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। अर्जुनराम मेघवाल सांसद बनने से पहले कुछ समय तक चूरु जिले के कलेक्टर रह चुके हैं। इसी कारण उनको सरदारशहर विधानसभा उपचुनाव की कमान दी गई है। अर्जुनराम मेघवाल बड़बोले किस्म के नेता हैं। इसलिए वह पार्टी नेताओं को एकजुट करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। अशोक पिंचा को पार्टी टिकट दिलाने में पूर्व सांसद रामसिंह कस्वां व विधानसभा में विपक्ष के उप नेता राजेंद्र राठौड़ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने ही पिंचा को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया था।

हालांकि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद लगातार चुनाव में हारने के कारण सतीश पूनियां की छवि एक हारने वाले प्रदेश अध्यक्ष की बन चुकी है। इसी कारण प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां ने पिछले दिनों बयान भी दिया था कि यदि पार्टी के सभी नेता मिलकर मेहनत करेंगे तो हम उपचुनाव जीत सकते हैं। सरदार शहर में भाजपा की स्थिति मजबूत करने के लिए वसुंधरा सरकार में मंत्री रहे राजकुमार रिणवा व गहलोत सरकार में संसदीय सचिव रहे जयदीप डूडी को भाजपा में शामिल करवाया गया है। दोनों नेताओं को उपचुनाव में सक्रिय भूमिका देकर मेहनत करने की जिम्मेदारी दी गई है।

राजकुमार रिणवा 2018 के विधानसभा चुनाव में टिकट कटने के कारण रतनगढ़ से निर्दलीय चुनाव लड़े थे और जमानत जब्त करवा बैठे थे। फिर वह कांग्रेस में शामिल हो गए थे। मगर वहां भी उन्हें महत्व नहीं मिला था। इस कारण वह काफी दिनों से भाजपा में आने का प्रयास कर रहे थे। मगर प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां ने उनकी घर वापसी रोक रखी थी। लेकिन विधानसभा उपचुनाव के कारण उनकी घर वापसी हो गई। इसी तरह भादरा से निर्दलीय विधायक रहे जयदीप डूडी भी कांग्रेस में थे, मगर वहां भी उनकी दाल नहीं गली तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये।

राजकुमार रिणवा जहां ब्राह्मण समाज से हैं वहीं जयदीप डूडी जाट समाज से हैं। जयदीप डूडी के पिता लालचंद डूडी भैरोंसिंह शेखावत की सरकार में दो बार मंत्री भी रह चुके हैं। उपचुनाव के वक्त दो पूर्व विधायकों की घर वापसी करवा कर भाजपा ने अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की है। मगर दोनों ही नेता दलबदल कर अपना जनाधार गंवा चुके हैं। ऐसे में पिटे मोहरों के बल पर भाजपा अपने प्रत्याशी को कैसे चुनाव जितवा पाएगी, यह राजनीति के जानकारों के भी समझ में नहीं आ रहा है। जहां एक तरफ बीकानेर में वसुंधरा समर्थक पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी की अर्जुन राम मेघवाल के विरोध के चलते एन वक्त पर भाजपा में घर वापसी रोकी गई थी। वहीं मेघवाल की सिफारिश पर ही राजकुमार रिणवा व जयदीप डूडी को भाजपा में शामिल करवाया गया है। यह पार्टी के लिए कितने लाभदायक होंगे, इस बात का पता तो चुनाव नतीजों के बाद ही चल पाएगा। फिलहाल तो भाजपा प्रत्याशी कड़े त्रिकोणीय संघर्ष में फंसा हुआ नजर आ रहा है।

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