न्यायपालिका में वंशवाद… कितनी गहरी हैं जड़ें

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चन्द्र प्रकाश पाण्डेय

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के मौजूदा कोलेजियम सिस्टम पर अक्सर सवाल उठते हैं। आलोचक आरोप लगाते हैं कि नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। नियुक्ति के दौरान इस बात को तवज्जो दी जाती है कि कैंडिडेट के बाप-दादा क्या थे। सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा 27 जजों के पिता भी जज रह चुके हैं।

कोलेजियम सिस्टम पर उठते रहे हैं सवाल

नब्बे के दशक में सुप्रीम कोर्ट की दो संविधान पीठों के फैसलों से सीजेआई की अगुआई वाले कोलेजियम सिस्टम की बुनियाद पड़ी। इसका उद्देश्य मेरिट के आधार पर जजों की नियुक्ति करना है जिसमें वरिष्ठता का भी ध्यान रखा जाए, जो क्षेत्र और समुदाय के आधार पर प्रतिनिधित्व में संतुलन सुनिश्चित कर सके। कोलेजियम में सीजेआई के अलावा सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ जज होते हैं।

प्रतिनिधित्व में क्षेत्र और समुदाय आधारित संतुलन था लक्ष्य
क्षेत्रीय संतुलन का लक्ष्य बमुश्किल ही काफी हासिल हो पाया क्योंकि लंबे वक्त तक कई हाई कोर्ट का सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व नहीं रहा। यानी उन हाई कोर्ट्स का कोई भी जज सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट नहीं हुआ। ऐसे हाई कोर्ट के मेहनती, प्रतिभावान और वरिष्ठ जज तमाम राज्यों में जुडिशरी का नेतृत्व करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने का इंतजार ही करते रहे। उन्हें कोलेजियम से मंजूरी ही नहीं मिली।

सुप्रीम कोर्ट में समुदाय आधारित संतुलन भी कभी हासिल नहीं हो पाया। अभी की स्थिति देख लीजिए। जस्टिस एस. अब्दुल नजीर 4 जनवरी को रिटायर होने जा रहे हैं। अगर कोलेजियम उनके रिटायरमेंट से पहले मुस्लिम समुदाय से किसी नाम की सिफारिश नहीं करती है तो सुप्रीम कोर्ट में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा कोई भी जज नहीं होगा।

कैंडिडेट के बाप-दादा कौन, नियुक्ति में अहम

कोलेजियम सिस्टम के तमाम आलोचक और यहां तक कि न्यायपालिका से जुड़े लोग भी इसे एक अपारदर्शी सिस्टम बताते हैं जो आमतौर पर ‘आप मेरी पीठ सहलाओ, मैं आपकी पीठ सहलाऊं’ की तर्ज पर काम करता है। आलोचक आरोप लगाते हैं कि हायर जुडिशरी में जजों की नियुक्ति के वक्त सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि कैडिंडेट के बाप-दादा क्या थे। जज के बेटों को तरजीह मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों में जस्टिस सी. टी. रविकुमार का मामला थोड़ा हटकर है। उनके पिता केरल की चंगानस्सरी के ट्रायल कोर्ट में एक बेंच क्लर्क थे। सुप्रीम के मौजूदा 27 जजों में पहली पीढ़ी के कई वकील हैं। शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड जजों के बायोडेटा के मुताबिक फर्स्ट जेनरेशन के जो वकील जज बने हैं, उनमें जस्टिस नजीर, सूर्यकांत, ए. बोस, ए. एस. बोपन्ना, कृष्ण मुरारी, एस. आर. भट, वी रमासुब्रमण्यन, ऋषिकेश रॉय, जेके माहेश्वरी, हिमा कोहली और जस्टिस एम. एम. सुंदरेश शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा 6 जजों के पिता भी रह चुके हैं जज

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों में 6 ऐसे हैं जिनके पिता या तो सुप्रीम कोर्ट या फिर किसी हाई कोर्ट में जज रह चुके हैं। सीजेआई डी. वाई. चन्द्रचूड़ के पिता वाई. वी. चन्द्रचूड़ भारत के 16वें सीजेआई थे। जस्टिस के. एम. जोसेफ के पिता के. के. मैथ्यू 1971-76 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहे। जस्टिस संजीव खन्ना के पिता दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे और उनके चाचा जस्टिस एच. आर. खन्ना सुप्रीम कोर्ट के जज थे। वही जस्टिस खन्ना जिन्हें इमर्जेंसी के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध करने के लिए सीजेआई नहीं बनाया गया।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना (जो 2027 में 36 दिनों के लिए पहली महिला सीजेआई बनेंगी) के पिता ई. एस. वेंकटरमैया सीजेआई रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपने 10 साल के कार्यकाल में वह 6 महीने तक सीजेआई रहे। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और सुधांशु धुलिया के पिता भी हाई कोर्ट के जज रह चुके हैं।

जस्टिस बेला त्रिवेदी जब सिविल जज बनीं तब उसी अदालत में पिता भी थे जज

ट्रायल कोर्ट के जज से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वालीं जस्टिस बेला त्रिवेदी के पिता अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज थे। बेला त्रिवेदी जब सिविल जज नियुक्त हुईं तब उनके पिता भी वहीं पर जज थे। सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज ऐसे हैं जिनके पिता मशहूर वकील रह चुके हैं। जस्टिस एम. आर. शाह, ए. रस्तोगी, दिनेश माहेश्वरी, ए. एस. ओका, विक्रम नाथ और जे. बी. पार्दीवाला के पिता जाने-माने वकील रहे हैं।

रसूखदार परिवार

जस्टिस संजय किशन कौल के पूर्वज कश्मीर के राजदरबार में ऊंचे पदों पर काम करते थे। जस्टिस बी. आर. गवई के पिता एस. आर. गवाई एक जाने-माने नेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे जो बिहार और केरल के गवर्नर के पद पर भी रहे। जस्टिस ए. एस. बोपन्ना के पिता भी कर्नाटक में जनता पार्टी के बड़े नेता हुआ करते थे।

नियुक्ति में वरिष्ठता को नजरअंदाज किए जाने के कई उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के दौरान वरिष्ठता को नजरअंदाज किए जाने के तमाम उदाहरण हैं। सबसे हालिया उदाहरण जस्टिस धुलिया और पार्दीवाला का है। जस्टिस धुलिया को हाई कोर्ट्स के 23 चीफ जस्टिस/ऐक्टिंग चीफ जस्टिस और 6 एचसी जजों पर तरजीह देते हुए सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। इसी तरह जस्टिस पार्दीवाला को सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों/कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के अलावा हाई कोर्ट के 25 अन्य जजों के ऊपर तरजीह देते हुए सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया I

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