जनसंख्या विस्फोट और भारत

भारत में बढ़ती जनसंख्या बहुत बड़े खतरे की घंटी है। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात ही यदि इस दिशा में सरकारों की ओर से उचित कदम उठाए जाते तो आज देश में भुखमरी, बेरोजगारी, गरीबी जैसी समस्याओं से जूझने की स्थिति नहीं आती। निस्संदेह भारत ने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात कई क्षेत्रों में आशातीत उन्नति की है, परंतु बढ़ती जनसंख्या के सामने ऐसी कोई भी उन्नति संतोष का कारण नहीं हो सकती। क्योंकि भारत की बढ़ती जनसंख्या ने हमारे लिए अनेक प्रकार की समस्याएं खड़ी की हैं। यदि हम आज भी भुखमरी , फटेहाली, गरीबी, बेरोजगारी से परेशान देश की बड़ी जनसंख्या को मुक्ति नहीं दिला सके हैं तो हमारी स्वाधीनता का कोई मूल्य नहीं है। जब देश स्वाधीन हुआ था तो उस समय छोटे – बड़े ,अमीर- गरीब सबने ही सामूहिक रूप से सपने संजोए थे। यदि देश अपने उस सामूहिक संकल्प को पूर्ण करने में सफल नहीं हुआ है तो इसके पीछे जनसंख्या की बुरी स्थिति ही अधिक उत्तरदाई है।

इस बात को समझने के लिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि विश्व की कुल जनसंख्या के 16 .7 प्रतिशत के बराबर की भारत की जनसंख्या है। कहने का अभिप्राय है कि संसार का हर छठा व्यक्ति भारतीय है। जिस गति से भारत की जनसंख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है, यदि यही स्थिति रही तो 2030 तक ही भारत विश्व के सबसे बड़े जनसंख्या वाले देश चीन को भी पीछे छोड़ देगा। संसार की कुल जनसंख्या के छठे भाग की बराबर भारत में लोगों का रहना बहुत बड़ी चिंता का विषय है। यह तब और भी अधिक चिंतनीय हो जाता है जब पता चलता है कि भारत के पास सारे विश्व के कुल भूभाग का 2.42% भाग ही है।
जब जब भी जनसंख्या असंतुलन या जनसांख्यिकीय आंकड़ों में दर्ज की जा रही बेतहाशा वृद्धि को नियंत्रित करने का भारत में प्रयास किया जाता है तो इसे एक वर्ग अपने मौलिक अधिकारों में अवरोध समझता है। उसके समर्थन में सेकुलर राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी उतर कर आते हैं। कहने का अभिप्राय है कि समस्या को उलझाने का तो प्रयास किया जाता है, सुलझाने का नहीं। होना तो यह चाहिए कि राष्ट्र की समस्याओं से निपटने में सबका सकारात्मक सहयोग हो और कोई किसी प्रकार का अवरोध या अड़ंगा डालने का प्रयास न करे, पर हमारे देश में इसके उल्टा होता है। जो लोग राष्ट्रहित में न सोचकर विपरीत दिशा में जोर लगाते हैं या सोचते हैं उन्हें किसी भी दृष्टिकोण से बुद्धिजीवी नहीं कहा जा सकता।

हमें अब इस भ्रांति में नहीं रहना चाहिए कि जनसंख्या विस्फोट की स्थिति भविष्य में कभी आगे जाकर आएगी। इसके स्थान पर हमें समझ लेना चाहिए कि जनसंख्या विस्फोट की स्थिति भारत में आ चुकी है। क्योंकि बड़ी संख्या में भारत में मिलने वाले भूख प्यास से व्याकुल लोग और निर्धन रेखा से भी नीचे का जीवन जीने वाले फटेहाल लोग निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं। उन्हें दो जून की रोटी उपलब्ध कराने तक के संसाधन और हमारे पास नहीं हैं।
हमें सच को स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि जब सच को स्वीकार करेंगे तभी हम समस्या के समाधान की ओर विचार करना आरंभ करेंगे। किसी एक वर्ग को जनसंख्या बढ़ाने की अनुमति देना अब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान होगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब देश आजाद हुआ था तो उस समय देश की जितनी जनसंख्या थी, यदि उसकी दोगुनी जनसंख्या भी आज तक बढ़ी होती तो भी देश में कहीं भूखमरी, लाचारी, बेरोजगारी , फटेहाली की स्थिति नहीं होती। उस समय की दोगुनी जनसंख्या आज भी देश में सुख और समृद्धि का जीवन जी रही है।

हम लगभग 65 या 70 करोड़ लोगों के ही जीवन स्तर में सुधार कर उन्हें कौशल एवं प्रशिक्षण प्रदान करने और रोजगार देने में सफल हो पाए हैं। इसके बाद की जनसंख्या को हमने अघोषित रूप से कीड़ा मकोड़ा मान लिया है। यही कारण है कि उनके विकास के लिए कोई योजना देश में नहीं है। राजनीति में भी लोग जातिवाद की बात कर कुछ लोगों को जाति के नाम पर कुछ साधन दिलवाने की बात करते देखे जाते हैं। परंतु जो लोग भुखमरी की स्थिति में हैं, लगता है उनकी कोई जाति नहीं होती । यही कारण है कि उनकी ओर देखने का समय तो जातिवाद की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों के पास भी नहीं है।
बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करके और मशीनों के माध्यम से कामों को कराने की स्थिति पैदा करके हमने लोगों को रोजगार दिये नहीं हैं बल्कि लोगों के रोजगार छीने हैं। हमने भारत की उस ज्ञान परंपरा और विकास को सुनिश्चित करने वाली बौद्धिक और सामाजिक श्रंखला को तोड़ दिया जिसके आधार पर लोग परंपरागत रूप से अपना रोजगार ढूंढ लेते थे। लोहार, बढ़ई, कुम्हार, नाई ,धोबी आदि परपरंपरागत आधार पर अपना कर्म निश्चित कर लेते थे। उन्हें रोजगार के लिए किसी प्रकार के प्रशिक्षण देने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। डिग्रियों की मूर्खतापूर्ण धारणा में विश्वास रखने वाले लोगों ने सबको बेरोजगार करके अब रोजगार पाने के लिए भी डिग्री का होना आवश्यक कर दिया है। यह कैसी मूर्खता की बात है कि सब लोग डिग्री ले नहीं सकते तो सब रोजगार भी नहीं पा सकते। इसी मूर्खतापूर्ण सोच और चिंतन ने लोगों को बेरोजगार कर दिया है और उन्हें अपने हाल पर जीने और मरने के लिए छोड़ दिया है।

इस समय भारत वर्ष 1947 की अपनी जनसंख्या की अपेक्षा लगभग चार गुना से भी अधिक जनसंख्या रखता है। अगले 8 वर्ष में ही भारत की जनसंख्या लगभग 150 करोड़ होगी। कई विद्वानों की मान्यता है कि एक बड़ी जनसंख्या को बृहत मानव पूंजी, उच्च आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार के अर्थ में देखा जाता है। पर क्या इस बात को भारत के संदर्भ में पूर्णतया सही माना जा सकता है? हमारा मानना है कि, नहीं। यदि इस बात पर गंभीरता से विचार करें तो भारत के लिए अधिक जनसंख्या एक बोझ बन चुकी है। जनसंख्या भारत में मानव पूंजी के रूप में तभी देखी जा सकती है जब देश के प्रत्येक नागरिक के संपूर्ण विकास के लिए देश की सरकारों के पास संसाधन हों और प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता पूर्वक उन संसाधनों का उपभोग और उपयोग करते हुए अपना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास कर सकने में सक्षम हो। यदि व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास पर भी कुछ दबंग लोग पहरा बैठा दें तो समझना चाहिए कि देश के लोग अपना सर्वांगीण विकास नहीं कर पा रहे हैं।

सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक विकास की बातों के सुंदर शब्दों को संविधान में सजाकर रखने से व्यक्तियों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हो सकता। इसके लिए आवश्यक है कि देश के सभी नागरिक एक दूसरे के प्रति सामाजिक समरसता में वृद्धि करने वाला व्यवहार स्वाभाविक रूप से प्रतिपादित करने वाले हों। यदि देश में एक दूसरे के अधिकारों को छीनने की होड़ मची हो तो ऐसी स्थिति में बृहत जनसंख्या किसी भी दृष्टिकोण से अच्छी नहीं की जा सकती। देश की बड़ी जनसंख्या में जब लोग एक दूसरे के लिए “गलेकाट” बन जाते हों तब ऐसी जनसंख्या समाज और राष्ट्र के लिए बहुत ही अधिक लज्जा जनक बन जाती है।
हम ईमानदारी से इस बात पर आत्मनिरीक्षण, परीक्षण और समीक्षण करें कि क्या हम इस समय वास्तव में एक दूसरे के लिए “गलेकाट” हैं या एक दूसरे के प्रति सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाला व्यवहार प्रतिपादित कर रहे हैं?
स्वतंत्र भारत को हम संस्कारित भारत बनाने में असफल रहे हैं। इसका कारण केवल एक है कि हमने वेद की संस्कारित भाषा और शिक्षा को देश में लागू कराने में चूक की है। हमने उस भाषा को और उस शिक्षा योजना को अपने लिए उपयुक्त माना जो अपने मूल स्वरूप में ही संस्कारित नहीं है। जिसे अभी स्वयं ही संस्कारित होना है उससे हमने यह अपेक्षा कर ली कि वह हमें संस्कार सिखाएगी।
अपने अच्छे को छोड़कर दूसरे के बुरे की ओर भागना ही वह स्थिति है जिसे अधीरता कहा जाता है। इस अवस्था से हमारी मानसिक ,बौद्धिक और आत्मिक पतन की राह निश्चित होती है।

कोई भी अधीर व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र कभी भी आत्मोन्नति नहीं कर सकता। सुव्यवस्थित व्यक्ति, समाज और राष्ट्र ही आत्मोन्नति कर सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा संस्कार पर सामूहिक बल दिया जाए। शिक्षा को रोजगार प्रद करने से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र अव्यवस्थित होते हैं और शिक्षा को संस्कार आधारित करने से इन तीनों में सुव्यवस्था उत्पन्न होती है। इस चिंतन को हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 1951 में देश का लिंगानुपात 946 महिला प्रति 1,000 पुरुष था। वर्ष 2011 में देश का लिंगानुपात 943 महिला प्रति 1,000 पुरुष दर्ज किया गया, जबकि वर्ष 2022 के अन्त तक इसके 950 महिला प्रति 1,000 पुरुष होने की आशा है।अभी भी लिंग चयन (प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर दोनों) के कारण विश्व स्तर पर लापता प्रत्येक तीन बालिकाओं में से एक भारत से है।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत 116 देशों के बीच 101वें स्थान पर है, जो एक ऐसे देश के लिये पर्याप्त चुनौतीपूर्ण है जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मध्याह्न भोजन योजना के माध्यम से खाद्य सुरक्षा हेतु सबसे व्यापक कल्याणकारी कार्यक्रमों में से एक का कार्यान्वयन करता है। पिछले 75 वर्षों में देश के रोगों के पैटर्न में भी व्यापक बदलाव आया है; जबकि भारत स्वतंत्रता के बाद संचारी रोगों से संघर्ष कर रहा था, अब उसका मुक़ाबला गैर-संचारी रोगों से हो रहा है जो कुल मौतों के 62% से अधिक के लिये ज़िम्मेदार हैं। रोग बोझ के मामले में भारत विश्व का अग्रणी देश है।
भारत में आठ करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं।वायु प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर पर होने वाली मौतों में से एक चौथाई से अधिक अकेले भारत में होती हैं।भारत का स्वास्थ्य देखभाल ढाँचा भी अपर्याप्त और अक्षम है।
ये सारे आंकड़े हमारी उस तथाकथित उन्नति की पोल खोल देते हैं, जिसे हम विश्व मंचों पर भी गाते बजाते देखे जाते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए यह बहुत अधिक अनिवार्य हो गया है कि वह जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून लाए और उसे कठोरता से लागू करवाए। अब किसी भी वर्ग या समुदाय को जनसंख्या बढ़ाने के लिए खुला नहीं छोड़ा जा सकता। जब संसार के अन्य देशों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कठोर कानून लाकर उन्हें कठोरता से लागू कराया जा सकता है तो ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता ? अब हमें जनसंख्या विस्फोट की प्रतीक्षा न करके जनसंख्या विस्फोट से बाहर निकलने के उपायों पर विचार करना ही चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş