अपने सदाचरण के चलते भारत विश्व गुरु रहा है और सदाचरण से ही बन सकता है फिर से विश्व गुरु : आचार्य विद्या देव

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ग्रेनो। ( विशेष संवाददाता)  गुरुकुल मुर्शदपुर में चल रहे चतुर्वेद पारायण यज्ञ कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन करते हुए सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य विद्या देव ने कहा कि भूगोल के बीच में (विश्व में) ऐसा श्रेष्ठ देश कोई नहीं है जिस देश में सब श्रेष्ठ पदार्थ होते हैं, छः ऋतु यथावत् वर्तमान होती हैं और सुवर्ण रत्न पैदा होते हैं। इस देश में जिसका राज्य होता है, (यदि) वह दरिद्र हो तो भी धन से पूर्ण हो जाता है। इसी हेतु इसका नाम आर्यावर्त्त है। आर्य नाम श्रेष्ठ मनुष्यों का है और श्रेष्ठ पदार्थों से युक्त अर्थात् आवर्त है। इस हेतु इस देश को आर्यावर्त्त कहते हैं।

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।।2।।  -मनुस्मृति 2.20

आचार्य श्री ने भारतवर्ष का गुणगान करते हुए कहा कि इस देश में अग्रजन्मा, सब श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न जो पुरुष उत्पन्न होवें, उनसे सब भूगोल की पृथिवी के मनुष्य शिक्षा अर्थात् विद्या तथा संसार के सब व्यवहारों को यथावत् जानें। इससे यह जाना जाता है कि प्रथम इस (आर्यावर्त-भारत) में मनुष्यों की सृष्टि हुई थी। पीछे सब द्वीप-द्वीपान्तर में सब मनुष्य फैल गए। पृथिवी में जितने मनुष्य हैं, वे इस देश के विद्वानों से शिक्षा व विद्यादि ग्रहण करते थे। सब देशों की भाषाओं का मूल संस्कृत है। यह संस्कृत भाषा आर्यावर्त ही में सदा से चली आती है। आजकल भी आर्यावर्त में संस्कृत का व्यवहार कुछ-कुछ देखने में आता है फिर भी सब देशों से (आर्यावर्त-भारत में) संस्कृत का प्रचार अधिक है। उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में भारत की हिंदी भाषा को लेकर हमने राष्ट्रीय दिवस मनाया है। हमें इस बात पर गर्व है कि संपूर्ण संसार में आज भी हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सबसे अधिक अधिक बोली और समझी जाती है।

 


आचार्य श्री ने कहा कि जर्मनी और विलायत आदि देशों में संस्कृत की पुस्तकें इतनी नहीं मिलती जितनी कि आर्यावर्त देश में मिलती हैं। इसका कारण केवल एक है कि भारतवर्ष ही आर्यों की भाषा संस्कृत का आदि देश है। इसी से निसृत हिंदी और दूसरी भाषाएं भारत में बहुत अच्छे ढंग से बोली जाती हैं। यदि किसी देश में संस्कृत की बहुत पुस्तकें होंगीं तो उनके बारे में यह पूर्णतया सत्य है कि वे आर्यावर्त ही से गई होंगी, इसमें कुछ सन्देह नहीं।
उन्होंने कहा कि इस देश से मिश्र देश वालों ने पहिले विद्या ग्रहण की थी। उससे यूनान देश, उससे रूम, फिर रूम से फिरंग-स्थान आदि देशों में विद्या फैली है। परन्तु संस्कृत के बिगड़ने (अपभ्रंस) से गरीश (ग्रीस), लाटीन, अंग्रेज और अरब देश वालों की (भिन्न-भिन्न) भाषायें बन गईं है। इस विषय में अधिक लिखना कुछ आवश्यक नहीं है क्योंकि इतिहास पढ़ने वाले सब जानते हैं और ज्ञात होता है कि एक गोल्ड्स्टकर साहेब ने पहिले ऐसा ही निश्चय किया था कि जितनी विद्या वा मत भूगोल में फैले हैं, वे सब आर्यावर्त ही से लिए गए हैं। काशी में वालेण्टेन् साहेब ने यही निश्चय किया है कि संस्कृत सब भाषाओं की माता है।         कार्यक्रम का संचालन कर रहे आर्य युवा नेता आर्य सागर खारी ने कहा कि दाराशिकोह जैसे उदार मुस्लिम राजकुमार ने भी वेद ,वैदिक संस्कृति संस्कृत और संस्कृत के ग्रंथों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी। उसने यह निश्चय किया है कि जो विद्या है सो संस्कृत में ही है। दारा शिकोह भारतीय संस्कृति का इतना अधिक दीवाना हो गया था कि उसे यह कहना पड़ा था कि मैंने सब देशों की भाषाओं की पुस्तकें देखी तो भी मुझको बहुत से सन्देह रह गए, परन्तु जब मैंने संस्कृत भाषा के ग्रन्थों को देखा तब मेरे सब सन्देह निवृत्त हो गए और मुझको अत्यन्त प्रसन्नता हुई।
श्री आर्य ने कहा कि आज हमें वेदों के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट कर संसार में वैदिक धर्म का डंका बजाने की आवश्यकता है। भारत को यदि हम नई ऊंचाइयों पर देखना चाहते हैं तो हमें वेद और वैदिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करना ही होगा।

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