कांग्रेस को अपने भीतर उठते तूफान की आखिर पहले से भनक क्यों नहीं लगी ?

राज कुमार सिंह

देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, आजादी के आंदोलन की अगुवा रही कांग्रेस अपने भविष्य ही नहीं, शायद अस्तित्व के संकट से रूबरू है। इस गंभीर संकट से निपटने की कांग्रेस आलाकमान की नीति-रणनीति भी आशा जगाने के बजाय निराशा ही बढ़ाने वाली है। दशकों तक देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस की यह दशा अचानक नहीं हुई। लगातार आती गई कमजोरियों का अहसास तो उसे समय रहते खुद ही हो जाना चाहिए था, लेकिन जब कोई मरीज अपने मर्ज से ही मुंह चुराने लगे तो फिर उसका इलाज कैसे संभव है? अब गुलाम नबी आजाद के पांच पेज के विस्फोटक इस्तीफे के बाद जिस कांग्रेस संकट की चर्चा और चिंता हर ओर हो रही है, उसकी आहट आठ साल पहले ही सुन ली जानी चाहिए थी, जब अपना सर्वाधिक शर्मनाक चुनावी प्रदर्शन करते हुए पार्टी पहली बार 50 से भी कम 44 सीटों पर सिमट गई थी।

हार से उपजी हताशा
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय सत्ता में बीजेपी के आसीन होने के बाद शुरू हुआ कांग्रेस का बुरा वक्त खत्म होता नहीं दिखता। बेशक, चुनावी हार से कांग्रेस पहली बार रूबरू नहीं है।

1967 में संविद सरकारों के दौर में उसे कुछ राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ी थी।
आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में मतदाताओं ने उसे केंद्र की सत्ता से बेदखल कर दिया था।
केंद्र समेत कई राज्यों की सत्ता से कांग्रेस 1989 और 1996 में भी बेदखल हुई।
इन हारों के बावजूद कांग्रेस में वैसी हताशा कभी नहीं दिखी, जैसी 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से नजर आ रही है। 2019 में लगातार दूसरे लोकसभा चुनाव में शर्मनाक प्रदर्शन के बाद तो लग रहा है कि कांग्रेस जड़ हो गई है। देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल ऐसे वक्त में भी तीन साल से पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना चल रहा है। आश्चर्य नहीं कि पार्टी और परिवार के प्रति निष्ठावान रहे कांग्रेसी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगे हैं।

तात्कालिक लाभ के लिए बार-बार दल बदलने वालों को आप सत्तालोलुप दलबदलू भी कह सकते हैं। अनुभव बताता है कि उनका हश्र बहुत अच्छा नहीं होता। लेकिन अपने दल की दशा और दिशा से हताश होकर पार्टी को अलविदा कहने वालों को अलग श्रेणी में रखा जाना चाहिए। 2014 के बाद से ऐसे कांग्रेसियों ने भी दल बदला है, जो पीढ़ियों से पार्टी और नेहरू परिवार के प्रति निष्ठावान रहे। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा से लेकर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद तक ऐसे कांग्रेसियों की सूची काफी लंबी है।

सत्ता की मेवा की चाह आजीवन रहती है, लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव पर कोई दूसरा दल कृष्णा या आजाद को ऐसा क्या दे देगा, जो उन्हें कांग्रेस में रहते हुए नहीं मिल पाया? पूर्वोत्तर में बीजेपी के विस्तार में अहम भूमिका निभाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा के दलबदल के मूल में तो कांग्रेस आलाककमान द्वारा लगातार अनदेखी रही, लेकिन गुलाम नबी आजाद तो लंबे समय तक आलामान का हिस्सा ही रहे।

बात यह है कि सत्ता में रहते हुए संगठन की कमजोरियां छिपी रहती हैं, लेकिन विपक्ष में आने के बाद इन्हें बेनकाब होते देर नहीं लगती।

दशकों तक सत्ता में रहते हुए कांग्रेस एक राजनीतिक दल से सत्ता तंत्र में तब्दील हो चुकी थी। उसका असली संकट यही है।
कार्यकर्ता जनता से कट गए तो नेता कार्यकर्ताओं से और नेतृत्व अपने ही नेताओं से।
इससे परस्पर अविश्वास की खाई बढ़ी। आजाद ने अपने इस्तीफे में जिस तरह राहुल गांधी पर तीखे प्रहार किए हैं, वैसी ही टिप्पणियां राहुल-प्रियंका की बाबत पार्टी छोड़ते समय कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने भी की थीं।
संकट अभूतपूर्व इसलिए है कि सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, राहुल गांधी की टीम बताए जाने वाले युवा नेता भी तेजी से कांग्रेस से किनारा कर रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद तो राहुल गांधी की ही टीम के अग्रणी सदस्य थे।
अब कांग्रेस अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने वाले पृथ्वीराज चव्हाण से लेकर आनंद शर्मा तक जो नेता मुखर नजर आ रहे हैं, वे 10 वर्ष के कांग्रेसनीत यूपीए शासन में सरकार और पार्टी के मुख्य रणनीतिकार हुआ करते थे। यह राजनीतिक प्रबंधन पर भी प्रश्नचिह्न है, जिसके लिए कभी कांग्रेस जानी जाती थी।

यह प्रश्न अनुत्तरित है कि क्या 2017 में अध्यक्ष बने राहुल गांधी ने 2019 लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार की नैतिक जिम्मेदारी ले इस्तीफा देकर कांग्रेस का संकट बढ़ाया है, जबकि उनके कार्यकाल में ही पार्टी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी से सत्ता छीनने में सफल रही थी? यह भी कि मां सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष काल में भी मध्य प्रदेश-राजस्थान-पंजाब में महत्वपूर्ण निर्णय राहुल गांधी ने ही लिए, जिनमें कहीं-कहीं उनकी बहन प्रियंका गांधी भी सक्रिय नजर आईं, जबकि वह उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव भर हैं।

संवादहीनता तो दूर हो
हर पीढ़ी के कांग्रेसियों में भविष्य को लेकर जैसी चिंता है और उसके जैसे राजनीतक नतीजे नजर आ रहे हैं, उसका तकाजा है कि कांग्रेस अतीत की आत्ममुग्धता और वर्तमान की जड़ता से उबरकर भविष्य की अग्निपरीक्षा के लिए कमर कसे। इस संकटकाल में भी महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर हल्ला बोल रैली से कांग्रेस जनहित की राजनीति का संदेश देना चाहती है तो उसके वांछित परिणाम के लिए सबसे पहले अपना घर दुरुस्त करना होगा। पहली परीक्षा 17 अक्टूबर को होने वाला कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव होगा। नया अध्यक्ष नेहरू परिवार से ही होगा या उसका कोई विश्वस्त, यह तो 19 अक्टूबर को पता चलेगा, लेकिन ऊपर से नीचे तक फैली संवादहीनता और अविश्वास के संकट से उबरना कांग्रेस के बचने की पहली अनिवार्य शर्त है। यह कांग्रेस की देश के प्रति जिम्मेदारी भी है।

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